भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १८१

पवित्र स्थान में संयतभाव से पूर्व अथवा उत्तरमुख बैठकर पादद्वय, हस्तद्वय तथा जानुदेश को धोकर आचमन करना चाहिये। प्रसन्न तथा संयत्त चित्त से सुसमाहित होकर तीन बार आचमनार्थ जलपान करना चाहिये। दो बार अपमार्जन करना चाहिये एवं तीन बार अभ्युक्षण करना (मस्तक पर जल छिड़कना) चाहिये॥६-७॥

मूर्द्धानखानि चात्मानमुपस्पृश्यानुपूर्वशः।
आचान्तेऽर्कं नमस्कृत्य शौचेच्छुः शुचितामियात् ॥८॥
क्रियां यः कुरुते मोहादनाचम्येह नास्तिकः।
भवति ता वृथा तस्य क्रियाः सर्वा न संशयः ॥९॥
शुचिष्कामा हि वै देवा वेदे च समुदाहृताः।
नास्तिकं चाशुचिं चैव वर्जयन्ति सदा सुराः ॥१०॥

मस्तक, सभी नख तथा हृदय का आनुपूर्वीक स्पर्श करके आचमनोपरान्त सूर्य को नमस्कार करके शुचिताकामी लोग पवित्र हो जाते हैं। जो नास्तिक व्यक्ति मोहवशात् आचमन किये बिना कार्य (पूजनादि कार्य) करता है, उसके सभी कर्म व्यर्थ हो जाते हैं; इस सम्बन्ध में कोई संशय नहीं है। देवगण पवित्रता चाहते हैं—ऐसा वेद का वचन है। नास्तिक तथा अशुचि व्यक्ति का देवगण सर्वदा त्याग कर देते हैं॥८-१०॥

ऋषयः पितरश्चापि ये चान्येऽपि शुचिव्रताः।
शौचमेवं प्रशंसन्ति शौचाज्ज्ञानं विधीयते ॥११॥
आचान्तो मौनमास्थाय देवागारं विशेषतः।
श्वासान्तर्हि निमित्तं हि प्राणमाच्छाद्य वाससा ॥१२॥

ऋषिगण, पितृपुरुष गण तथा और अन्य जो शुचिपरायण हैं, उन्होंने ऐसे शौच की प्रशंसा की है। शौच से ज्ञान प्राप्त होता है। आचमन के पश्चात् विशेषतः देवालय में मौन रहना चाहिये। वस्त्र द्वारा प्राणवायु का आच्छादन करके अन्तःश्वास लेना चाहिये॥११-१२॥

शिरः प्रावृत्य चैवाथ केशोदविनिवृत्तये।
ततः पूजां रवेः कुर्यात् पुष्पैर्नानाविधैः शुभैः ॥१३॥

तदनन्तर केश का जल सुखाने के लिये मस्तक को ढक कर नानाविध शुभ पुष्पों से सूर्य की पूजा करनी चाहिये॥१३॥

जपेन वर्तमानेन संहितायां करज्जपन्।
धूपं ततोऽग्नये दत्वा प्रथमं गुग्गुलाहुतिम् ॥१४॥
पुष्पाञ्जलिं ततो गृह्य तच्छिलायां प्रधूप्य च।
रवेर्मूर्द्धनि तं दत्वा वाचमेतामुदाहरेत् ॥१५॥