साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७६ | श्रीसाम्बपुराणम् |
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चतुर्थेऽहनि कर्तव्यं ततो विश्रमणं रवेः।
धूपमाल्योपहारैश्च पूजयेन्मण्डले पुनः॥६६॥
तत्पश्चात् परिक्रमा करके देवालय में (अर्थात् रथयात्रा समाप्ति के पश्चात् का कृत्य कहा जा रहा है) जाकर देवता को रथ से उतार कर (जहाँ से उन्हें यात्रार्थ ले गये थे) उस मण्डल में उसी प्रकार स्थापित करना चाहिये। चौथे दिन सूर्यदेव को विश्राम कराना उचित है (अर्थात् तीन दिन की यात्रा समाप्ति के अनन्तर चतुर्थ दिन), तदनन्तर धूप, मालादि उपहारों से मण्डल में पूजा करनी चाहिये॥६५-६६॥
एवं विधिं तु सूर्याय कुर्याद्यः कोऽपि मानवः।
सपरार्द्धं तु वर्षाणां सूर्यलोके महीयते॥६७॥
न कुले जायते तस्य दरिद्रो व्याधितोऽपि वा॥६८॥
सूर्य के लिये जो कोई भी ऐसे विधान का पालन करता है, वह परार्ध-पर्यन्त सूर्यलोक में सम्मानित किया जाता है। उसके वंश में कोई भी दरिद्र अथवा रोगी जन्म नहीं लेता॥६७-६८॥
अथ संवत्सरे पूर्णे भानोर्यात्रादिने यदि।
रथप्रक्रमणं तत्र कथञ्चिन्नु कृतं भवेत्॥६९॥
ततो द्वादशवर्षे तु कर्तव्यं नान्तरा पुनः।
शान्तिकर्मार्थ कृत्वा वै होतव्यं भूतिमिच्छता॥७०॥
तदनन्तर (दूसरा) संवत्सर पूर्ण होने पर यात्रा के दिन यदि किसी प्रकार से रथ चालन न किया गया हो तो १२ वर्ष पूर्ण होने पर ही रथचालन करना चाहिये। बीच में नहीं करना चाहिये। तत्पश्चात् समृद्धि की कामना से शान्तिकर्म करके हवन करना चाहिये॥६९-७०॥
शक्रध्वजस्य चाप्येवं यदि नोत्थापनं कृतम्।
ततो द्वादशके वर्षे कर्तव्यं नान्तरा पुनः॥७१॥
इति मुनिऋषभः सुताय विष्णोर्विधिमुपदिश्य तु नारदो जगाम।
स च दशशतदीधितेश्चकार प्रणिपतितात्तिर्हरस्य देवयात्राम्॥७२॥
इति श्रीसाम्बपुराणे देवयात्रा नाम चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः॥२१॥
इसी प्रकार यदि ध्वज का उत्थापन न किया गया हो तब १२ वर्ष बीतने पर ही करना होगा, पहले नहीं। ऐसा कृष्णपुत्र साम्ब को उपदेश देकर मुनिवर नारद चले गये और साम्ब ने भी सहस्र किरण प्रणतजन आर्त्तिनाशक सूर्यदेव की यात्रा का उत्सव किया॥७१-७२॥
श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत देवयात्रा नामक चतुस्त्रिंश अध्याय समाप्त