साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८४ श्रीसाम्बपुराणम्
हे सूर्यदेव! एकमात्र आप रुद्रगण तथा वसुओं में पुरातन हैं। आप द्युलोक में नित्य देवगण द्वारा स्तुत हैं। यह धूपदान मन्त्र है॥३२॥
पूर्वाह्णेऽनेन मन्त्रेण मध्याह्ने चाप्यनेन तु॥३३॥ ॐ नमो ज्वालामालाय तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततं सायाह्ने चाप्यनेन तु॥३४॥
पूर्वाह्न तथा मध्याह्न में पूर्वोक्त मन्त्र से पूजन करे; किन्तु सायाह्न काल में ‘ॐ नमो ज्वालामालाय तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः दिवीव चक्षुराततं’ मन्त्र से पूजा करनी चाहिये। मन्त्रार्थ है—जो अग्निज्वाला के समान किरणों का विस्तार करते हैं, उन सूर्यदेव को नमस्कार है। उन विष्णु के परमपद का सूरीगण नित्य दर्शन करते हैं। आकाश में उनके चक्षु विस्तृत रहते हैं॥३३-३४॥
ॐ नमो वरुणाय ॐ आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्मयेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्॥३५॥ अनेन विधिना दत्वा धूपं सूर्याय याजकः। उत्क्षिप्तेनैव धूपेन विशेद् गर्भगृहं ततः॥३६॥
तदनन्तर ‘ॐ नमो वरुणाय’ से लेकर ‘भुवनानि पश्यन्’ तक के मन्त्र से सूर्य को धूपदान करके (सूर्य के लिये) गर्भगृह में प्रवेश करना चाहिये॥३५-३६॥
ततः प्रविश्य धूपं तु प्रतिमायै निवेदयेत्। मन्त्रेण मिहिरायेति धूपं दत्वेति नित्यशः॥३७॥
प्रवेश करके प्रतिमा को धूप निवेदन करना चाहिये। ‘मिहिराय’ इत्यादि मन्त्र से नित्य धूप देना चाहिये॥३७॥
ततो राज्ञीं नमस्कृत्य निक्षुभायै नमो नमः। दण्डनायकसंज्ञाय पिङ्गलाय च वै नमः॥३८॥
तदनन्तर सूर्यपत्नी राज्ञी को नमस्कार करे। सूर्यपत्नी निक्षुभा को भी नमस्कार करे। तत्पश्चात् दण्डनायक तथा पिङ्गला को भी नमस्कार करना चाहिये॥३८॥
ततो राज्ञे च तोषाय कल्माषाय गरुत्मते। ततः प्रदक्षिणां कुर्वन् दिग्देवेभ्यो निवेदयेत्॥३९॥
तत्पश्चात् राजा, तोष, कल्माष तथा गरुड़ को नमस्कार करना चाहिये। तदनन्तर प्रदक्षिणा करके उसे दिक् देवगण को निवेदन करना चाहिये॥३९॥