साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६ श्रीसाम्बपुराणम्
सूर्यदेव कहते हैं—हे साम्ब! तुमसे सन्तुष्ट होकर जो कहता हूँ, उसे सुनो! हे सुव्रत! आज से तुम्हारे नाम से पृथ्वी पर जो मेरा स्थान स्थापित करेगा, उसे सनातन लोक की प्राप्ति होगी। हे साम्ब! शुभ चन्द्रभागा के तट पर मुझे स्थापित करो। तुम्हारे नाम से ही यह नगर प्रसिद्ध होगा।।२९-३१।।
कीर्त्तिस्तवाक्षया लोके यावद् भूमिर्भविष्यति।
भूयश्च ते प्रदास्यामि प्रत्यहं स्वप्नदर्शनम्॥३२॥
जब तक पृथ्वी रहेगी, जगत् में तुम्हारी अक्षय कीर्ति बनी रहेगी और प्रतिदिन तुम्हें स्वप्न में मेरा दर्शन प्राप्त होगा।।३२।।
एवं दत्त्वा वरं तस्मै वृष्णिसिंहाय भास्करः।
प्रत्यक्षदर्शनं दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत॥३३॥
सूर्यदेव वृष्णिसिंह साम्ब को इस प्रकार का वर तथा प्रत्यक्ष दर्शन देकर वहाँ से अन्तर्हित हो गये।।३३।।
पठेद् द्विज इदं स्तोत्रं त्रिकालं भक्तिमान्नरः।
नारी वा दुःखशोकार्त्ता मुच्यते शोकसागरात्॥३४॥
हे ब्राह्मण! जो भक्तिमान व्यक्ति अथवा दुःख-शोक से कातर नारी त्रिकाल में इस स्तोत्र का पाठ करेंगे, वे शोकसागर से मुक्त हो जायेंगे।।३४।।
चक्षुःपीडा मनःपीडा ग्रहपीडाभ्य एव च।
बन्धने निगडे घोरे काष्ठागारगृहेषु या॥३५॥
नेत्र की पीड़ा, मन की पीड़ा, ग्रहपीड़ा, घोर शृङ्खला-बन्धन तथा काष्ठागार गृह के बन्धन से वे मुक्त हो जायेंगे।।३५।।
अधस्तादन्तरिक्षे वा क्षमते भक्तिवत्सलः।
त्रिसप्तशतमावर्त्तैर्होमैस्त्वां सप्तरात्रिकम्॥३६॥
राज्यकामो लभेद्राज्यं धनकामो लभेद्धनम्।
रोगार्त्तो मुच्यते रोगाद् यथा साम्बस्तथैव सः॥३७॥
इति श्रीसाम्बपुराणे रोगोपनयनो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः
अधोलोक में अथवा अन्तरिक्ष में भक्तवत्सल सूर्यदेव सभी को क्षमा करते हैं। सात रात्रि २१०० आवर्त्त होम करने से राज्याभिलाषी राज्य प्राप्त करते हैं, धनकामी धनलाभ करते हैं एवं जैसे साम्ब रोग से मुक्त हो गये थे, वैसे ही रोगार्त्त व्यक्ति रोगमुक्त हो जाते हैं।।३६-३७।।
श्रीसाम्ब पुराण का रोगोपनयन नामक चतुर्विंश अध्याय समाप्त