साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०६ श्रीसाम्बपुराणम्
जेतासौ तु रविर्देवान्नभः संसर्पते तथा।
युगाक्षकोटिसम्बद्धे तस्य वै स्यन्दनस्य तु॥१६॥
ते भ्रमेते ध्रुवासक्ते तच्चक्रं युगयोस्तु वै।
भ्रमतो मण्डलान्यस्य खेचरस्य रथस्य तु॥१७॥
जयशील रवि देवगण को आकांश में परिचालित करते हैं। उनका रथ का युग कोटि अक्ष से सम्बद्ध है। चक्र तथा युग ध्रुव से आसक्त है। ऐसा आकाशगामी रथ मण्डलों में भ्रमण करता रहता है॥१६-१७॥
कुलालचक्रवद् भाति मण्डलं सर्वतोदिशम्।
रज्जुभ्यां प्रगृहीते ते चक्रे वै चेरतुर्ध्रुवे॥१८॥
यह मण्डल कुम्हार के चक्र के समान सभी दिशाओं को प्रकाशित करता है। रज्जु के द्वारा प्रगृहीत दो चक्र ध्रुव में विचरण करते रहते हैं॥१८॥
ह्रसेते तस्य रश्मी ते मण्डले दक्षिणायने।
उत्तरे त्वथ वर्धेते पुरा रश्मी युगे तु वै॥१९॥
तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु।
अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरन्तरं तयोः।
स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यै ऋषिभिस्तथा॥२०॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सर्पग्रामणिराक्षसैः।
एते वसन्ति सूर्ये वै मासौ द्वौ द्वौ क्रमेण तु॥२१॥
दक्षिणायन में सूर्यरश्मि का ह्रास होता है। पुनः उत्तरायण में रश्मियुक्त होकर वृद्धि प्राप्त करता है। ऐसे ही सूर्य बाहर मण्डलों में भ्रमण करते हैं। उन काष्ठाद्वय के पार्थक्य से अशीति शत मण्डल होता है। देवगण, आदित्यगण तथा ऋषिगण, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, ग्रामणि तथा राक्षसों के साथ सूर्यदेव रथ पर अधिष्ठित रहते हैं। ये सभी क्रमशः दो-दो मास सूर्य के रथ में अवस्थान करते हैं॥१९-२१॥
धातार्यमा पुलस्त्यश्च पुलहश्च प्रजापतिः॥२२॥
उरगो वासुकिश्चैव कच्छनीरस्तथेरितः।
तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ गायतां वरौ॥२३॥
कृतस्थल्यप्सराश्चैव या तथा पुञ्जिकस्थली।
ग्रामण्यौ रथकृत्स्नश्च रथौजाश्चैव तावुभौ॥२४॥
धाता, अर्यमा, पुलस्त्य, पुलह, प्रजापति, सर्प, वासुकी, कच्छ, नीर, तुम्बुरु तथा नारद, गायन में श्रेष्ठ गन्धर्वद्वय, गायिका कृतस्थली, पुञ्जिकस्थली अप्सरायें, दो यातुधान, दो सर्प तथा व्याघ्र उस रथ पर रहते हैं॥२२-२४॥