भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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षड्विंशोऽध्यायः १३१

साम्ब उवाच त्वत्प्रसादान्मया प्राप्तं रूपमेतत् सनातनम्। प्रत्यक्षदर्शनं चापि भास्करस्य महात्मनः ॥१६॥ सर्वमेतच्च सम्प्राप्य पुनश्चिन्ताकुलं मनः। देवस्य परिचर्यायाः पालनं कः करिष्यति ॥१७॥ गुणयुक्तो द्विजो यो हि समर्थः परिपालने। ममैवानुग्रहाद् ब्रह्मन् विचिन्त्याख्यातुमर्हसि ॥१८॥ एवमुक्तस्तु साम्बेन नारदः प्रत्युवाच तम् ॥१९॥

साम्ब कहते हैं—आपकी कृपा से मैंने यह सनातन दिव्य रूप प्राप्त कर लिया एवं महात्मा भास्कर का प्रत्यक्ष दर्शन भी प्राप्त किया। यह सब पाकर भी मेरा मन चिन्तायुक्त ही है कि सूर्यदेव की (प्रतिमा की) पूजा—परिचर्या कौन करेगा? हे ब्रह्मन्! गुणयुक्त कौन ब्राह्मण है, जो इस कार्य में समर्थ है? मुझ पर अनुग्रह करके यह बतायें। साम्ब से यह सुनकर नारद उनसे कहने लगे॥१६-१९॥

नारद उवाच न द्विजः परिगृह्णन्ति देवस्यात्मीकृतं धनम्। विद्यते च धनं ह्यत्र गुरुश्चायं प्रतिग्रहः ॥२०॥ देवचर्यागतैर्द्रव्यैः क्रिया ब्राह्मी न विद्यते। अविज्ञाय च कुर्वन्ति ये क्रिया लोभमोहिताः ॥२१॥ अपांक्तेया भवन्तीह ते वै देवलका द्विजाः। अविज्ञाय विधानं ये ब्राह्मणा लोभमोहिताः ॥२२॥ देवस्वमुपभोक्ष्यन्ति पतितास्ते भवन्ति हि। गर्हितं मानवं शास्त्रं न प्रशंसन्ति ते द्विजाः ॥२३॥

नारद कहते हैं कि देवता का धन ब्राह्मण नहीं लेते। यह धन तो है; लेकिन उसका प्रतिग्रह अत्यन्त कठिन है। देवता की परिचर्या में प्राप्त द्रव्य द्वारा ब्राह्मण का कोई काम नहीं होता। यह तत्त्व जाने बिना जो लोभ से मुग्ध होकर इसे प्रतिगृहीत करते हैं, ऐसे पुरोहित गण सद् ब्राह्मणों के साथ एक पंक्ति में भोजन ग्रहण करने योग्य नहीं होते। अज्ञानवशात् लोभ से विमुग्ध जो ब्राह्मण देवस्व (देवमूर्त्ति-पूजन से प्राप्त धन) का भोग करते हैं, वे पतित हो जाते हैं। ऐसे निन्दित ब्राह्मणगण की मानवशास्त्र में प्रशंसा नहीं की गई है॥२०-२३॥

देवस्वं ब्राह्मणस्वं च यो लोभादुपजीवति। स पापात्मा परे लोके गृध्रोच्छिष्टेन जीवति ॥२४॥