साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें१७४ श्रीसाम्बपुराणम्
इदमन्यच्च वक्ष्यामि शान्तेः परमकारणम्।
यात्राकारणभूतस्य पुरुषस्य स्वजन्मनः ॥५०॥
हे देवेश! पृथ्वी पर शान्ति हो, भुवलोक में शान्ति हो, स्वर्गलोक में शान्ति हो, सर्वत्र सब कुछ में शान्ति हो। हे देवेश! आप जगत् के स्रष्टा-पालक हैं। आप ही प्रजा का पालन करते हैं। हे दिवाकर! आप शान्ति का विधान करिये। यह एवं और भी शान्ति का परम कारण कहूँगा। जो पुरुष सूर्ययात्रा का विधान करते हैं, उनके स्वयं का जन्म भी शान्तिकारक हो जाता है॥४८-५०॥
दुष्टान् ग्रहांश्च विज्ञाय ग्रहशान्तिं समाचरेत्।
प्रादेशमात्राः कर्तव्यास्समिधो वा प्रमाणतः।
अर्कमय्यस्तथाऽर्कस्य पालाशयः शशिनस्तथा ॥५१॥
खादिर्य्यश्चैव भौमाय ह्यपामार्ग्यो बुधाय च।
आश्वत्थ्याश्चैव जीवाय हौदुम्बर्य्यः सिताय च ॥५२॥
असिताय शमीमय्यो दूर्वाः कार्यास्तु राहवे।
केतवे तु कुशाः कार्या दक्षिणां चाप्यतः शृणु ॥५३॥
दुष्ट ग्रहादि को जानकर ग्रहशान्ति का अनुष्ठान करना चाहिये। इसमें प्रादेश (द्वादश अंगुलि, आधा हाथ) प्रमाण की समिधा (काष्ठ) छोड़े। सूर्य के लिये मदार की लकड़ी, चन्द्रमा के लिये पलाश की लकड़ी, मंगल के लिये खैर (कत्था) की लकड़ी, बुध के लिये अपामार्ग की लकड़ी, बृहस्पति के लिये पीपल की लकड़ी, शुक्र के लिये गूलर की लकड़ी, शनि के लिये शमी की लकड़ी, राहु के लिये दूर्वा, केतु के लिये कुश द्वारा होम करे। अब दक्षिण की बातें सुनो॥५१-५३॥
सूर्याय चोत्तमां धेनुं शंखं दद्यात्तथेन्दवे।
रक्तोर्णं चैव भौमाय काञ्चनं सोमसूनवे ॥५४॥
पीतवासांसि जीवाय शुक्राद्याश्वं सितं तथा।
शनैश्चराय गां नीलां राहवे खण्डपायसम् ॥५५॥
छागं तु केतवे दद्याच्छृण्वेषां भोजनानि च।
सूर्य के लिये उत्तम गौ, चन्द्र के लिये शङ्ख, मङ्गल के लिये लाल वस्त्र, बुध के लिये स्वर्ण, बृहस्पति के लिये पीला वस्त्र, शुक्र के लिये सफेद घोड़ा, शनि के लिये नीली गौ (श्याम गौ), राहु के लिये खाण्ड पायस तथा केतु के लिये बकरा प्रदान करना चाहिये। अब इनके लिये भोजन का वर्णन सुनो॥५४-५५॥
गुडौदनं तु सूर्याय सोमाय घृतपायसम् ॥५६॥
हविष्यमन्नं भौमाय क्षीरान्नं सोमसूनवे।
दध्योदनं तु जीवाय शुक्रायाथ घृताशनम् ॥५७॥