भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

एकविंशोऽध्यायः १०५

नाभ्यास्तिस्रस्तु चक्रस्य त्रयः कालाः प्रकीर्त्तिताः।
आराः पञ्चार्त्तवास्तस्य नेमिः षड्ऋतवः स्मृताः ॥८॥
तथोर्व्यो तस्य चायने दक्षिणोत्तरे।
मुहूर्त्ताश्च बन्धु रास्तस्य सव्यास्तस्य कलाः स्मृताः ॥९॥

मारीच सूर्य के रथ के अंगसमूह संवत्सर के अवयव के द्वारा यथाक्रम से कल्पित होते हैं। चक्र की तीन नाभि में तीन काल (भूत-भविष्यत् तथा वर्तमान) रहता है। जो अर हैं, वे पञ्च ऋतु हैं। नेमि को षड् ऋतु कहा है। उसकी दो डोरियाँ दक्षिण-उत्तर अयन हैं, धुरा मुहूर्त है एवं सव्य कलायें हैं॥७-९॥

तस्य काष्ठाः स्मृता घोणा ह्यक्षदण्डाः क्षणास्तु वै।
निमेषाश्चानुकक्षाश्च ईषा चास्य लवाः स्मृताः ॥१०॥
नाभिर्धनूर्ध्वो धर्मस्य ऊर्ध्वं तस्य समुच्छ्रितः।
युगाक्षकौ तु तौ तस्य चार्थकामावुभौ स्मृतौ ॥११॥

इसके काष्ठासमूह को (अष्टादश निमेषात्मक काल को) घोण तथा अक्षदण्ड-समूह को क्षण कहते हैं। निमेषसमूह को अनुकक्ष तथा ईषा को (रथावयव-विशेष को) लव कहा जाता है। नाभि के धनु के ऊर्ध्व को धर्म का ऊर्ध्व भाग कहते हैं। उसके युग को अर्थ तथा अक्ष को काम कहा गया है॥१०-११॥

अक्षरूपाणि च्छन्दांसि वहन्ते क्रमतो धुरम्।
गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुबेव च ॥१२॥
पंक्तिश्च बृहती चैव उष्णिगेव च सप्तमी।
चक्रमक्षनिबद्धं तु ध्रुवे चाक्षः समर्थितः ॥१३॥

इसके अक्षरूप छन्द यथाक्रम से भार वहन करते हैं। गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती तथा उष्णिक्—ये सात छन्द हैं। इसके चक्र से अक्षसमूह निबद्ध है तथा ध्रुव में अक्ष समर्थित है॥१२-१३॥

सहचक्रो भ्रमत्यक्षः स चाक्षो भ्रमति ध्रुवे।
मोक्षः सहैव चक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः ॥१४॥

चक्र के साथ अक्ष भ्रमण करता है और वह अक्ष ध्रुव में भ्रमण करता है। ध्रुव के द्वारा परिचालित वह अक्ष चक्र के साथ भ्रमण करता है॥१४॥

एवमर्थवशात्तस्य सन्निवेशो रथस्य तु।
तथा संसर्पते व्योम्नि संसिद्धो भास्करो रथः ॥१५॥

इस प्रकार प्रयोजनानुरूप सूर्यदेव का रथ सन्निवेशित है। आकाश में यह सिद्ध सूर्यरथ क्रमपूर्वक परिभ्रमण करता है॥१५॥