साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें| चतुर्विंशोऽध्यायः | १२३ |
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यदेतन्मण्डलं शुक्लं दिव्यं ह्यजरमव्ययम्।
युक्तं मनोजवैरश्वैर्हरितैर्ब्रह्मवादिभिः ॥१८॥
आदिरेव हि भूतानामादित्य इति संज्ञितः।
त्रैलोक्यश्चक्षुरेषोऽत्र परमात्मा प्रजापतिः ॥१९॥
सूर्यभण्डल शुक्ल, दिव्य, अजर तथा अव्यय है। यह ब्रह्मवादी मन से भी द्रुतगामी हरितवर्ण अश्वों से युक्त है। सभी प्राणियों के आदि होने के कारण इसे आदित्य कहा जाता है। ये त्रैलोक्य के नेत्र (चक्षुस्वरूप) परमात्मा तथा प्रजापति हैं ॥१८-१९॥
य एष मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान्।
एष विष्णुरचिन्त्यात्मा ब्रह्मा चैव प्रजापतिः ॥२०॥
रुद्रो महेन्द्रो वरुणः आकाशः पृथिवी जलम्।
वायुः शशाङ्कः पर्जन्यो धनाध्यक्षस्तथैव च ॥२१॥
इस मण्डल में जो महान् पुरुष दीप्त हो रहे हैं, वे अचिन्त्य आत्मस्वरूप विष्णु, ब्रह्मा तथा प्रजापति हैं। यहीं रुद्र, वरुण, आकाश, पृथिवी, जल, वायु, चन्द्र, मेघ तथा धनाध्यक्ष के रूप में कुबेर विराजित हैं ॥२०-२१॥
स एष मण्डले ह्यस्मिन्नग्निवर्चाः प्रकाशते।
सहस्ररश्मिरेषोऽत्र द्वादशात्मा दिवाकरः ॥२२॥
स एष मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान्।
एष साक्षान्महादेवो वृत्तकुम्भनिभः शुभः ॥२३॥
इस मण्डल में अग्नितेज से जो प्रकाशित हैं, वे ही हैं—सहस्ररश्मि द्वादशात्मा दिवाकर। इस मण्डल में जो महान् पुरुष दीप्त हैं, वे गोलाकार कुम्भ के समान मंगलदायक साक्षात् महादेव हैं ॥२२-२३॥
कालो ह्येष महायोगी संहारोत्पत्तिलक्षणः।
य एष मण्डले ह्यस्मिंस्तेजोभिः पूरयन्महीम् ॥२४॥
भ्रमते ह्यव्यवच्छिन्नो धातैषोऽमृतलक्षणः।
नातः परतरो देवस्तेजसा विद्यते क्वचित् ॥२५॥
ये कालस्वरूप महायोगी तथा संहार एवं उत्पत्ति के कारण हैं। वे इस मण्डल के तेज द्वारा पृथ्वी को पूर्ण करके निरन्तार भ्रमण करते रहते हैं। ये अमृतस्वरूप धाता हैं। इनकी अपेक्षा कोई भी तेजस्वी देवता कहीं भी नहीं है ॥२४-२५॥
पुष्णाति सर्वभूतानि ह्येष एव स्वधामृतैः।
अन्तःस्थो म्लेच्छजातीयांस्तिर्यग्योनिगतानपि ॥२६॥