भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १७५

तिलपिष्टं च माषं च सूर्यपुत्राय दापयेत्।
राहवे दापयेन्मांसं केतवे चित्रमोदनम् ॥५८॥

सूर्य-हेतु गुड़-मिश्रित अन्न, चन्द्र-हेतु घृत-पायस, मंगल के लिये हविष्यान्न, बुध-हेतु क्षीरान्न, बृहस्पति-हेतु दधियुक्त अन्न, शुक्र-हेतु घृतान्न, सूर्यपुत्र शनि-हेतु तिलपिष्ट तथा उर्द का बड़ा प्रदान करे। राहु के लिये मांस एवं केतु के लिये विचित्र अन्न प्रदान करना होगा॥५६-५८॥

यथा बाणप्रहाराणां वारणं कवचं स्मृतम्।
तथा दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारणम् ॥५९॥
अहिंसकस्य दान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च।
नित्यं च नियमस्थस्य सदानुग्रहणा ग्रहाः ॥६०॥

जैसे बाण की चोट से बचने के लिये कवच पहना जाता है, वैसे ही दैव के उपघात से बचने हेतु शान्तिकर्म आवश्यक है। अहिंसा-परायण, विजितेन्द्रिय, धर्मपथ से धनोपार्जन करने वाले, नियमों का सदा पालन करने वाले के प्रति ग्रह सदैव अनुग्रह करने वाले होते हैं॥५९-६०॥

ग्रहा गावो नरेन्द्रश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः।
पूजिताः पूजयन्त्येते निर्दहन्त्यपमानिताः ॥६१॥
यथा समुत्थितं यन्त्रं यन्त्रेण प्रतिहन्यते।
तथा समुत्थितां पीडां ग्रहशांत्या प्रशामयेत् ॥६२॥

ग्रहगण, गौगण, राजगण तथा विशेष करके ब्राह्मणगण का पूजन करने से ये व्यक्ति की सम्मानता करते हैं, किन्तु अपमानित होने से व्यक्ति को निःशेष दग्ध कर देते हैं। जैसे समुत्थित यन्त्र को अन्य यन्त्र से बाधित किया जा सकता है, वैसे ही उत्थित पीड़ा ग्रहशान्ति से प्रशमित होती है॥६१-६२॥

यज्वनां सत्यवाक्यानां तथा नित्योपवासिनाम्।
जपहोमपराणाञ्च ग्रहपीडा प्रशाम्यति ॥६३॥
एवं कृत्वा प्रजाशान्तिं कृत्वा च स्वस्तिवाचनम्।
पुनः सूर्यरथं कृत्वा कुर्यात् प्रक्रमणं ततः ॥६४॥

जो याजक तथा सत्यवादी हैं, नित्य उपवासी हैं, जप-होम परायण हैं, उनकी ग्रहपीड़ा प्रशमित हो जाती है। ऐसे प्रजागण का शान्ति-विधान एवं स्वस्तिवाचन करके सूर्य के रथ की परिक्रमा करनी चाहिये॥६३-६४॥

मार्गशेषं ततो गत्वा नयेद् देवालयं ततः।
अवतार्य रथाच्चैनं स्थापयेन्मण्डले तथा ॥६५॥