भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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चतुर्विंशोऽध्यायः

वशिष्ठ उवाच

एवं सूर्यस्य माहात्म्यं वर्णितं हर्षवर्द्धनम्।
प्रीतित्वमाप्तवानेव ततः संश्रुत्य नारदात् ॥१॥
विनयादुपसङ्गम्य देवस्य पुरतस्तदा।
निपत्य दीनया वाचा साम्बः पितरमब्रवीत् ॥२॥

वशिष्ठ कहते हैं—देवर्षि नारद से सूर्य के हर्षवर्द्धक माहात्म्य को सुनकर साम्ब ने प्रीतिलाभ किया। तदनन्तर सविनय पूर्वक पिता श्रीकृष्ण के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके दीन वाणी से इस प्रकार कहने लगे॥१-२॥

साम्ब उवाच

कश्मलेनाभिभूतोऽस्मि मलेनाङ्गावसेविना।
वैद्यैर्नौषधिभिर्वापि न शान्तिर्विद्यते मम ॥३॥
वनं यास्यामि गोविन्द अनुज्ञां दातुमर्हसि।
शिवेन पुण्डरीकाक्ष ध्यायस्व पुरुषोत्तम ॥४॥

साम्ब कहते हैं—मैं मालिन्य से अभिभूत हो गया हूँ। स्वेदादि मल (कुष्ठरोग-जनित) से मेरी देह अवसन्न है। किसी वैद्य अथवा औषधि से शान्ति नहीं मिल रही है। हे गोविन्द! हे पुण्डरीकाक्ष! आपकी अनुमति लेकर वन में जाना चाहता हूँ॥३-४॥

अनुज्ञातः स कृष्णेन सिन्धोरुत्तरकूलतः।
ज्ञात्वा संतारयामास चन्द्रभागां महानदीम् ॥५॥

कृष्ण द्वारा सुख से ध्यान करने की अनुज्ञा प्राप्त करके साम्ब सिन्धु के उत्तरी किनारे पर स्थित महानदी चन्द्रभागा को पार कर गये॥५॥

तत्र मित्रवनं गत्वा तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
उपवासकृशः साम्ब शुद्धो धमनितस्ततः ॥६॥
आराधनार्थं सूर्यस्य गुह्यं स्तोत्रमिदं जगौ।
चतुर्भिः सम्मितं वेदैः पुराणाशयबृंहितम् ॥७॥

तदनन्तर त्रिभुवन-विख्यात महातीर्थ मित्रवन में जाकर उपवास द्वारा कृश, शुद्ध धमनी वाले साम्ब ने आराधनार्थ चतुर्वेद-तुल्य पुराण के आशय से युक्त सूर्य के परम रहस्यमय स्तोत्र का पाठ करना प्रारम्भ किया॥६-७॥