भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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९८ श्रीसाम्बपुराणम्

एवं मेरोः समन्तात्तु सर्वमेतत् प्रकीर्त्तितम्। उत्पन्नं स चतुःशृङ्गः सुमेरुः शुद्धकाञ्चनः ॥११७॥ पृथिव्यां संस्थितो मध्ये सिद्धगन्धर्वसेवितः। चतुर्भिः काञ्चनैः शृङ्गैर्दिव्यैर्देवमिवोल्लिखत् ॥११८॥

तदनन्तर महान्, प्रधान तथा प्रकृति; तदनन्तर पुरुष, पुरुष के परे ईश्वर, ईश्वर द्वारा समस्त जगत् आवृत रहता है। मेरु के चारो ओर यह सब है। चतुःशृङ्ग-विशिष्ट शुद्ध स्वर्णमय सुमेरु उत्पन्न है। यह पृथिवी के मध्य में है। यह सिद्ध तथा गन्धर्व द्वारा सेवित है। यह चार स्वर्णमय दिव्य शिखरों से युक्त है तथा इसे देवता के समान कहा गया है॥११६-१८॥

योजनानां सहस्राणि चतुराशीतिरुच्छ्रितः। प्रवृष्टः षोडशाधस्तादष्टाविंशतिविस्तृतः ॥११९॥ विस्तरात् त्रिगुणश्चास्य परीणाहः समन्ततः। तस्य सौमनसं नाम शृङ्गमेकं तु काञ्चनम् ॥१२०॥

इसका एक शृङ्ग चौरासी हजार योजन उन्नत, सोलह सहस्त्र योजन वर्षणयोग्य स्थान एवं निम्न देश में अट्ठारह हजार योजन विस्तृत एवं विस्तार का तीन गुना चारो ओर फैला है। वह सौमनस नामक सुवर्णमय शृङ्ग है॥११९-२०॥

द्वितीयं पद्मरागाभं ज्योतिष्कं नामनामतः। तृतीयं नामतश्चित्रं सर्वधातुमयं शुभम् ॥१२१॥

द्वितीय शृङ्ग पर पद्मराग की प्रभातुल्य ज्योतिष्क नामक लोक विराजमान है। तृतीय शृङ्ग पर चित्रनामक सर्वधातुमय शुभ लोक है॥१२१॥

चतुर्थं राजतं शुक्लं चान्द्रमासमिति स्मृतम्। तस्य सौमनसं यत्तत् शृङ्गं जाम्बूनदं श्रुतम् ॥१२२॥ तदेव चोदयन्नाम्ना यत्रोद्यन् दृश्यते रविः। उत्तरेण परिक्रम्य जम्बूद्वीपे दिवाकरः ॥१२३॥ दृश्यो भवति भूतानां शिखरं तत्समाश्रितः। काञ्चनस्य च शृङ्गस्य तेजसार्कस्य चावृते ॥१२४॥

चतुर्थ चाँदी के समान शृङ्ग पर शुक्ल चन्द्र लोक ख्यात है। उसका जो सौमनस्य शृङ्ग है, वह जाम्बूनद नाम से प्रसिद्ध है। जो उदयाचल कहा गया है, वहाँ रवि दृष्ट होते हैं। उत्तर दिक् में परिक्रमा करके जम्बूद्वीप में उस शिखर का आश्रय लेकर दिवाकर प्राणियों को दृष्ट होते हैं। वह स्वर्णशृङ्ग सूर्यतेज से ढका है॥१२३-२४॥