साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चत्रिंशोऽध्यायः
(यात्राविधिः)
वशिष्ठ उवाच
पुनर्यात्राविधिं चेमं समासात् कथयामि ते।
नारदेनैव कथितं साम्बोऽनुग्रहकारणम् ॥१॥
वर्तमाने तु भावे वै रथे देवगणे स्थिते।
यस्य यश्च नियोगः स्याद् देवस्य कथितो मया ॥२॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—पुनः संक्षेप में यात्राविधि कहता हूँ, जिसे साम्ब पर अनुग्रह करके नारद ने कहा था। समस्त कार्य ठीक से सम्पन्न होकर देवगण द्वारा रथ पर अवस्थान करने पर जिन देवता का जो अनुचर है, उसे मैं कहता हूँ॥१-२॥
स तस्मिन्नेव मनसा स्थापनीयो रथे बुधैः।
द्यौर्महीदेवमूर्त्तिस्थकथापूर्वं प्रकीर्तिता ॥३॥
तथैव राज्ञी द्यौर्ज्ञेया निक्षुभा पृथिवी स्मृता।
एताभ्यामपि देवीभ्यां तथैव सवितुस्तथा ॥४॥
दण्डिनं पिङ्गलादीनां पृथक् कार्यों रथक्रमः।
मनसा चिन्तयेदेवं यथास्थानेषु देवताम् ॥५॥
पण्डितगण मन ही मन उन अनुचरों की स्थापना रथ पर करें। देवमूर्त्ति के रूप में स्वर्ग तथा पृथ्वी की चर्चा पहले (इस पुराण में) की जा चुकी है। राज्ञी स्वर्गस्थानीया हैं तथा निक्षुभा पृथ्वी-स्थानीया हैं। इन दो देवियों के साथ सूर्यदेव के रथ की बातें कही गयी हैं। पिङ्गलादि के मध्य में दण्डी की पृथक् रथयात्रा कराना उचित है। ऐसे मन ही मन इन देवताओं का चिन्तन करना चाहिये॥३-५॥
दिक्पालांल्लोकपालांश्च कल्पयेन्मनसैव तु।
देवो देवमयश्चैव सर्वदेवमयस्तथा ॥६॥
मन ही मन दिक्पालगण तथा लोकपालों का (उस रथ पर) चिन्तन करे। देव, देवमय तथा सर्वदेवमय हैं, यह चिन्तन करे॥६॥
मण्डलं त्वृङ्मयं चैव छन्दांसि च तथैव च।
गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुबेव च ॥७॥