भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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१७२ श्रीसाम्बपुराणम्

हे देवगण! मेरा प्रदत्त उपहार-बलि-ग्रहण करिये। हे आदित्यगण! वसुगण, मरुद्गण, अश्विनीकुमारद्वय, रुद्रगण, (गरुड़ प्रभृति) पक्षीगण, सर्पगण, ग्रहगण, असुरगण, यातुधान गण, जो रथ में देवता का आश्रय लिये हैं, दिक्पाल गण, लोकपालगण, जो यात्रा के विघ्ननाशक हैं, इसी प्रकार जगत् के मंगलविधायक दिव्य ऋषिगण! मुझे कोई विघ्न न हो, कोई पाप न हो, हमारे परिपन्थी लोग सौम्य हों, देवगण तथा भूतगण तृप्त हों।।३०-३३।।

वामदेवैः पवित्रैश्च मानस्तोकरथन्तरैः ।
आकृष्णेन रजसेति ऋच एतामुदाहरेत् ॥३४॥
तत पुण्याहशब्देन कृतवादित्रनिस्वनः ।
रथापक्रमणं कुर्याद्वर्त्मना सुखमेधते ॥३५॥

तत्पश्चात् वामदेव पवित्र मानस्तोक तथा रथन्तर एवं ‘आ कृष्णेन रजसा’ इत्यादि ऋक् मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिये। तत्पश्चात् पुण्याहशब्दों से वाद्य बजाकर रास्ते में रथयात्रा करे। इससे सुख बढते हैं।।३४-३५।।

पुरुषैश्चापि वोढव्यः सूर्यभक्तिसमन्वितैः ।
सुकृता ग्रहदानैश्च बलीवर्दैरथापि वा ॥३६॥
यथापर्वमुदानस्याद् विजने पथि गच्छतः ।
युगाक्ष-चक्रभङ्गो वा तथा नेयः शनैः शनैः ॥३७॥

रथ को सूर्य के प्रति भक्तिवान् लोगों द्वारा अथवा सांड द्वारा भी चालित किया जा सकता है। निर्जन पथ पर भी रथ निर्विघ्न चले, जिससे युगाक्ष तथा रथ की पहिया न टूटे, ऐसे धीरे-धीरे रथ को चालित करे।।३६-३७।।

रथभङ्गे द्विजभयं भग्नेऽक्षे क्षत्रियस्य च ।
तुलाभङ्गे तु वैश्यानां शम्याः शूद्रभयं भवेत् ॥३८॥

रथ भङ्ग होने पर ब्राह्मणों को भय, अक्ष (चक्का) टूटने पर क्षत्रियों को भय, तुला (ऊपर की लकड़ी) टूटने पर वैश्यों को भय तथा शम्या (युगकीलक) टूटने पर शूद्रों को भय होता है।।३८।।

युगभङ्गे त्वनावृष्टिः पीठभङ्गे प्रजाभयम् ।
परचक्रागमं विद्याच्चक्रभङ्गे रथस्य तु ॥३९॥
ध्वजस्य पतने चापि भयं नृणां विनिर्दिशेत् ।
प्रतिमां व्यङ्गतायान्तु राज्ञीमरणमादिशेत् ॥४०॥

रथ का युगभंग होने पर अनावृष्टि, पीठ-भंग होने पर प्रजागण को भय तथा चक्का टूटने पर शत्रुपक्ष के आने की सूचना समझनी चाहिये। ध्वजा गिरने पर जनता को भय तथा प्रतिमा का अंग-भंग होने पर रानी का मरण होता है।।३९-४०।।