भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 424 में से

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१७८ श्रीसाम्बपुराणम्

पंक्तिश्च बृहती चैव उष्णिगेव च सप्तमी।
अतो वेदमयत्वाच्च छन्दसां चैव कल्पनात् ॥८॥

मण्डल को ऋक् मय समझे। ऐसे ही छन्दों को भी समझे अर्थात् गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती तथा अनुष्टुप्—इन्हें वेदमय मानकर छन्दों की कल्पना की गयी है॥७-८॥

रथप्रक्रमणे सूर्यो वोढव्यो ब्रह्मवादिभिः।
उपवासपरैर्युक्तैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥९॥

रथ चलाते समय ब्रह्मवादी, उपवासी वेदपरायण ब्राह्मणों द्वारा सूर्यदेव का रथ चलवाये॥९॥

यथोक्तकरणाच्चैव शुभा शान्तिर्भविष्यति।
नायकश्चापि सर्वासां देवतानां दिवाकरः ॥१०॥
विन्यासेषु रथानां च देवतायतनेषु च ॥११॥

पूर्वकथित कारणों से (यह कार्य) शुभ तथा शान्तिकर होगा। समस्त रथ, देवमन्दिर तथा देवगण में नायक हैं—दिवाकर॥१०-११॥

ततो धूपोपहारैश्च संपूज्य प्रथमं ततः।
दिग्देवानुचरांश्चैव पूजयन् पूज्यते श्रिया ॥१२॥

तत्पश्चात् धूप तथा उपहारों द्वारा प्रथमतः पूजा करें, दिग् देवता तथा उनके अनुचरों के पूजन से ऐश्वर्य मिलता है॥१२॥

अपूज्य प्रथमं सूर्यमपरान् यस्तु पूजयेत्।
तदज्ञानकृतं पापं न तद्गृह्णन्ति देवताः ॥१३॥
यात्राकाले तु संप्राप्ते सवितुर्दीक्षितां तनुम्।
ये द्रक्ष्यन्ति तदा भक्त्या ते भविष्यन्त्यकल्मषाः ॥१४॥

प्रथमतः सूर्यदेव का पूजन किये बिना जो अन्य देवताओं का पूजन करते हैं, वह उनका अज्ञानकृत पाप होता है। देवगण उसे (पूजा को) ग्रहण नहीं करते। यात्रा काल में सूर्यदेव के उस विग्रह को (जो रथ पर है) जो भक्तिपूर्वक देखते हैं, वे निष्पाप हो जाते हैं॥१३-१४॥

पौर्णमास्याममावस्यां दानं पुण्यतरं तथा।
आषाढी कार्तिकी माघी तिथ्यः पुण्यतमाः स्मृतः ॥१५॥

पूर्णिमा तथा अमावस्या को दिया दान पुण्यतर होता है। वैसे ही आषाढ़ कार्तिक तथा माघ मास की पूर्णिमा एवं अमावस्या तिथि को दिया दान अधिक पुण्यतर होता है॥१५॥

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