भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १७३

पर्यस्ते सुरथे वापि सर्वजानपदे भयम्।
उत्पन्नेष्वेवमाद्येषु ह्युत्पातेष्वशुभेषु च॥४१॥
बलिकर्म ततः कुर्याच्छान्तिहोमं तथैव च।
ब्राह्मणान् भोजयेद्यस्तु भूयो दद्याच्च दक्षिणाम्॥४२॥

रथ के खण्डित होने से समस्त जनपद के लिये भय की सूचना होती है। ऐसा अशुभ उत्पात होने पर बलिकर्म एवं शान्तिहोम करना कर्त्तव्य है। इसमें ब्राह्मणों को भोजनोपरान्त दक्षिणा भी देनी चाहिये।।४१-४२।।

पूर्वोत्तरे दिशोभागे रथस्याग्निं प्रकल्पयेत्।
समिद्भिस्तु घृताक्ताभिर्होमयेज्जातवेदसम्॥४३॥

रथ के पूर्व तथा उत्तर दिशा में अग्नि को स्थापित करके घृत से लिप्त समिधा द्वारा जातवेदा अग्नि में हवन करना चाहिये।।४३।।

स्वाहाकारं वदन् सम्यग् देवताभ्यस्त्वनुक्रमात्।
ग्रहेभ्यश्च प्रजाभ्यश्च नामान्युद्दिश्य होमयेत्॥४४॥
प्रथमं चाग्नये स्वाहा स्वाहा सोमाय चैव हि।
स्वाहा प्रजापतये चैव दद्यादाहुतयः क्रमात्॥४५॥

'स्वाहा' शब्द का उच्चारण करके सम्यक्रूपेण यथाक्रम से देवताओं का, ग्रहगण का तथा प्रजा का नामोल्लेख करके होम करना चाहिये। प्रथमतः अग्नि के लिये (अग्नये स्वाहा) स्वाहा लगाकर होम करे। तदनन्तर चन्द्र तथा प्रजापति के लिये उनके नाम के साथ स्वाहा लगाकर आहुति देनी चाहिये (जैसे सोमाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा)।।४४-४५।।

स्वस्त्यस्त्विह च विप्रेभ्यः स्वस्ति राज्ञे तथैव च।
गोभ्यः स्वस्ति प्रजाभ्यश्च जगतः शान्तिरस्तु वै॥४६॥
शन्नोऽस्तु द्विपदे नित्यं शन्नश्चास्तु चतुष्पदे।
शं प्रजाभ्यस्तथैवास्तु शं सदात्मनि चास्तु मे॥४७॥

ब्राह्मणों का मंगल हो, राजा का मंगल हो, गौ तथा प्रजा का मंगल हो, विश्व की शान्ति हो। हमारे द्विपद (दो पैर वाले मनुष्यों का) जनपद का नित्य मंगल हो, चतुष्पद प्राणियों का मंगल हो, प्रजा का मंगल हो, हमारी आत्मा का सर्वदा मंगल हो।।४६-४७।।

भूः शान्तिरस्तु देवेश भुवः शान्तिस्तथैव च।
स्वश्चैवास्तु तथा शान्तिः शान्तिः सर्वत्र वास्तुनः॥४८॥
त्वमेव जगतः स्रष्टा पोष्टा चैव त्वमेव हि।
प्रजाः पालय देवेश शान्तिं कुरु दिवस्पते॥४९॥