भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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एकविंशोऽध्यायः १०७

रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च यातुधानौ स्मृतावभौ।
मधुमाधवयोरेष गणौ वसति भास्करे॥२५॥

राक्षस हेति-प्रहेती—ये दो लोग यातुधान कहे गये हैं। मधु (चैत्र) तथा माधव (वैशाख) मास में गणलोग सूर्य में अवस्थान करते हैं॥२५॥

वसतो ग्रैष्मिकौ मासौ मित्रश्च वरुणश्च ह।
ऋषिरत्रिर्वशिष्ठश्च तक्षकोऽनन्त एव च॥२६॥
मेनका सहजान्या च गन्धर्वौ च हहाहूहूः।
रथस्वनश्च ग्रामण्यौ रथचित्रश्च तावुभौ॥२७॥

ग्रीष्म के दो मास में मित्र तथा वरुण वास करते हैं। ऋषि हैं—वशिष्ठ तथा अत्रि। सर्प हैं—तक्षक एवं अनन्त। मेनका तथा सहजन्या हैं—अप्सरा। हाहा-हूहू गन्धर्व हैं। रथस्वन तथा रथचित्र हैं—ग्रामणी॥२६-२७॥

पौरुषेयो वधश्चैव यातुधानौ च तावुभौ।
शुचिशुक्रौ तु द्वौ मासौ सूर्ये ह्येते वसन्ति वै॥२८॥

पौरुषेय तथा वध—ये दो यातुधान हैं। शुचि तथा शुक्र (शुचि अर्थात् ज्येष्ठ, शुक्र अर्थात् आषाढ़) मास में ये सूर्य में वास करते हैं॥२८॥

अथ सूर्ये पुनस्त्वन्या निवसन्तिस्म देवताः।
इन्द्रश्चैव विवस्वांश्च अङ्गिरा भृगुरेव च॥२९॥
एलापत्रस्तथा शङ्खपालः सर्पौ च तावुभौ।
विश्वावसूग्रसेनौ च प्रेतोऽसमरथस्तथा॥३०॥
प्रम्लोचन्त्यप्सराश्चैवाऽनुम्लोचन्तीव ते शुभे।
यातुधानौ तथा सर्पौ व्याघ्रश्चैव स्मृतावभौ॥३१॥

तदनन्तर सूर्य में अन्य देवता वास करते हैं—इन्द्र तथा विवस्वान् देवता, अंगिरा तथा भृगु ऋषि, एलापत्र तथा शङ्खपाल सर्प, विश्वावसु, उग्रसेन, प्रेत, असमरथ, गन्धर्व, प्रम्लोचन्ती तथा अनुम्लोचन्ती शुभजनक अप्सरा, दो यातुधान, दो सर्प एवं व्याघ्र निवास करते हैं॥२९-३१॥

एते नभौ नभस्यौ च निवसन्ति दिवाकरे।
शरद्यान्याः पुनः शुभ्रा निवसन्तिस्म देवताः॥३२॥

ये सभी श्रावण तथा भाद्र में सूर्य में निवास करते हैं। शरत् काल में अन्यान्य देवगण वास करते हैं॥३२॥