साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १८३
रक्तचन्दन-मिश्रित, गंगाजलयुक्त, पद्म, कनेर, रक्तपद्म, कुङ्कुम जल-मिश्रित, कुरुंटक (झिन्टीवृक्ष) एवं अन्यान्य गन्धादि द्रव्य को ताम्रपात्र में रखकर अर्घ्य देना चाहिये। धूप देकर मन्त्र के साथ गुग्गुलु की आहुति प्रदान करनी चाहिये। तदनन्तर अर्घ्यपात्र लेकर नीचे लिखे मन्त्र द्वारा सूर्य का आवाहन किया जाता है।।२१-२३।।
एहि सूर्य! सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर ॥२४॥
हे सूर्य! आप आईये! सहस्त्रकिरण, तेजोराशि, जगत्पति! मेरी भक्ति से मेरे प्रति कृपा करिये। हे दिवाकर! मेरा अर्घ्य ग्रहण करिये।।२४।।
अनेनावाहनं कृत्वा जानुभ्यां संस्थितः क्षितौ।
रवेर्निवेदयेदर्घमादित्यहृदयं जपेत् ॥२५॥
इस मन्त्र से सूर्यदेव का आवाहन करके भूमि पर अपने जंघाओं को स्थापित करके सूर्य को अर्घ्यदान करके आदित्यदेव का जप करना चाहिये।।२५।।
ॐ नमो भगवते आदित्याय वरिष्ठाय वरेण्याय ब्रह्मलोकैककर्त्रे।
ॐ ईशानाय पुराणाय पुराणपुरुषाय च ॥२६॥
ॐ सोमाय च ऋग्यजुःसामाथर्वणे नमः ॥२७॥
ॐ भूः ॐ भुवः स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्।
ब्रह्मणे मध्यपरत आदित्यायेति स्वाहा ॥२८॥
'ॐ नमो भगवते' इत्यादि २६ से २८ श्लोक-पर्यन्त लिखे मन्त्र से धूप निवेदित करना चाहिये। मन्त्रार्थ है—श्रेष्ठ, वरेण्य, ब्रह्मलोक के एकमात्र कर्त्ता आदित्यदेव को नमस्कार है। ईशान, पुराण तथा पुराणपुरुष को नमस्कार है। सोम तथा ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्व को नमस्कार है। महाव्याहृति मन्त्र—भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य तथा ब्रह्मरूप आदित्य के लिये स्वाहा मन्त्र से निवेदन करता हूँ।।२६-२८।।
सावित्र्या परिपूतेन वारिणा तु ततः परम्।
परितः परिमृज्याथ धूपभाजनमुच्छ्रियेत् ॥२९॥
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥३०॥
ततो निवेदयेद् धूपं त्वचमेतामुदाहरन् ॥३१॥
तदनन्तर गायत्री मन्त्र से परिपूत जल द्वारा धूपपात्र का मार्जन करके उसे उत्तोलित करना चाहिये। तदनन्तर गायत्री मन्त्र से धूप निवेदित करना चाहिये। परिपूत मन्त्र श्लोक २९ में है। गायत्री मन्त्र श्लोक ३० में है।।२९-३१।।
त्वमेको रुद्राणां वसूनां पुरातनो
देवानां गीर्भिरभिष्टुतः शाश्वतो दिवि ॥३२॥