साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
(अग्निधूपविधिः)
बृहद्वल उवाच
श्रुतं मयेदं विप्रेन्द्र यात्रायाः करणं शुभम्।
अग्ने धूपस्य च तथा विधिमाचक्ष्व सुव्रत ॥१॥
महाराज बृहद्वल कहते हैं—हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मैंने शुभ यात्रा का विधान सुना। हे सुव्रत! अब अग्नि तथा धूप-विधान कहें॥१॥
वशिष्ठ उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ह्यग्निधूपविधिक्रियाम् ।
स्नानमाचमनं चाथोऽर्घ्यदानं तथैव च ॥२॥
अथ मृद्भिस्त्रिभिः स्नात्वा वाससी निर्मले शुभे ।
परिधाय च सावित्र्या ह्याचमेच्च प्रयत्नतः ॥३॥
वशिष्ठ देव कहते हैं—इसके अनन्तर मैं अग्नि तथा धूपविधि की क्रिया कहूँगा और वैसे ही स्नान, आचमन तथा अर्घ्यदान की विधि भी कहूँगा। तीन बार मृत्तिका से स्नान करके निर्मल वस्त्रयुगल पहनकर सयत्न सावित्री द्वारा आचमन करना चाहिये॥२-३॥
जलस्थो नाचमेद्विद्वाञ्जलादुत्तीर्य नित्यशः ।
आचमेत्तु प्रयत्नेन सावित्र्या सुसमाहितः ॥४॥
अप्सु सूर्यस्तथाग्निश्च नागदेवी सरस्वती ।
तस्मादुत्तीर्य चाचामेन्नोपहन्याज्जलाशयम् ॥५॥
विद्वान् व्यक्ति जल के मध्य में आचमन नहीं करना चाहिये। सर्वदा जल से बाहर आकर (थल पर) यत्नपूर्वक सावित्री से आचमन करना चाहिये। जल के भीतर सूर्य, अग्नि तथा सरस्वती का वास होता है। अतएव जल से ऊपर आकर आचमन करना ही उचित है; ताकि जलाशय आहत न हो॥४-५॥
उपविश्य शुचौ देशे प्रयतः प्रागुदङ्मुखः ।
पादौ प्रक्षाल्य हस्तौ च अन्तर्जानुस्तथाचमेत् ॥६॥
प्रसन्नस्त्रिः पिबेदापः प्रयतः सुसमाहितः ।
द्विधापमार्जनं कृत्वा त्रिभिरभ्युक्षणं पुनः ॥७॥