भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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एकविंशोऽध्यायः

(आदित्यरथवर्णनम्)

नारद उवाच

अथ सूर्यरथस्यास्य सन्निवेशं निबोध मे।
स्यन्दते चैकचक्रेण पञ्चारेण त्रिणेमिना ॥१॥

नारद कहते हैं—अब सूर्यरथ का सन्निवेश कहता हूँ, मुझसे सुनो। एक चक्र, पाँच अर (चक्र की नाभि तथा नेमि में संयोजित काष्ठ) तथा तीन नाभि द्वारा वह परिचालित होता है॥१॥

हिरण्मयेन कान्तेन ह्यष्टचर्मैकनेमिना।
चक्रेण भास्वता चैव दिवि सूर्य प्रसर्पति ॥२॥

हिरण्मय कान्तियुक्त अष्ट चर्म के नेमियुक्त उज्ज्वल रथ द्वारा द्युलोक में सूर्य गमन करते हैं॥२॥

नवयोजनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते।
द्विगुणोऽस्य रथोपस्थादीषादण्डप्रमाणतः ॥३॥

नव योजन सहस्र (९०००) इसकी विस्तृति एवं विशालता कही गयी है तथा रथ से द्विगुण इषादण्ड का प्रमाण है (अक्ष तथा युगधारणार्थ दण्ड)॥३॥

धुरेऽस्यैव तु विस्तीर्णे अरुणो नाम सारथिः।
स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथः संवत्सरात्मकः ॥४॥

इस विस्तीर्ण धूर का अरुण नामक सारथी है। उनका यह रथ ब्रह्मा द्वारा सृष्ट तथा संवत्सरात्मक है॥४॥

आसङ्गः काञ्चनो दिव्यो युक्तः परमगैर्हयैः।
छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर्यतश्चक्रं ततः स्थितैः ॥५॥
तेनासौ सर्पते व्योम्नि भास्वता तु दिवस्पतिः ॥६॥

यह स्वर्णवर्ण के द्रुतगामी अश्वों से जुता रथ है। अश्वरूप छन्दों से आकाश को उद्भासित करने वाले इस रथ पर दिवाकर संक्रमण करते हैं॥५-६॥

अथ मारीचसूर्यस्य प्रत्यङ्गानि रथस्य तु।
संवत्सरास्यावयवैः कल्पितानि यथाक्रमम् ॥७॥