साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १८५
दण्डिने च ततो दद्याद्रैवन्तानुचराय च।
पूर्वेण नम इन्द्राय दक्षिणेन यमाय च॥४०॥
पश्चिमेन जलेशाय कुबेरायोत्तरेण च।
उत्तरेणैव सोमाय दद्याद्धूपं विचक्षणः॥४१॥
तदनन्तर दण्डी तथा रैवन्त के अनुचर गण को निवेदन करना चाहिये। 'नमः इन्द्राय' मन्त्र से पूर्व की ओर इन्द्र को, दक्षिण में यम को, पश्चिम में वरुण को, उत्तर में कुबेर को तथा विचक्षण व्यक्ति को उत्तर दिशा में चन्द्र को भी धूप प्रदान करना चाहिये॥४०-४१॥
शृङ्गे सौमनसे धूपमीशानाय निवेदयेत्।
ज्योतिषं त्वग्नये दत्वा पितृभ्यश्चित्रसंज्ञके॥४२॥
शृङ्ग में सुमना ईशान को धूप निवेदन करना चाहिये। अग्नि में धूप देकर चित्र-संज्ञक पितृपुरुषों को धूप प्रदान करना चाहिये॥४२॥
चन्द्रमासे ततः शृङ्गे धूपं दत्त्वा तु वायवे।
मध्ये नारायणाख्याय सूर्याय परमात्मने॥४३॥
तदनन्तर चन्द्रमास में शृङ्ग में वायु को धूप प्रदान करना चाहिये। मध्य में नारायण नामक सूर्य परमात्मा को धूप प्रदान करना चाहिये॥४३॥
आदित्येभ्योऽथ रुद्रेभ्यो मरुद्भ्यश्चाश्विनोस्तथा।
याह्यस्मिन् देवता व्योम्नि नमस्ताभ्योऽपि नित्यशः॥४४॥
आदित्यगण, रुद्रगण, मरुद्गण, अश्विनी कुमारद्वय के लिये धूप निवेदित करना चाहिये। मन्त्र है—हे देवगण! इस आकाश में गमन करिये। उन देवगण को नित्य नमस्कार करता हूँ॥४४॥
एवमुद्दिश्य नामानि धूपं दत्वा ततः स्तवैः।
उत्क्षिप्तो यत्र वै धूपो मुक्त्वा तत्रैव तं पुनः॥४५॥
इस प्रकार से देवताओं का नामोल्लेख करके धूप देने के अनन्तर उनके स्तव से स्तुति करनी चाहिये। जहाँ धूप उत्क्षिप्त होती है, पुनः वहीं जाना चाहिये॥४५॥
सूर्य गुह्यैरभिष्टुत्य ह्येवं विज्ञापयेत्ततः।
अर्चतो हि यथाशक्त्या मया शक्त्या विभावसोः॥४६॥
ऐहिकामुष्मिकीं नाथ कार्यसिद्धिं कुरुष्व मे।
गुह्य मन्त्र से सूर्य का स्तव करके तदनन्तर उनसे प्रार्थना करनी चाहिये—'हे विभावसु! मैं यथाशक्ति भक्तिमान् चित्त से आपकी अर्चना करता हूँ। हे नाथ! मेरी ऐहिक तथा पारलौकिक कार्यसिद्धि करिये॥४६॥