भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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१३० | श्रीसाम्बपुराणम्

सह्यं भवतु ते रूपं सर्वप्राणभृतामिह।
ततो मया समादिष्टो विश्वकर्मा महातपाः ॥८॥

पहले मेरा रूप अत्यन्त तेजयुक्त था, जो समस्त प्राणिगण के लिये असह्य था। इसलिये देवताओं ने मुझसे प्रार्थना किया कि सभी प्राणियों के लिये आपका रूप सह्य हो जाय। इसलिये मैंने महातेजस्वी देवशिल्पी विश्वकर्मा को आदेश दिया॥७-८॥

तेजसः शातनं कुर्वन् रूपं निर्वर्त्तयस्व मे।
ततस्तु मत्समादेशात्तेनैव निपुणं तदा ॥९॥
शाकद्वीपे भ्रमिं कृत्वा रूपं निर्वर्त्तितं मम।
प्रीत्या ते साम्प्रतं चैव समयाकारितं पुनः ॥१०॥

(मैंने आदेश दिया कि) ‘मेरे तेज का खण्डन करके मेरा रूप तैयार करो’। तदनन्तर मेरे आदेश के अनुसार उन्होंने शाकद्वीप में भ्रमि (घूर्णिचक्र यन्त्र) पर (काट-छाँट कर) मेरे रूप का निर्माण किया। यहाँ मैंने तुम्हारी प्रसन्नता के लिये उनको बुलाया है॥९-१०॥

तेनेयं कल्पवृक्षात्तु निर्मिता प्रतिमा मम।
कृत्वा हिमवतः पृष्ठे पुण्यसिद्धनिषेविते ॥११॥
त्वदर्थं चन्द्रभागायां ततस्तेनावतारिता।
भवतस्तारणार्थं हि जातं स्थानमिदं मम ॥१२॥

विश्वकर्मा ने पुण्यशाली सिद्धों की आवासभूमि हिमालय के पृष्ठ पर कल्पवृक्ष से मेरी प्रतिमा का निर्माण किया था और तुम्हारे लिये उसे इस चन्द्रभागा नदी पर रख दिया था। तुम्हारी मुक्ति के लिये ही मेरा यह स्थान प्रकट हुआ है॥११-१२॥

रुचिरं सर्वदा चात्र सान्निध्यं मे भविष्यति ॥१३॥
सान्निध्यं मम पूर्वाह्ने उदिते रञ्जयते जनः।
कालात्यये च मध्याह्ने सायाह्ने चात्र नित्यशः ॥१४॥

इस स्थान पर सर्वदा मेरा मनोहर सान्निध्य रहेगा। पूर्वाह्न में उदित होने पर लोग मेरा सान्निध्य पाकर आनन्दित होंगे। तदनन्तर मध्याह्न तथा सायाह्न में भी नित्य मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे॥१३-१४॥

वशिष्ठ उवाच

श्रुत्वा देवस्य तद्वाक्यं दृष्ट्वा प्रत्यक्षदर्शिनम्।
कृत्वा देवगृहं साम्बस्ततः प्रोवाच नारदम् ॥१५॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—सूर्यदेव की बात सुनकर और प्रत्यक्ष उनका दर्शन पाकर साम्ब ने देवगृह का निर्माण करके नारद से इस प्रकार कहा॥१५॥