साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशोऽध्यायः १२५
तेजों में आपका तेज अनन्त, अचिन्त्य, अव्यक्त तथा निर्मल है। हे जगत्पति! यदि मेरे इस स्तव में कुछ वैगुण्य हुआ है, तो उसे आप आर्त्तजनों की भक्ति समझकर क्षमा करने में समर्थ हैं॥२३॥
तमुवाच नरः प्रीतः सूर्यो जाम्बवतीसुतम्।
प्रीतोऽस्मि तपसा वत्स वरं ब्रूहि यमिच्छसि॥२४॥
परमात्मस्वरूप सूर्य प्रसन्न होकर जाम्बवती-नन्दन साम्ब से बोले—हे साम्ब! वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हो गया। जो इच्छा हो, उस वर की प्रार्थना करो॥२४॥
साम्ब उवाच
यदि प्रसन्नो भगवानेष एव वरो मम।
भक्तिर्भवतु मे नित्यं त्वयि देवे सनातने॥२५॥
साम्ब कहते हैं—हे भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं तब हमें यही वर दीजिये कि आप सनातन देव के प्रति मेरी नित्य भक्ति बनी रहे॥२५॥
सूर्य उवाच
भूयस्तुष्टोऽस्मि भद्रं ते वरं वरय सुव्रत।
स द्वितीयं वरं वव्रे तं देवं वरदं शुभम्॥२६॥
मलं शरीरस्थमिदं त्वत्प्रसादात् प्रणश्यतु।
तथास्त्वित्युक्तमात्रोऽसौ भास्करेण महात्मना॥२७॥
तन्मुमोच मलं साम्बो देहात्त्वचमिवोरगः।
ततो लब्धवरः साम्बो रूपवांश्चाभवत् पुनः॥२८॥
सूर्यदेव कहते हैं—इससे मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ हूँ। तुम्हारा मंगल हो। हे सुव्रत! वर माँगो। साम्ब ने कल्याणप्रद वरद सूर्यदेव से द्वितीय वर इस प्रकार माँगा—मेरे शरीर का यह मल (कुष्ठरोग) आपकी कृपा से नष्ट हो जाय। महात्मा भास्कर के 'तथास्तु' कहते ही साम्ब के देह से वह कुष्ठरोग उसी प्रकार समाप्त हो गया, जैसे कि सर्प अपनी केंचुल त्याग देता है। यह वर पा जाने से साम्ब पुनः रूपवान हो गये॥२६-२८॥
सूर्य उवाच
भूयश्च शृणु मे साम्ब तुष्टोऽहं यद् ब्रवीमि ते।
अद्य प्रभृति त्वन्नाम्ना मम स्थानानि सुव्रत!॥२९॥
क्षितौ ये स्थापयिष्यन्ति तेषां लोकः सनातनः॥३०॥
स्थापयस्व च मामस्मिंश्चन्द्रभागातटे शुभे।
त्वत्समानमिदं चापि पुरं साम्ब भविष्यति॥३१॥