साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः ९९
उभे सन्ध्ये प्रकाशेते आताम्रे पूर्वपश्चिमे।
शृङ्गे सौमनसे सूर्ये ह्यत्तिष्ठत्युत्तरायणे ॥२५॥
उस सौमनस शृङ्ग पर उत्तरायण में सूर्य के आने पर प्रातः तथा सायंकाल में पूर्व तथा पश्चिम दिक् में सूर्य ताम्रवर्ण दिखलाई पड़ता है॥२५॥
ज्योतिष्के दक्षिणे चापि विषुवे मध्यगस्तयोः।
तस्येशानेऽभवत्सर्वः शृङ्गेऽग्निः पूर्वदक्षिणे ॥२६॥
सूर्य के दक्षिण दिशा (दक्षिणायन में जाने पर)······पूर्व तथा पश्चिम दिक् शुभ्र अग्निवर्ण के हो जाते हैं॥२६॥
नैर्ऋत्ये पितरो ज्ञेयो वायव्ये मरुतस्तथा।
मध्ये नारायणः साक्षाद् ब्रह्मज्योतींषि चैव हि।
आदित्यः स्वेन रूपेण तस्मिन् व्योम्नि प्रतिष्ठितः ॥२७॥
इति श्री साम्बपुराणे व्योमोत्पत्तिर्नामैकोनविंशोऽध्यायः
नैर्ऋत्य में पितरों का एवं वायव्य में मरुद्गणों का स्थान है तथा मध्य में साक्षात् नारायण विराजमान हैं, जो ब्रह्मज्योतिःस्वरूप हैं। उसी आकाश में सूर्य अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित है॥२७॥
श्री साम्बपुराण का व्योमोत्पत्ति नामक उनविंश अध्याय समाप्त