भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 424 में से

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पृष्ठ 189

पञ्चत्रिंशोऽध्यायः १७९

महत्त्वं च तिथेः पुण्यं यथाशास्त्रेषु भाषितम्।
कार्त्तिक्यां च विशेषेण महाकीर्त्तिरुदाहृता ॥१६॥

जैसे शास्त्रों में तिथि के महत्त्व तथा पुण्य की कथा अंकित है, वह विशेष करके कार्तिक हेतु है। इसलिये कार्तिक मास की अमावस्या तथा पूर्णिमा को महाकार्त्तिकी कहा है।।१६।।

एवं कालसमायोगाच्चात्र काले विशिष्यते।
दर्शनाच्च महत् पुण्यं सर्वपापहरं परम्॥१७॥
उपवासपरो यश्च तस्मिन् काले धृतव्रतः।
पूजयेद् भास्करं भक्त्या स गच्छेत् परमां गतिम्॥१८॥
देवोऽयं यज्ञपुरुषो लोकानुग्रहकाङ्क्षया।
प्रतिमायां स्थितो भूत्वा पूज्यते मानुषैः सदा ॥१९॥

इस प्रकार के काल (तिथि आदि) तथा मास के संयोग के कारण विशिष्ट काल होता है। इस समय दर्शन के फल से महापुण्य होता है, सर्वपाप विनष्ट हो जाते हैं। इस काल में उपवासी होकर नियम परायण व्यक्ति यदि भक्तिपूर्वक सूर्यदेव का पूजन करता है, तब उसे परम गति प्राप्त होती है। इन यज्ञपुरुष सूर्यदेव ने लोकानुग्रह करने के लिये प्रतिमा में अवस्थित होकर सदा मनुष्य का पूजन ग्रहण किया है।।१७-१९।।

स्नानाद् दानाज्जपाद्धोमात् संयोगाद् देवकर्मणः।
शिरसो वपनाच्चैव दीक्षितः पुरुषो भवेत् ॥२०॥
केशानां वपनं कार्यं सूर्यभक्तैस्सदा नरैः।
सूर्यक्रतौ शुचिश्चैवं दीक्षितः पुरुषो भवेत् ॥२१॥

स्नान-दान-जप-होम तथा देवकर्म के संयोग से तथा मस्तकमुण्डन के फल से पुरुष दीक्षित होता है। सूर्यभक्त सभी समय केशवपन करते हैं। सूर्य के यात्राकाल में ऐसा पवित्र व्यक्ति दीक्षित होता है।।२०-२१।।

चतुर्णामपि वर्णानां भक्त्या सूर्य च नित्यशः।
एवं ये तु करिष्यन्ति ते नरा नित्यदीक्षिताः।
तीर्णव्रता महात्मानः प्राप्नुवन्ति शुभां गतिम्॥२२॥

इति श्री साम्बपुराणे यात्राविधिर्नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

चारो वर्ण में जिन्होंने भक्तिपूर्वक इस प्रकार से नित्य सूर्य की आराधना किया है, वे नित्य दीक्षित होते हैं। व्रतपरायण महात्मागण शुभ गति प्राप्त करते हैं।।२२।।

श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत यात्राविधि नामक पञ्चत्रिंश अध्याय समाप्त

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