साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
१७२ श्रीसाम्बपुराणम्
हे देवगण! मेरा प्रदत्त उपहार-बलि-ग्रहण करिये। हे आदित्यगण! वसुगण, मरुद्गण, अश्विनीकुमारद्वय, रुद्रगण, (गरुड़ प्रभृति) पक्षीगण, सर्पगण, ग्रहगण, असुरगण, यातुधान गण, जो रथ में देवता का आश्रय लिये हैं, दिक्पाल गण, लोकपालगण, जो यात्रा के विघ्ननाशक हैं, इसी प्रकार जगत् के मंगलविधायक दिव्य ऋषिगण! मुझे कोई विघ्न न हो, कोई पाप न हो, हमारे परिपन्थी लोग सौम्य हों, देवगण तथा भूतगण तृप्त हों।।३०-३३।।
वामदेवैः पवित्रैश्च मानस्तोकरथन्तरैः ।
आकृष्णेन रजसेति ऋच एतामुदाहरेत् ॥३४॥
तत पुण्याहशब्देन कृतवादित्रनिस्वनः ।
रथापक्रमणं कुर्याद्वर्त्मना सुखमेधते ॥३५॥
तत्पश्चात् वामदेव पवित्र मानस्तोक तथा रथन्तर एवं ‘आ कृष्णेन रजसा’ इत्यादि ऋक् मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिये। तत्पश्चात् पुण्याहशब्दों से वाद्य बजाकर रास्ते में रथयात्रा करे। इससे सुख बढते हैं।।३४-३५।।
पुरुषैश्चापि वोढव्यः सूर्यभक्तिसमन्वितैः ।
सुकृता ग्रहदानैश्च बलीवर्दैरथापि वा ॥३६॥
यथापर्वमुदानस्याद् विजने पथि गच्छतः ।
युगाक्ष-चक्रभङ्गो वा तथा नेयः शनैः शनैः ॥३७॥
रथ को सूर्य के प्रति भक्तिवान् लोगों द्वारा अथवा सांड द्वारा भी चालित किया जा सकता है। निर्जन पथ पर भी रथ निर्विघ्न चले, जिससे युगाक्ष तथा रथ की पहिया न टूटे, ऐसे धीरे-धीरे रथ को चालित करे।।३६-३७।।
रथभङ्गे द्विजभयं भग्नेऽक्षे क्षत्रियस्य च ।
तुलाभङ्गे तु वैश्यानां शम्याः शूद्रभयं भवेत् ॥३८॥
रथ भङ्ग होने पर ब्राह्मणों को भय, अक्ष (चक्का) टूटने पर क्षत्रियों को भय, तुला (ऊपर की लकड़ी) टूटने पर वैश्यों को भय तथा शम्या (युगकीलक) टूटने पर शूद्रों को भय होता है।।३८।।
युगभङ्गे त्वनावृष्टिः पीठभङ्गे प्रजाभयम् ।
परचक्रागमं विद्याच्चक्रभङ्गे रथस्य तु ॥३९॥
ध्वजस्य पतने चापि भयं नृणां विनिर्दिशेत् ।
प्रतिमां व्यङ्गतायान्तु राज्ञीमरणमादिशेत् ॥४०॥
रथ का युगभंग होने पर अनावृष्टि, पीठ-भंग होने पर प्रजागण को भय तथा चक्का टूटने पर शत्रुपक्ष के आने की सूचना समझनी चाहिये। ध्वजा गिरने पर जनता को भय तथा प्रतिमा का अंग-भंग होने पर रानी का मरण होता है।।३९-४०।।
चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १७३
पर्यस्ते सुरथे वापि सर्वजानपदे भयम्।
उत्पन्नेष्वेवमाद्येषु ह्युत्पातेष्वशुभेषु च॥४१॥
बलिकर्म ततः कुर्याच्छान्तिहोमं तथैव च।
ब्राह्मणान् भोजयेद्यस्तु भूयो दद्याच्च दक्षिणाम्॥४२॥
रथ के खण्डित होने से समस्त जनपद के लिये भय की सूचना होती है। ऐसा अशुभ उत्पात होने पर बलिकर्म एवं शान्तिहोम करना कर्त्तव्य है। इसमें ब्राह्मणों को भोजनोपरान्त दक्षिणा भी देनी चाहिये।।४१-४२।।
पूर्वोत्तरे दिशोभागे रथस्याग्निं प्रकल्पयेत्।
समिद्भिस्तु घृताक्ताभिर्होमयेज्जातवेदसम्॥४३॥
रथ के पूर्व तथा उत्तर दिशा में अग्नि को स्थापित करके घृत से लिप्त समिधा द्वारा जातवेदा अग्नि में हवन करना चाहिये।।४३।।
स्वाहाकारं वदन् सम्यग् देवताभ्यस्त्वनुक्रमात्।
ग्रहेभ्यश्च प्रजाभ्यश्च नामान्युद्दिश्य होमयेत्॥४४॥
प्रथमं चाग्नये स्वाहा स्वाहा सोमाय चैव हि।
स्वाहा प्रजापतये चैव दद्यादाहुतयः क्रमात्॥४५॥
'स्वाहा' शब्द का उच्चारण करके सम्यक्रूपेण यथाक्रम से देवताओं का, ग्रहगण का तथा प्रजा का नामोल्लेख करके होम करना चाहिये। प्रथमतः अग्नि के लिये (अग्नये स्वाहा) स्वाहा लगाकर होम करे। तदनन्तर चन्द्र तथा प्रजापति के लिये उनके नाम के साथ स्वाहा लगाकर आहुति देनी चाहिये (जैसे सोमाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा)।।४४-४५।।
स्वस्त्यस्त्विह च विप्रेभ्यः स्वस्ति राज्ञे तथैव च।
गोभ्यः स्वस्ति प्रजाभ्यश्च जगतः शान्तिरस्तु वै॥४६॥
शन्नोऽस्तु द्विपदे नित्यं शन्नश्चास्तु चतुष्पदे।
शं प्रजाभ्यस्तथैवास्तु शं सदात्मनि चास्तु मे॥४७॥
ब्राह्मणों का मंगल हो, राजा का मंगल हो, गौ तथा प्रजा का मंगल हो, विश्व की शान्ति हो। हमारे द्विपद (दो पैर वाले मनुष्यों का) जनपद का नित्य मंगल हो, चतुष्पद प्राणियों का मंगल हो, प्रजा का मंगल हो, हमारी आत्मा का सर्वदा मंगल हो।।४६-४७।।
भूः शान्तिरस्तु देवेश भुवः शान्तिस्तथैव च।
स्वश्चैवास्तु तथा शान्तिः शान्तिः सर्वत्र वास्तुनः॥४८॥
त्वमेव जगतः स्रष्टा पोष्टा चैव त्वमेव हि।
प्रजाः पालय देवेश शान्तिं कुरु दिवस्पते॥४९॥
१७४ श्रीसाम्बपुराणम्
इदमन्यच्च वक्ष्यामि शान्तेः परमकारणम्।
यात्राकारणभूतस्य पुरुषस्य स्वजन्मनः ॥५०॥
हे देवेश! पृथ्वी पर शान्ति हो, भुवलोक में शान्ति हो, स्वर्गलोक में शान्ति हो, सर्वत्र सब कुछ में शान्ति हो। हे देवेश! आप जगत् के स्रष्टा-पालक हैं। आप ही प्रजा का पालन करते हैं। हे दिवाकर! आप शान्ति का विधान करिये। यह एवं और भी शान्ति का परम कारण कहूँगा। जो पुरुष सूर्ययात्रा का विधान करते हैं, उनके स्वयं का जन्म भी शान्तिकारक हो जाता है॥४८-५०॥
दुष्टान् ग्रहांश्च विज्ञाय ग्रहशान्तिं समाचरेत्।
प्रादेशमात्राः कर्तव्यास्समिधो वा प्रमाणतः।
अर्कमय्यस्तथाऽर्कस्य पालाशयः शशिनस्तथा ॥५१॥
खादिर्य्यश्चैव भौमाय ह्यपामार्ग्यो बुधाय च।
आश्वत्थ्याश्चैव जीवाय हौदुम्बर्य्यः सिताय च ॥५२॥
असिताय शमीमय्यो दूर्वाः कार्यास्तु राहवे।
केतवे तु कुशाः कार्या दक्षिणां चाप्यतः शृणु ॥५३॥
दुष्ट ग्रहादि को जानकर ग्रहशान्ति का अनुष्ठान करना चाहिये। इसमें प्रादेश (द्वादश अंगुलि, आधा हाथ) प्रमाण की समिधा (काष्ठ) छोड़े। सूर्य के लिये मदार की लकड़ी, चन्द्रमा के लिये पलाश की लकड़ी, मंगल के लिये खैर (कत्था) की लकड़ी, बुध के लिये अपामार्ग की लकड़ी, बृहस्पति के लिये पीपल की लकड़ी, शुक्र के लिये गूलर की लकड़ी, शनि के लिये शमी की लकड़ी, राहु के लिये दूर्वा, केतु के लिये कुश द्वारा होम करे। अब दक्षिण की बातें सुनो॥५१-५३॥
सूर्याय चोत्तमां धेनुं शंखं दद्यात्तथेन्दवे।
रक्तोर्णं चैव भौमाय काञ्चनं सोमसूनवे ॥५४॥
पीतवासांसि जीवाय शुक्राद्याश्वं सितं तथा।
शनैश्चराय गां नीलां राहवे खण्डपायसम् ॥५५॥
छागं तु केतवे दद्याच्छृण्वेषां भोजनानि च।
सूर्य के लिये उत्तम गौ, चन्द्र के लिये शङ्ख, मङ्गल के लिये लाल वस्त्र, बुध के लिये स्वर्ण, बृहस्पति के लिये पीला वस्त्र, शुक्र के लिये सफेद घोड़ा, शनि के लिये नीली गौ (श्याम गौ), राहु के लिये खाण्ड पायस तथा केतु के लिये बकरा प्रदान करना चाहिये। अब इनके लिये भोजन का वर्णन सुनो॥५४-५५॥
गुडौदनं तु सूर्याय सोमाय घृतपायसम् ॥५६॥
हविष्यमन्नं भौमाय क्षीरान्नं सोमसूनवे।
दध्योदनं तु जीवाय शुक्रायाथ घृताशनम् ॥५७॥
चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १७५
तिलपिष्टं च माषं च सूर्यपुत्राय दापयेत्।
राहवे दापयेन्मांसं केतवे चित्रमोदनम् ॥५८॥
सूर्य-हेतु गुड़-मिश्रित अन्न, चन्द्र-हेतु घृत-पायस, मंगल के लिये हविष्यान्न, बुध-हेतु क्षीरान्न, बृहस्पति-हेतु दधियुक्त अन्न, शुक्र-हेतु घृतान्न, सूर्यपुत्र शनि-हेतु तिलपिष्ट तथा उर्द का बड़ा प्रदान करे। राहु के लिये मांस एवं केतु के लिये विचित्र अन्न प्रदान करना होगा॥५६-५८॥
यथा बाणप्रहाराणां वारणं कवचं स्मृतम्।
तथा दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारणम् ॥५९॥
अहिंसकस्य दान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च।
नित्यं च नियमस्थस्य सदानुग्रहणा ग्रहाः ॥६०॥
जैसे बाण की चोट से बचने के लिये कवच पहना जाता है, वैसे ही दैव के उपघात से बचने हेतु शान्तिकर्म आवश्यक है। अहिंसा-परायण, विजितेन्द्रिय, धर्मपथ से धनोपार्जन करने वाले, नियमों का सदा पालन करने वाले के प्रति ग्रह सदैव अनुग्रह करने वाले होते हैं॥५९-६०॥
ग्रहा गावो नरेन्द्रश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः।
पूजिताः पूजयन्त्येते निर्दहन्त्यपमानिताः ॥६१॥
यथा समुत्थितं यन्त्रं यन्त्रेण प्रतिहन्यते।
तथा समुत्थितां पीडां ग्रहशांत्या प्रशामयेत् ॥६२॥
ग्रहगण, गौगण, राजगण तथा विशेष करके ब्राह्मणगण का पूजन करने से ये व्यक्ति की सम्मानता करते हैं, किन्तु अपमानित होने से व्यक्ति को निःशेष दग्ध कर देते हैं। जैसे समुत्थित यन्त्र को अन्य यन्त्र से बाधित किया जा सकता है, वैसे ही उत्थित पीड़ा ग्रहशान्ति से प्रशमित होती है॥६१-६२॥
यज्वनां सत्यवाक्यानां तथा नित्योपवासिनाम्।
जपहोमपराणाञ्च ग्रहपीडा प्रशाम्यति ॥६३॥
एवं कृत्वा प्रजाशान्तिं कृत्वा च स्वस्तिवाचनम्।
पुनः सूर्यरथं कृत्वा कुर्यात् प्रक्रमणं ततः ॥६४॥
जो याजक तथा सत्यवादी हैं, नित्य उपवासी हैं, जप-होम परायण हैं, उनकी ग्रहपीड़ा प्रशमित हो जाती है। ऐसे प्रजागण का शान्ति-विधान एवं स्वस्तिवाचन करके सूर्य के रथ की परिक्रमा करनी चाहिये॥६३-६४॥
मार्गशेषं ततो गत्वा नयेद् देवालयं ततः।
अवतार्य रथाच्चैनं स्थापयेन्मण्डले तथा ॥६५॥
चतुर्थेऽहनि कर्तव्यं ततो विश्रमणं रवेः।
| १७६ | श्रीसाम्बपुराणम् |
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चतुर्थेऽहनि कर्तव्यं ततो विश्रमणं रवेः।
धूपमाल्योपहारैश्च पूजयेन्मण्डले पुनः॥६६॥
तत्पश्चात् परिक्रमा करके देवालय में (अर्थात् रथयात्रा समाप्ति के पश्चात् का कृत्य कहा जा रहा है) जाकर देवता को रथ से उतार कर (जहाँ से उन्हें यात्रार्थ ले गये थे) उस मण्डल में उसी प्रकार स्थापित करना चाहिये। चौथे दिन सूर्यदेव को विश्राम कराना उचित है (अर्थात् तीन दिन की यात्रा समाप्ति के अनन्तर चतुर्थ दिन), तदनन्तर धूप, मालादि उपहारों से मण्डल में पूजा करनी चाहिये॥६५-६६॥
एवं विधिं तु सूर्याय कुर्याद्यः कोऽपि मानवः।
सपरार्द्धं तु वर्षाणां सूर्यलोके महीयते॥६७॥
न कुले जायते तस्य दरिद्रो व्याधितोऽपि वा॥६८॥
सूर्य के लिये जो कोई भी ऐसे विधान का पालन करता है, वह परार्ध-पर्यन्त सूर्यलोक में सम्मानित किया जाता है। उसके वंश में कोई भी दरिद्र अथवा रोगी जन्म नहीं लेता॥६७-६८॥
अथ संवत्सरे पूर्णे भानोर्यात्रादिने यदि।
रथप्रक्रमणं तत्र कथञ्चिन्नु कृतं भवेत्॥६९॥
ततो द्वादशवर्षे तु कर्तव्यं नान्तरा पुनः।
शान्तिकर्मार्थ कृत्वा वै होतव्यं भूतिमिच्छता॥७०॥
तदनन्तर (दूसरा) संवत्सर पूर्ण होने पर यात्रा के दिन यदि किसी प्रकार से रथ चालन न किया गया हो तो १२ वर्ष पूर्ण होने पर ही रथचालन करना चाहिये। बीच में नहीं करना चाहिये। तत्पश्चात् समृद्धि की कामना से शान्तिकर्म करके हवन करना चाहिये॥६९-७०॥
शक्रध्वजस्य चाप्येवं यदि नोत्थापनं कृतम्।
ततो द्वादशके वर्षे कर्तव्यं नान्तरा पुनः॥७१॥
इति मुनिऋषभः सुताय विष्णोर्विधिमुपदिश्य तु नारदो जगाम।
स च दशशतदीधितेश्चकार प्रणिपतितात्तिर्हरस्य देवयात्राम्॥७२॥
इति श्रीसाम्बपुराणे देवयात्रा नाम चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः॥२१॥
इसी प्रकार यदि ध्वज का उत्थापन न किया गया हो तब १२ वर्ष बीतने पर ही करना होगा, पहले नहीं। ऐसा कृष्णपुत्र साम्ब को उपदेश देकर मुनिवर नारद चले गये और साम्ब ने भी सहस्र किरण प्रणतजन आर्त्तिनाशक सूर्यदेव की यात्रा का उत्सव किया॥७१-७२॥
श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत देवयात्रा नामक चतुस्त्रिंश अध्याय समाप्त
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
(यात्राविधिः)
वशिष्ठ उवाच
पुनर्यात्राविधिं चेमं समासात् कथयामि ते।
नारदेनैव कथितं साम्बोऽनुग्रहकारणम् ॥१॥
वर्तमाने तु भावे वै रथे देवगणे स्थिते।
यस्य यश्च नियोगः स्याद् देवस्य कथितो मया ॥२॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—पुनः संक्षेप में यात्राविधि कहता हूँ, जिसे साम्ब पर अनुग्रह करके नारद ने कहा था। समस्त कार्य ठीक से सम्पन्न होकर देवगण द्वारा रथ पर अवस्थान करने पर जिन देवता का जो अनुचर है, उसे मैं कहता हूँ॥१-२॥
स तस्मिन्नेव मनसा स्थापनीयो रथे बुधैः।
द्यौर्महीदेवमूर्त्तिस्थकथापूर्वं प्रकीर्तिता ॥३॥
तथैव राज्ञी द्यौर्ज्ञेया निक्षुभा पृथिवी स्मृता।
एताभ्यामपि देवीभ्यां तथैव सवितुस्तथा ॥४॥
दण्डिनं पिङ्गलादीनां पृथक् कार्यों रथक्रमः।
मनसा चिन्तयेदेवं यथास्थानेषु देवताम् ॥५॥
पण्डितगण मन ही मन उन अनुचरों की स्थापना रथ पर करें। देवमूर्त्ति के रूप में स्वर्ग तथा पृथ्वी की चर्चा पहले (इस पुराण में) की जा चुकी है। राज्ञी स्वर्गस्थानीया हैं तथा निक्षुभा पृथ्वी-स्थानीया हैं। इन दो देवियों के साथ सूर्यदेव के रथ की बातें कही गयी हैं। पिङ्गलादि के मध्य में दण्डी की पृथक् रथयात्रा कराना उचित है। ऐसे मन ही मन इन देवताओं का चिन्तन करना चाहिये॥३-५॥
दिक्पालांल्लोकपालांश्च कल्पयेन्मनसैव तु।
देवो देवमयश्चैव सर्वदेवमयस्तथा ॥६॥
मन ही मन दिक्पालगण तथा लोकपालों का (उस रथ पर) चिन्तन करे। देव, देवमय तथा सर्वदेवमय हैं, यह चिन्तन करे॥६॥
मण्डलं त्वृङ्मयं चैव छन्दांसि च तथैव च।
गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुबेव च ॥७॥
१७८ श्रीसाम्बपुराणम्
पंक्तिश्च बृहती चैव उष्णिगेव च सप्तमी।
अतो वेदमयत्वाच्च छन्दसां चैव कल्पनात् ॥८॥
मण्डल को ऋक् मय समझे। ऐसे ही छन्दों को भी समझे अर्थात् गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती तथा अनुष्टुप्—इन्हें वेदमय मानकर छन्दों की कल्पना की गयी है॥७-८॥
रथप्रक्रमणे सूर्यो वोढव्यो ब्रह्मवादिभिः।
उपवासपरैर्युक्तैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥९॥
रथ चलाते समय ब्रह्मवादी, उपवासी वेदपरायण ब्राह्मणों द्वारा सूर्यदेव का रथ चलवाये॥९॥
यथोक्तकरणाच्चैव शुभा शान्तिर्भविष्यति।
नायकश्चापि सर्वासां देवतानां दिवाकरः ॥१०॥
विन्यासेषु रथानां च देवतायतनेषु च ॥११॥
पूर्वकथित कारणों से (यह कार्य) शुभ तथा शान्तिकर होगा। समस्त रथ, देवमन्दिर तथा देवगण में नायक हैं—दिवाकर॥१०-११॥
ततो धूपोपहारैश्च संपूज्य प्रथमं ततः।
दिग्देवानुचरांश्चैव पूजयन् पूज्यते श्रिया ॥१२॥
तत्पश्चात् धूप तथा उपहारों द्वारा प्रथमतः पूजा करें, दिग् देवता तथा उनके अनुचरों के पूजन से ऐश्वर्य मिलता है॥१२॥
अपूज्य प्रथमं सूर्यमपरान् यस्तु पूजयेत्।
तदज्ञानकृतं पापं न तद्गृह्णन्ति देवताः ॥१३॥
यात्राकाले तु संप्राप्ते सवितुर्दीक्षितां तनुम्।
ये द्रक्ष्यन्ति तदा भक्त्या ते भविष्यन्त्यकल्मषाः ॥१४॥
प्रथमतः सूर्यदेव का पूजन किये बिना जो अन्य देवताओं का पूजन करते हैं, वह उनका अज्ञानकृत पाप होता है। देवगण उसे (पूजा को) ग्रहण नहीं करते। यात्रा काल में सूर्यदेव के उस विग्रह को (जो रथ पर है) जो भक्तिपूर्वक देखते हैं, वे निष्पाप हो जाते हैं॥१३-१४॥
पौर्णमास्याममावस्यां दानं पुण्यतरं तथा।
आषाढी कार्तिकी माघी तिथ्यः पुण्यतमाः स्मृतः ॥१५॥
पूर्णिमा तथा अमावस्या को दिया दान पुण्यतर होता है। वैसे ही आषाढ़ कार्तिक तथा माघ मास की पूर्णिमा एवं अमावस्या तिथि को दिया दान अधिक पुण्यतर होता है॥१५॥
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः १७९
महत्त्वं च तिथेः पुण्यं यथाशास्त्रेषु भाषितम्।
कार्त्तिक्यां च विशेषेण महाकीर्त्तिरुदाहृता ॥१६॥
जैसे शास्त्रों में तिथि के महत्त्व तथा पुण्य की कथा अंकित है, वह विशेष करके कार्तिक हेतु है। इसलिये कार्तिक मास की अमावस्या तथा पूर्णिमा को महाकार्त्तिकी कहा है।।१६।।
एवं कालसमायोगाच्चात्र काले विशिष्यते।
दर्शनाच्च महत् पुण्यं सर्वपापहरं परम्॥१७॥
उपवासपरो यश्च तस्मिन् काले धृतव्रतः।
पूजयेद् भास्करं भक्त्या स गच्छेत् परमां गतिम्॥१८॥
देवोऽयं यज्ञपुरुषो लोकानुग्रहकाङ्क्षया।
प्रतिमायां स्थितो भूत्वा पूज्यते मानुषैः सदा ॥१९॥
इस प्रकार के काल (तिथि आदि) तथा मास के संयोग के कारण विशिष्ट काल होता है। इस समय दर्शन के फल से महापुण्य होता है, सर्वपाप विनष्ट हो जाते हैं। इस काल में उपवासी होकर नियम परायण व्यक्ति यदि भक्तिपूर्वक सूर्यदेव का पूजन करता है, तब उसे परम गति प्राप्त होती है। इन यज्ञपुरुष सूर्यदेव ने लोकानुग्रह करने के लिये प्रतिमा में अवस्थित होकर सदा मनुष्य का पूजन ग्रहण किया है।।१७-१९।।
स्नानाद् दानाज्जपाद्धोमात् संयोगाद् देवकर्मणः।
शिरसो वपनाच्चैव दीक्षितः पुरुषो भवेत् ॥२०॥
केशानां वपनं कार्यं सूर्यभक्तैस्सदा नरैः।
सूर्यक्रतौ शुचिश्चैवं दीक्षितः पुरुषो भवेत् ॥२१॥
स्नान-दान-जप-होम तथा देवकर्म के संयोग से तथा मस्तकमुण्डन के फल से पुरुष दीक्षित होता है। सूर्यभक्त सभी समय केशवपन करते हैं। सूर्य के यात्राकाल में ऐसा पवित्र व्यक्ति दीक्षित होता है।।२०-२१।।
चतुर्णामपि वर्णानां भक्त्या सूर्य च नित्यशः।
एवं ये तु करिष्यन्ति ते नरा नित्यदीक्षिताः।
तीर्णव्रता महात्मानः प्राप्नुवन्ति शुभां गतिम्॥२२॥
इति श्री साम्बपुराणे यात्राविधिर्नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
चारो वर्ण में जिन्होंने भक्तिपूर्वक इस प्रकार से नित्य सूर्य की आराधना किया है, वे नित्य दीक्षित होते हैं। व्रतपरायण महात्मागण शुभ गति प्राप्त करते हैं।।२२।।
श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत यात्राविधि नामक पञ्चत्रिंश अध्याय समाप्त
षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
(अग्निधूपविधिः)
बृहद्वल उवाच
श्रुतं मयेदं विप्रेन्द्र यात्रायाः करणं शुभम्।
अग्ने धूपस्य च तथा विधिमाचक्ष्व सुव्रत ॥१॥
महाराज बृहद्वल कहते हैं—हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मैंने शुभ यात्रा का विधान सुना। हे सुव्रत! अब अग्नि तथा धूप-विधान कहें॥१॥
वशिष्ठ उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ह्यग्निधूपविधिक्रियाम् ।
स्नानमाचमनं चाथोऽर्घ्यदानं तथैव च ॥२॥
अथ मृद्भिस्त्रिभिः स्नात्वा वाससी निर्मले शुभे ।
परिधाय च सावित्र्या ह्याचमेच्च प्रयत्नतः ॥३॥
वशिष्ठ देव कहते हैं—इसके अनन्तर मैं अग्नि तथा धूपविधि की क्रिया कहूँगा और वैसे ही स्नान, आचमन तथा अर्घ्यदान की विधि भी कहूँगा। तीन बार मृत्तिका से स्नान करके निर्मल वस्त्रयुगल पहनकर सयत्न सावित्री द्वारा आचमन करना चाहिये॥२-३॥
जलस्थो नाचमेद्विद्वाञ्जलादुत्तीर्य नित्यशः ।
आचमेत्तु प्रयत्नेन सावित्र्या सुसमाहितः ॥४॥
अप्सु सूर्यस्तथाग्निश्च नागदेवी सरस्वती ।
तस्मादुत्तीर्य चाचामेन्नोपहन्याज्जलाशयम् ॥५॥
विद्वान् व्यक्ति जल के मध्य में आचमन नहीं करना चाहिये। सर्वदा जल से बाहर आकर (थल पर) यत्नपूर्वक सावित्री से आचमन करना चाहिये। जल के भीतर सूर्य, अग्नि तथा सरस्वती का वास होता है। अतएव जल से ऊपर आकर आचमन करना ही उचित है; ताकि जलाशय आहत न हो॥४-५॥
उपविश्य शुचौ देशे प्रयतः प्रागुदङ्मुखः ।
पादौ प्रक्षाल्य हस्तौ च अन्तर्जानुस्तथाचमेत् ॥६॥
प्रसन्नस्त्रिः पिबेदापः प्रयतः सुसमाहितः ।
द्विधापमार्जनं कृत्वा त्रिभिरभ्युक्षणं पुनः ॥७॥
षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १८१
पवित्र स्थान में संयतभाव से पूर्व अथवा उत्तरमुख बैठकर पादद्वय, हस्तद्वय तथा जानुदेश को धोकर आचमन करना चाहिये। प्रसन्न तथा संयत्त चित्त से सुसमाहित होकर तीन बार आचमनार्थ जलपान करना चाहिये। दो बार अपमार्जन करना चाहिये एवं तीन बार अभ्युक्षण करना (मस्तक पर जल छिड़कना) चाहिये॥६-७॥
मूर्द्धानखानि चात्मानमुपस्पृश्यानुपूर्वशः।
आचान्तेऽर्कं नमस्कृत्य शौचेच्छुः शुचितामियात् ॥८॥
क्रियां यः कुरुते मोहादनाचम्येह नास्तिकः।
भवति ता वृथा तस्य क्रियाः सर्वा न संशयः ॥९॥
शुचिष्कामा हि वै देवा वेदे च समुदाहृताः।
नास्तिकं चाशुचिं चैव वर्जयन्ति सदा सुराः ॥१०॥
मस्तक, सभी नख तथा हृदय का आनुपूर्वीक स्पर्श करके आचमनोपरान्त सूर्य को नमस्कार करके शुचिताकामी लोग पवित्र हो जाते हैं। जो नास्तिक व्यक्ति मोहवशात् आचमन किये बिना कार्य (पूजनादि कार्य) करता है, उसके सभी कर्म व्यर्थ हो जाते हैं; इस सम्बन्ध में कोई संशय नहीं है। देवगण पवित्रता चाहते हैं—ऐसा वेद का वचन है। नास्तिक तथा अशुचि व्यक्ति का देवगण सर्वदा त्याग कर देते हैं॥८-१०॥
ऋषयः पितरश्चापि ये चान्येऽपि शुचिव्रताः।
शौचमेवं प्रशंसन्ति शौचाज्ज्ञानं विधीयते ॥११॥
आचान्तो मौनमास्थाय देवागारं विशेषतः।
श्वासान्तर्हि निमित्तं हि प्राणमाच्छाद्य वाससा ॥१२॥
ऋषिगण, पितृपुरुष गण तथा और अन्य जो शुचिपरायण हैं, उन्होंने ऐसे शौच की प्रशंसा की है। शौच से ज्ञान प्राप्त होता है। आचमन के पश्चात् विशेषतः देवालय में मौन रहना चाहिये। वस्त्र द्वारा प्राणवायु का आच्छादन करके अन्तःश्वास लेना चाहिये॥११-१२॥
शिरः प्रावृत्य चैवाथ केशोदविनिवृत्तये।
ततः पूजां रवेः कुर्यात् पुष्पैर्नानाविधैः शुभैः ॥१३॥
तदनन्तर केश का जल सुखाने के लिये मस्तक को ढक कर नानाविध शुभ पुष्पों से सूर्य की पूजा करनी चाहिये॥१३॥
जपेन वर्तमानेन संहितायां करज्जपन्।
धूपं ततोऽग्नये दत्वा प्रथमं गुग्गुलाहुतिम् ॥१४॥
पुष्पाञ्जलिं ततो गृह्य तच्छिलायां प्रधूप्य च।
रवेर्मूर्द्धनि तं दत्वा वाचमेतामुदाहरेत् ॥१५॥
१८२ श्रीसाम्बपुराणम्
अंगुलियों को एकत्र करके जप करना चाहिये। तत्पश्चात् अग्नि के लिये धूपदान करना चाहिये। प्रथमतः गुग्गुलु की आहुति प्रदान करनी चाहिये। तदनन्तर पुष्पाञ्जलि लेकर उस शिला को प्रधूमित करके सूर्यदेव के मस्तक पर उस पुष्पाञ्जलि को देते समय नीचे लिखे मन्त्र का पाठ करना चाहिये।।१४-१५।।
ॐ व्रतनयं व्रतिनो वर्द्धयन्ति देवा मनुष्या पितरश्च सर्वे।
तस्यादित्यस्य प्रसवामनामहे यस्तेजसः प्रथममजो विभाति ॥१६॥
देवता, मनुष्य तथा पितृपुरुषगण व्रतपरायण होकर जिस व्रत के नायक का वर्धन करते हैं, उन आदित्य के प्रकाश में हम प्राण धारण करते हैं, जो तेज के प्रथम रूप में प्रकाशित होते हैं।।१६।।
धूपवेलाः स्मृताः पञ्च जपेष््वेवं च पञ्चसु।
महाविद्यासु याः पञ्च वक्ष्येऽहं ताः पुनः क्रमात् ॥१७॥
पाँच बार धूप देने की बात कही गयी है, उसी प्रकार से पाँच बार जप का भी विधान बताया गया है। महाविद्या की जो पाँच वेला है, उसे मैं क्रमानुसार कहता हूँ।।१७।।
दण्डनायकवेला तु प्रदोषे ऋक्षदर्शनात्।
राज्ञीवेला तु प्रत्यूषे तद्वत् कार्या विजानता ॥१८॥
त्रिकालं तु रवेः पूजा कर्तव्या सूर्यदर्शनात्।
अर्द्धोदिते खमध्यस्थे भानोर्वास्तंगते तथा ॥१९॥
प्रदोषकाल में नक्षत्रदर्शन होने तक दण्डनायक वेला होती है। प्रत्यूष काल में राज्ञी वेला होती है। सूर्योदय के उपरान्त तीन वेला में रवि का पूजन किया जाता है—सूर्य के अर्धोदय काल में, सूर्य के मध्यगमन में रहते समय, सूर्य के अस्तगमन के समय (ये पाँच वेलायें होती हैं)।।१८-१९।।
मिहिराय च पूर्वाह्णे मध्याह्ने ज्वलनाय च।
अर्धोद्यन्मण्डले देया नीचाह्ने वरुणाय च ॥२०॥
पूर्वाह्न में सूर्य की, मध्याह्न में अग्नि की, अर्धोदित काल में मण्डल की तथा अपराह्न में वरुण की पूजा करनी चाहिये।।२०।।
रक्तचन्दनमिश्राणि गन्धोदकयुतानि च।
पद्मानि करवीराणि तथा रक्तोत्पलानि च ॥२१॥
कुङ्कुमोदकमिश्राणि तथा कुरूण्टकानि च।
गन्धाद्यान्यथवान्यानि कृत्वा ताम्रस्य भाजने ॥२२॥
भूयो धूपं ततो दद्यात् समन्त्रं गुग्गुलाहुतिम्।
अर्घ्यपात्रं ततो गृह्य कुर्यादावाहनं रवेः ॥२३॥
षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १८३
रक्तचन्दन-मिश्रित, गंगाजलयुक्त, पद्म, कनेर, रक्तपद्म, कुङ्कुम जल-मिश्रित, कुरुंटक (झिन्टीवृक्ष) एवं अन्यान्य गन्धादि द्रव्य को ताम्रपात्र में रखकर अर्घ्य देना चाहिये। धूप देकर मन्त्र के साथ गुग्गुलु की आहुति प्रदान करनी चाहिये। तदनन्तर अर्घ्यपात्र लेकर नीचे लिखे मन्त्र द्वारा सूर्य का आवाहन किया जाता है।।२१-२३।।
एहि सूर्य! सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर ॥२४॥
हे सूर्य! आप आईये! सहस्त्रकिरण, तेजोराशि, जगत्पति! मेरी भक्ति से मेरे प्रति कृपा करिये। हे दिवाकर! मेरा अर्घ्य ग्रहण करिये।।२४।।
अनेनावाहनं कृत्वा जानुभ्यां संस्थितः क्षितौ।
रवेर्निवेदयेदर्घमादित्यहृदयं जपेत् ॥२५॥
इस मन्त्र से सूर्यदेव का आवाहन करके भूमि पर अपने जंघाओं को स्थापित करके सूर्य को अर्घ्यदान करके आदित्यदेव का जप करना चाहिये।।२५।।
ॐ नमो भगवते आदित्याय वरिष्ठाय वरेण्याय ब्रह्मलोकैककर्त्रे।
ॐ ईशानाय पुराणाय पुराणपुरुषाय च ॥२६॥
ॐ सोमाय च ऋग्यजुःसामाथर्वणे नमः ॥२७॥
ॐ भूः ॐ भुवः स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्।
ब्रह्मणे मध्यपरत आदित्यायेति स्वाहा ॥२८॥
'ॐ नमो भगवते' इत्यादि २६ से २८ श्लोक-पर्यन्त लिखे मन्त्र से धूप निवेदित करना चाहिये। मन्त्रार्थ है—श्रेष्ठ, वरेण्य, ब्रह्मलोक के एकमात्र कर्त्ता आदित्यदेव को नमस्कार है। ईशान, पुराण तथा पुराणपुरुष को नमस्कार है। सोम तथा ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्व को नमस्कार है। महाव्याहृति मन्त्र—भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य तथा ब्रह्मरूप आदित्य के लिये स्वाहा मन्त्र से निवेदन करता हूँ।।२६-२८।।
सावित्र्या परिपूतेन वारिणा तु ततः परम्।
परितः परिमृज्याथ धूपभाजनमुच्छ्रियेत् ॥२९॥
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥३०॥
ततो निवेदयेद् धूपं त्वचमेतामुदाहरन् ॥३१॥
तदनन्तर गायत्री मन्त्र से परिपूत जल द्वारा धूपपात्र का मार्जन करके उसे उत्तोलित करना चाहिये। तदनन्तर गायत्री मन्त्र से धूप निवेदित करना चाहिये। परिपूत मन्त्र श्लोक २९ में है। गायत्री मन्त्र श्लोक ३० में है।।२९-३१।।
त्वमेको रुद्राणां वसूनां पुरातनो
देवानां गीर्भिरभिष्टुतः शाश्वतो दिवि ॥३२॥
१८४ श्रीसाम्बपुराणम्
हे सूर्यदेव! एकमात्र आप रुद्रगण तथा वसुओं में पुरातन हैं। आप द्युलोक में नित्य देवगण द्वारा स्तुत हैं। यह धूपदान मन्त्र है॥३२॥
पूर्वाह्णेऽनेन मन्त्रेण मध्याह्ने चाप्यनेन तु॥३३॥ ॐ नमो ज्वालामालाय तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततं सायाह्ने चाप्यनेन तु॥३४॥
पूर्वाह्न तथा मध्याह्न में पूर्वोक्त मन्त्र से पूजन करे; किन्तु सायाह्न काल में ‘ॐ नमो ज्वालामालाय तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः दिवीव चक्षुराततं’ मन्त्र से पूजा करनी चाहिये। मन्त्रार्थ है—जो अग्निज्वाला के समान किरणों का विस्तार करते हैं, उन सूर्यदेव को नमस्कार है। उन विष्णु के परमपद का सूरीगण नित्य दर्शन करते हैं। आकाश में उनके चक्षु विस्तृत रहते हैं॥३३-३४॥
ॐ नमो वरुणाय ॐ आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्मयेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्॥३५॥ अनेन विधिना दत्वा धूपं सूर्याय याजकः। उत्क्षिप्तेनैव धूपेन विशेद् गर्भगृहं ततः॥३६॥
तदनन्तर ‘ॐ नमो वरुणाय’ से लेकर ‘भुवनानि पश्यन्’ तक के मन्त्र से सूर्य को धूपदान करके (सूर्य के लिये) गर्भगृह में प्रवेश करना चाहिये॥३५-३६॥
ततः प्रविश्य धूपं तु प्रतिमायै निवेदयेत्। मन्त्रेण मिहिरायेति धूपं दत्वेति नित्यशः॥३७॥
प्रवेश करके प्रतिमा को धूप निवेदन करना चाहिये। ‘मिहिराय’ इत्यादि मन्त्र से नित्य धूप देना चाहिये॥३७॥
ततो राज्ञीं नमस्कृत्य निक्षुभायै नमो नमः। दण्डनायकसंज्ञाय पिङ्गलाय च वै नमः॥३८॥
तदनन्तर सूर्यपत्नी राज्ञी को नमस्कार करे। सूर्यपत्नी निक्षुभा को भी नमस्कार करे। तत्पश्चात् दण्डनायक तथा पिङ्गला को भी नमस्कार करना चाहिये॥३८॥
ततो राज्ञे च तोषाय कल्माषाय गरुत्मते। ततः प्रदक्षिणां कुर्वन् दिग्देवेभ्यो निवेदयेत्॥३९॥
तत्पश्चात् राजा, तोष, कल्माष तथा गरुड़ को नमस्कार करना चाहिये। तदनन्तर प्रदक्षिणा करके उसे दिक् देवगण को निवेदन करना चाहिये॥३९॥
षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १८५
दण्डिने च ततो दद्याद्रैवन्तानुचराय च।
पूर्वेण नम इन्द्राय दक्षिणेन यमाय च॥४०॥
पश्चिमेन जलेशाय कुबेरायोत्तरेण च।
उत्तरेणैव सोमाय दद्याद्धूपं विचक्षणः॥४१॥
तदनन्तर दण्डी तथा रैवन्त के अनुचर गण को निवेदन करना चाहिये। 'नमः इन्द्राय' मन्त्र से पूर्व की ओर इन्द्र को, दक्षिण में यम को, पश्चिम में वरुण को, उत्तर में कुबेर को तथा विचक्षण व्यक्ति को उत्तर दिशा में चन्द्र को भी धूप प्रदान करना चाहिये॥४०-४१॥
शृङ्गे सौमनसे धूपमीशानाय निवेदयेत्।
ज्योतिषं त्वग्नये दत्वा पितृभ्यश्चित्रसंज्ञके॥४२॥
शृङ्ग में सुमना ईशान को धूप निवेदन करना चाहिये। अग्नि में धूप देकर चित्र-संज्ञक पितृपुरुषों को धूप प्रदान करना चाहिये॥४२॥
चन्द्रमासे ततः शृङ्गे धूपं दत्त्वा तु वायवे।
मध्ये नारायणाख्याय सूर्याय परमात्मने॥४३॥
तदनन्तर चन्द्रमास में शृङ्ग में वायु को धूप प्रदान करना चाहिये। मध्य में नारायण नामक सूर्य परमात्मा को धूप प्रदान करना चाहिये॥४३॥
आदित्येभ्योऽथ रुद्रेभ्यो मरुद्भ्यश्चाश्विनोस्तथा।
याह्यस्मिन् देवता व्योम्नि नमस्ताभ्योऽपि नित्यशः॥४४॥
आदित्यगण, रुद्रगण, मरुद्गण, अश्विनी कुमारद्वय के लिये धूप निवेदित करना चाहिये। मन्त्र है—हे देवगण! इस आकाश में गमन करिये। उन देवगण को नित्य नमस्कार करता हूँ॥४४॥
एवमुद्दिश्य नामानि धूपं दत्वा ततः स्तवैः।
उत्क्षिप्तो यत्र वै धूपो मुक्त्वा तत्रैव तं पुनः॥४५॥
इस प्रकार से देवताओं का नामोल्लेख करके धूप देने के अनन्तर उनके स्तव से स्तुति करनी चाहिये। जहाँ धूप उत्क्षिप्त होती है, पुनः वहीं जाना चाहिये॥४५॥
सूर्य गुह्यैरभिष्टुत्य ह्येवं विज्ञापयेत्ततः।
अर्चतो हि यथाशक्त्या मया शक्त्या विभावसोः॥४६॥
ऐहिकामुष्मिकीं नाथ कार्यसिद्धिं कुरुष्व मे।
गुह्य मन्त्र से सूर्य का स्तव करके तदनन्तर उनसे प्रार्थना करनी चाहिये—'हे विभावसु! मैं यथाशक्ति भक्तिमान् चित्त से आपकी अर्चना करता हूँ। हे नाथ! मेरी ऐहिक तथा पारलौकिक कार्यसिद्धि करिये॥४६॥
१८६ श्रीसाम्बपुराणम्
एवं त्रिषवणस्नातो योऽर्चयेत् प्रयतः सदा।
विधिना तु यथोक्तेन सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥४७॥
इस प्रकार से जो प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकाल (तीन बार) स्नान करके संयत होकर सर्वदा यथोक्त विधानानुसार सूर्यदेव की अर्चना करते हैं, वे अश्वमेध यज्ञ का फललाभ करते हैं॥४७॥
यश्चैवं कुरुते नित्यं यथोक्तं धूपविस्तरम्।
स पुत्रवानरोगी च मृतः संलीयते रवौ॥४८॥
विधिना तु यथोक्तेन क्रियमाणानि यत्नतः।
सर्वकर्माणि सिध्यन्ति सफलानि भवन्ति च॥४९॥
जो नित्य इस प्रकार से विधान के अनुसार धूपदान करते हैं, वे पुत्रवान तथा आरोग्यवान होकर मृत्यु के पश्चात् सूर्य में लीन हो जाते हैं। यथोक्त विधानानुसार सयत्न क्रियमाण सभी कार्य सिद्ध तथा सफल होते हैं॥४८-४९॥
पुष्पश्रेष्ठं च दानं स्यात् पत्रं समुपहारयेत्।
पत्रं न स्यात्ततो धूपं धूपो न स्यात्ततो जलम्॥५०॥
सर्वं न स्यात्तदा चैव प्रणिपातेन पूजयेत्।
अशक्तः प्रणिपातेऽपि मनसा पूजयेत्ततः॥५१॥
पुष्प ही श्रेष्ठ दान है। उसके अभाव में पत्र प्रदान करे। (पत्र) पत्ता न मिलने पर धूप प्रदान करे। धूप भी न मिले, तब जल प्रदान करे। यदि जल भी न मिले, तब प्रणाम करके पूजन करे। यदि प्रणाम करने में भी असमर्थता हो, तब मन ही मन पूजा करनी चाहिये॥५०-५१॥
असम्भवे तु द्रव्याणां विधिरेष प्रकीर्तितः।
द्रव्याणां सम्भवे चैव सर्वमेवोपहारयेत्॥५२॥
मन्त्राद्याः कथिता ये तु पुष्पधूपनिवेदने।
व्याहारात् स्मरणाच्चैव तेषां प्रीतो भवेद्रविः॥५३॥
इति श्रीसाम्बपुराणे अग्निधूपविधिर्नाम षट्त्रिंशत्तितमोऽध्यायः
यदि कोई द्रव्यहीन हो, तब यह विधि है। यदि द्रव्यों का संग्रह सम्भव हो, तब सबका संग्रह करना चाहिये। पुष्प तथा धूप-निवेदनार्थ जिन मन्त्रों को कहा गया है, उनके कहने से तथा स्मरण करने से भी सूर्य के प्रति प्रीति उत्पन्न होती है॥५२-५३॥
श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत अग्निधूपदानविधि नामक छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त
सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः
(अग्निविधानम्)
वसिष्ठ उवाच
अतोऽग्रे संप्रवक्ष्यामि विधानमनुपूर्वशः ।
धूपो निवेद्यते येन आदित्यस्याग्निना सदा ॥१॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—इसके पश्चात् मैं तुमसे पहले आनुपूर्वीक विधान का वर्णन करता हूँ, जिसमें अग्नि के साथ सूर्यदेव को धूप निवेदन करना होगा ॥१॥
शुचिरग्निः स्मृतः सूर्यो वायुस्तस्य सुतः स्मृतः ।
अस्यान्तःस्थः स वै यस्मात्ततोऽसौ वायु नान्तरः ॥२॥
अतोऽस्य तेज उत्थाप्य रवेर्धूपं निवेदयेत् ।
तमुत्थाप्य विधानेन शुचौ देशे निवेश्य च ॥३॥
मन्त्रेण तु रविं देवं नित्यमेवं प्रसादयेत् ।
अरण्यां तु शमीमय्यां पिप्पल्यां पुत्रकं रवेः ॥४॥
निर्मथ्य तं समुत्थाप्य धमयेत् व्यजनेन तु ।
मूर्तिमुल्लिख्य दर्भेण ह्यग्निं संस्थाप्य यत्नतः ॥५॥
पवित्र अग्नि को सूर्य कहा गया है। वायु को उनका पुत्र कहा जाता है। यद्यपि अग्नि के अन्तर में सूर्य रहते हैं, इसीलिये उसे वायु से पृथक् कहा गया है। इसीलिये अग्नि के तेज का उत्पादन करके (अग्नि प्रज्वलित करके) सूर्य को धूप दिया जाता है। विधानपूर्वक पवित्र देश में अग्नि उत्पन्न करके मन्त्रों द्वारा नित्य सूर्यदेव की प्रसन्नता प्राप्त करनी चाहिये। अरणि काष्ठ में, शमीवृक्ष में, रवि के पुत्र पिप्पली वृक्ष में मन्थन करके व्यजन (पंखा) द्वारा हवा देनी चाहिये। कुश से मूर्त्ति का निर्माण करके यत्नपूर्वक अग्नि में स्थापित करना चाहिये ॥२-५॥
ततः स्रुचं स्रुवं चैव प्रणीतामाज्यभाजनम् ।
प्रमृज्य स्पर्शयेदग्निं कुशेनाग्निं च संस्पृशेत् ॥६॥
कुशं गृह्य तु हस्ताभ्यामाज्यं प्रथममुत्सृजेत् ।
नाग्निं मुखेनोपधमेन्न च पादौ प्रतापयेत् ॥७॥
अधस्तान्नोपधमायाच्च न चैनमभिलङ्घयेत् ।
सुसमिद्धं ततः कृत्वा होमयेज्जातवेदसम् ॥८॥
१८८ श्रीसाम्बपुराणम्
तदनन्तर स्रुच, स्रुवा, प्रणीता, घृतपात्र की मार्जना करके अग्नि का स्पर्श कराये। इसके पश्चात् कुश के द्वारा अग्नि का स्पर्श कराना चाहिये। दोनों हाथों में कुश लेकर प्रथमतः घृत-दान करना चाहिये। अग्नि को मुँह से नहीं फूँकना चाहिये। पैर आगे करके अग्नि का ताप नहीं लेना चाहिये। अग्नि का कभी लङ्घन नहीं करना चाहिये। अग्नि को सम्यक् रूप से प्रज्ज्वलित करके ही अग्नि में होम करना चाहिये।।६-८।।
प्रादेशमात्राः कर्तव्याः समिधोऽथ प्रमाणतः।
पृथुप्रमाणा कर्तव्या देवदारुमयी तथा।।९।।
अतिमात्रा तथेध्माश्च कर्तव्याः स्वप्रमाणतः।
पालाशोऽर्कस्त्वपामार्गः शम्यश्वत्था विकङ्कतः।।१०।।
ऊदुम्बरस्तथा बिल्वश्चन्दनो यज्ञियाश्च ये।
सरलो देवदारुश्च शालश्च खदिरस्तथा।।११।।
समिदर्थे प्रशस्तास्तु वृक्षा होते प्रकीर्तिताः।
समिधा (यज्ञ काष्ठ) को प्रादेश (आधा हाथ) प्रमाण का होना चाहिये। देवदारु काष्ठ स्थूल प्रमाण का होता है। पलाश, मदार, अपामार्ग, शमी, पीपल, विकङ्कत, ऊदुम्बर, बेल, चन्दन एवं यज्ञीय सरल, देवदारु, शाल तथा खदिर को समिधा के लिये प्रशस्त माना गया है।।९-११।।
श्लेष्मातको नक्तमालः कपित्थः शाल्मली तथा।।१२।।
बिल्वजः कोविदारश्च करञ्जः शल्लकी द्रुमः।
चिरबिल्वस्तथाक्रोन्टस्तिक्तकाम्नातकौ तथा।।१३।।
निम्बो विभीतकश्चैते होमकर्मणि गर्हिताः।।१४।।
श्लेष्मातक, नक्तमाल (कञ्जक वृक्ष), कपित्थ (काक्षी नामक सुगन्ध काष्ठ), शाल्मली (सेमल), बिल्वंज, कोविदार (मन्दार), करञ्ज, शल्लली, चिरबिल्व, कोण्ट, चिरायता, आमडा, नीम, बहेड़ा का काष्ठ होमकार्य हेतु निन्दित कहा गया है।।१२-१४।।
एवं समेधितस्याग्नेः समन्तात् कुशविष्टरम्।
दत्वा प्रागुत्तमं तन्तु ततस्तं परिमार्जयेत्।
सावित्रीमन्त्रपूतेन वारिणा त्रिः समन्ततः।।१५।।
समिधा के चतुर्दिक कुश बिछाकर पूर्व की ओर उत्तम कुश से सावित्री मन्त्र के द्वारा पवित्र जल छिड़कते हुये तीन बार परिमार्जन करना चाहिये।।१५।।
ततः कुशमयं कृत्वा ह्यात्मनोऽथाङ्गुलीयकम्।
ततोऽग्नेर्दक्षिणे पार्श्वे कल्पयेद् ब्रह्मणस्तनुम्।।१६।।
ततः स्रुचं स्रुवं चैव प्रणीतामाज्यभाजनम्।
प्रक्षाल्य स्पर्शयेदग्निं स्रुवं चाज्येन संस्पृशेत्।।१७।।
सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः १८९
ततो भूमौ निषण्णेन जानुना सुसमाहितः ।
पाणी तु पुटकौ कृत्वा प्रणमेज्जातवेदसम् ॥१८॥
आह्वानं तु ततः कृत्वा रवेस्तत्र समाहितः ।
पुराणोक्तेन मन्त्रेण ह्यनेनाथ कृताञ्जलिः ॥१९॥
तदनन्तर कुश की अंगूठी तैयार करके (पवित्री तैयार करके) अग्नि के दक्षिण पार्श्व में (कुश द्वारा) ब्रह्मा के शरीर की कल्पना करनी चाहिये। सुच, स्रुवा, प्रणीता, घृतपात्र का प्रक्षालन करके अग्नि का स्पर्श कराये तथा स्रुव का घृत से स्पर्श कराये। तदनन्तर भूमि पर जानु रखकर बैठकर समाहित होकर हाथ जोड़कर अग्नि को प्रणाम करना चाहिये। तत्पश्चात् समाहित होकर सूर्यदेव का आह्वान करके कृताञ्जलि होकर नीचे लिखा मन्त्र पढ़ना चाहिये॥१६-१९॥
नमो नमो यो भवतीह शश्वदुत्तिष्ठमानो जगतो हिताय ।
आवाहयाम्यद्य तमीशमाद्यं करोतु सोऽग्नाविह सन्निधानम् ॥२०॥
एहोहि सूर्याक्षयविश्वमूर्ते अविन्ध्यनोऽग्नेः शुचिनामधेयः ।
इमां स्वकीयां तनुमाविशस्व हविर्हुतं देवमथा समीक्ष्य ॥२१॥
जो निरन्तर जगत के हितार्थ सन्नद्ध हैं, उन्हें नमस्कार है, नमस्कार है। उन आद्य ईश्वर का मैं आज आह्वान करता हूँ। वे इस अग्नि में सन्निहित हो जायँ। हे सूर्य! आप अक्षय, विश्वमूर्ति हैं, आईये। आप शुचि नामक अग्नि की प्रतिमूर्ति हैं। हे देव! मैं अग्नि में आहुति दे रहा हूँ। यह देखकर आप अपने इस निज शरीर में प्रविष्ट हो जाईये॥२०-२१॥
एवं कृत्वाग्निसंस्कारं साह्वानं च दिवाकरम् ।
ततो विज्ञापयेदग्निमृचमेतामुदाहरेत् ॥२२॥
इस प्रकार से अग्नि का संस्कार करके तथा सूर्यदेव का आवाहन करके अग्नि की प्रर्थना करे तथा नीचे लिखे ऋक् मन्त्र का उच्चारण करे॥२२॥
ममागने वर्चो विहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम ।
मह्यं नमस्तां प्रदिशश्चतस्त्रस्त्वयाध्यक्षेण पृतना जयेम ॥२३॥
उत्तिष्ठ पुरुषर्षभहरिपिंगलदीप्तजिह्व
लोहिताक्ष देहि मे ददामि ते स्वाहा ॥२४॥
हे अग्नि! हमारा तेज........प्रसरित हो। यज्ञकारी हम आपके तनु का पोषण करेंगे। आपके अध्यक्षरूप से होने पर चारो ओर के लोग हमसे अवनत होंगे और हमारी जय शत्रुसेना पर होगी। हे पुरुषश्रेष्ठ! हरित एवं पिङ्गल वर्ण दीप्त जिह्वा वाले! आप उठिये। हे लोहिताक्ष! हमें दीजिये। हम आपको स्वाहा मन्त्र से आहुति दे रहे हैं॥२३-२४॥
१९० श्रीसाम्बपुराणम्
ततः परमग्निहोत्रमन्त्रेण मार्गमुच्चरन् परमाहुतिं दद्यादादाय स्वाहा ॥२५॥
तत्पश्चात् अग्निहोत्र मन्त्र का उच्चारण करके स्वाहा शब्द लगाकर पुण्याहुति प्रदान करनी चाहिये॥२५॥
तथैव च यत्र आत्मीये म त्विषासहिताय च।
ततः प्रादेशमात्राभिः पलाशोभिर्यथाविधि ॥२६॥
देवदारुमयीभिश्च शमीमयीभिरेव च।
समिद्भिश्च घृताक्ताभिर्होमयेज्जातवेदसम् ॥२७॥
रत्निमात्रं स्रुवं गृह्य घृतेनैव तु होमयेत्।
ततः क्षीरेण गव्येन ततोऽन्नेन च होमयेत् ॥२८॥
इस प्रकार से यज्ञ में त्विषा के साथ आधा हाथ माप के पलाश, देवदारु, शमी काष्ठ से घृत से अग्नि में होम करे॥२६-२८॥
नवाभिरोषधीभिश्च तिल-व्रीहि-यवैस्तथा।
शालीफलकश्यामाकैर्गोधूमैश्चैव होमयेत् ॥२९॥
नव औषधि, तिल, व्रीहि, जौ, शालीफलक, श्यामाक तथा गोधूम द्वारा होम करे॥२९॥
पौर्णमास्याममायां वा होमयेच्च विशेषतः।
चैत्र्यां तथाऽश्वयुज्यां च कुर्यादग्निं तथा क्रियाम् ॥३०॥
पूर्णिमा तथा अमावस्या को विशेष रूप से होम करे। विशेषतः चैत्र तथा अश्विन मास की पूर्णिमा एवं अमावस्या को होम करे॥३०॥
बहुहव्येन्धनैश्चाग्नौ सुसमिद्धे विशेषतः।
विधूमे लेलिहाने च होमये कर्मसिद्धये ॥३१॥
अनेक द्रव्य तथा काष्ठ से अग्नि प्रदीप्त हो, उससे धुआँ न उठे। लोहित वर्ण प्रज्वलित अग्निशिखा में कर्मसिद्धि के लिये होम करना चाहिये॥३१॥
अप्रबुद्धे सधूमे वा जुहुयान्न हुताशने।
यजमानो भवेद्न्यो ह्यपुत्र इति च श्रुतिः ॥३२॥
जब तक अग्नि सम्यक् रूप से प्रज्वलित न हो अथवा धूम्र से रहित न हो तब तक आहुति नहीं देनी चाहिये। ऐसा करने पर यजमान अन्धा तथा पुत्रहीन हो जाता है। यह श्रुतिवाक्य है॥३२॥
अर्चिष्मान् पीडितशिखस्तप्तकाञ्चनसन्निभः।
स्निग्धः प्रदक्षिणावर्त्तो वह्निः स्यात्कार्यसिद्धये ॥३३॥
सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः । १९१
नैवाकल्याणी युवतिर्नाल्पविद्यो न बालिशः।
होता स्यादग्निहोत्रस्य नार्त्तो नासंस्कृतस्तथा॥३४॥
नरकन्तु पतन्त्येते जुह्वतश्च धनक्षयः।
तस्माद्विज्ञानकुशलो होता स्याद्वेदपारगः॥३५॥
प्रदीप्त उज्ज्वल शिखायुक्त काञ्चन तुल्य स्निग्ध दक्षिणावर्त्त अग्नि से कार्यसिद्धि होती है। अग्निहोत्र का होता कभी भी अकल्याणी युवती, अल्पविद्य, मूर्ख, आर्त्त अथवा असंस्कृत न हो। होता व्यक्ति के पूर्वोक्त प्रकार की अग्नि से अतिरिक्त अग्नि में आहुति देने से नरकगामी हो जाता है। यजमान का धनक्षय होता है। अतः ज्ञानकुशल, वेदवित् होता होना चाहिये॥३३-३५॥
यत्फलं कर्मणस्तस्य ततो निगदितं शृणु।
अध्यक्षः सर्वकामोऽयं सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥३६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे अग्निविधानं नाम सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः
यज्ञादि कर्म का जो फल है, उसे सुनो। समस्त कामना के अध्यक्ष (यज्ञकर्त्ता) अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करते हैं॥३६॥
श्री साम्बपुराणोक्त अग्निविधान नामक सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त