साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषड्विंशोऽध्यायः १३३
धर्म से अविचलित होने के कारण वहाँ समस्त प्रजाजन सुखी रहते हैं। अपने तेज से मैंने वहाँ पुरी का निर्माण किया है।।३२।।
तेभ्यां वेदाश्च चत्वारः सरहस्या मयेरिताः।
वेदोक्तैर्विविधैः स्तोत्रैः परैर्गुह्यैर्मया कृतैः ।।३३।।
मामेव ते च ध्यायन्ति मां जपन्ते च नित्यशः ।
मद्भावना मम परा मद्भक्ता मत्परायणाः ।।३४।।
उनको मैंने सरहस्य चारो वेदों को बतलाया है। मेरे द्वारा कथित वेदोक्त परम गुह्य विविध स्तोत्रों द्वारा वे मेरा ही ध्यान करते हैं और नित्य मेरा ही जप करते हैं। वे मेरी भावना करते हैं, मेरा पूजन करते हैं। वे सभी मेरे भक्त तथा मुझमें परायण (आश्रित) हैं।।३३-३४।।
मम शुश्रूषकाश्चैव ममैव व्रतचारिणः ।
अव्यङ्गधारिणः सर्वे विधिदृष्टेन कर्मणा ।।३५।।
कुर्वन्ति ते सदा तत्र मम पूजां मनोऽनुगाम्।
तत्र देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः ।।३६।।
वे वहाँ मन की अभिलाषा के अनुसार मेरा पूजन करते हैं। वहाँ गन्धर्वों के साथ देवता एवं चारणों के साथ सिद्धगण विहार करते हैं, रमण करते हैं।।३५-३६।।
विहरन्ते रमन्ते च दृश्यमानाश्च तैः सह।
श्वेतद्वीपे त्वहं विष्णुः कुशद्वीपे महेश्वरः ।।३७।।
वहाँ विहार करते तथा रमण करते उनके साथ मैं दृश्यमान होता हूँ। मैं श्वेत द्वीप में विष्णुरूपेण तथा कुशद्वीप में महेश्वररूपेण रहता हूँ।।३७।।
पुष्करे च स्मृतो ब्रह्मा शाकद्वीपे च भास्करः ।
तन्मगान मम पूजार्थं शाकद्वीपादिहानय ।।३८।।
आरूढ़ो गरुड़ं साम्ब शीघ्रं गच्छ विचारय ।।३९।।
पुष्कर में मैं ब्रह्मारूप से तथा शाकद्वीप में भास्कररूप से ख्यात हूँ। अतएव मेरी पूजा-हेतु शाकद्वीप से मग ब्राह्मण को यहाँ लाओ। हे साम्ब! विचार करके गरुड़ पर आरूढ़ होकर शीघ्र वहाँ जाओ।।३८-३९।।
वशिष्ठ उवाच
तथेति प्रतिगृह्णाज्ञां रवेर्जाम्बवतीसुतः ।
पुनर्द्वारवतीं गत्वा कान्त्यातीव समावृतः ।।४०।।
आख्यातवान् पितुः सर्वं स्वकीयं देवदर्शनम् ।
तस्माच्च गरुड़ं लब्ध्वा ययौ साम्बोऽधिरुह्य तम् ।।४१।।