भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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१८२ श्रीसाम्बपुराणम्

अंगुलियों को एकत्र करके जप करना चाहिये। तत्पश्चात् अग्नि के लिये धूपदान करना चाहिये। प्रथमतः गुग्गुलु की आहुति प्रदान करनी चाहिये। तदनन्तर पुष्पाञ्जलि लेकर उस शिला को प्रधूमित करके सूर्यदेव के मस्तक पर उस पुष्पाञ्जलि को देते समय नीचे लिखे मन्त्र का पाठ करना चाहिये।।१४-१५।।

ॐ व्रतनयं व्रतिनो वर्द्धयन्ति देवा मनुष्या पितरश्च सर्वे।
तस्यादित्यस्य प्रसवामनामहे यस्तेजसः प्रथममजो विभाति ॥१६॥

देवता, मनुष्य तथा पितृपुरुषगण व्रतपरायण होकर जिस व्रत के नायक का वर्धन करते हैं, उन आदित्य के प्रकाश में हम प्राण धारण करते हैं, जो तेज के प्रथम रूप में प्रकाशित होते हैं।।१६।।

धूपवेलाः स्मृताः पञ्च जपेष््वेवं च पञ्चसु।
महाविद्यासु याः पञ्च वक्ष्येऽहं ताः पुनः क्रमात् ॥१७॥

पाँच बार धूप देने की बात कही गयी है, उसी प्रकार से पाँच बार जप का भी विधान बताया गया है। महाविद्या की जो पाँच वेला है, उसे मैं क्रमानुसार कहता हूँ।।१७।।

दण्डनायकवेला तु प्रदोषे ऋक्षदर्शनात्।
राज्ञीवेला तु प्रत्यूषे तद्वत् कार्या विजानता ॥१८॥
त्रिकालं तु रवेः पूजा कर्तव्या सूर्यदर्शनात्।
अर्द्धोदिते खमध्यस्थे भानोर्वास्तंगते तथा ॥१९॥

प्रदोषकाल में नक्षत्रदर्शन होने तक दण्डनायक वेला होती है। प्रत्यूष काल में राज्ञी वेला होती है। सूर्योदय के उपरान्त तीन वेला में रवि का पूजन किया जाता है—सूर्य के अर्धोदय काल में, सूर्य के मध्यगमन में रहते समय, सूर्य के अस्तगमन के समय (ये पाँच वेलायें होती हैं)।।१८-१९।।

मिहिराय च पूर्वाह्णे मध्याह्ने ज्वलनाय च।
अर्धोद्यन्मण्डले देया नीचाह्ने वरुणाय च ॥२०॥

पूर्वाह्न में सूर्य की, मध्याह्न में अग्नि की, अर्धोदित काल में मण्डल की तथा अपराह्न में वरुण की पूजा करनी चाहिये।।२०।।

रक्तचन्दनमिश्राणि गन्धोदकयुतानि च।
पद्मानि करवीराणि तथा रक्तोत्पलानि च ॥२१॥
कुङ्कुमोदकमिश्राणि तथा कुरूण्टकानि च।
गन्धाद्यान्यथवान्यानि कृत्वा ताम्रस्य भाजने ॥२२॥
भूयो धूपं ततो दद्यात् समन्त्रं गुग्गुलाहुतिम्।
अर्घ्यपात्रं ततो गृह्य कुर्यादावाहनं रवेः ॥२३॥