भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 198

१८८ श्रीसाम्बपुराणम्

तदनन्तर स्रुच, स्रुवा, प्रणीता, घृतपात्र की मार्जना करके अग्नि का स्पर्श कराये। इसके पश्चात् कुश के द्वारा अग्नि का स्पर्श कराना चाहिये। दोनों हाथों में कुश लेकर प्रथमतः घृत-दान करना चाहिये। अग्नि को मुँह से नहीं फूँकना चाहिये। पैर आगे करके अग्नि का ताप नहीं लेना चाहिये। अग्नि का कभी लङ्घन नहीं करना चाहिये। अग्नि को सम्यक् रूप से प्रज्ज्वलित करके ही अग्नि में होम करना चाहिये।।६-८।।

प्रादेशमात्राः कर्तव्याः समिधोऽथ प्रमाणतः।
पृथुप्रमाणा कर्तव्या देवदारुमयी तथा।।९।।
अतिमात्रा तथेध्माश्च कर्तव्याः स्वप्रमाणतः।
पालाशोऽर्कस्त्वपामार्गः शम्यश्वत्था विकङ्कतः।।१०।।
ऊदुम्बरस्तथा बिल्वश्चन्दनो यज्ञियाश्च ये।
सरलो देवदारुश्च शालश्च खदिरस्तथा।।११।।
समिदर्थे प्रशस्तास्तु वृक्षा होते प्रकीर्तिताः।

समिधा (यज्ञ काष्ठ) को प्रादेश (आधा हाथ) प्रमाण का होना चाहिये। देवदारु काष्ठ स्थूल प्रमाण का होता है। पलाश, मदार, अपामार्ग, शमी, पीपल, विकङ्कत, ऊदुम्बर, बेल, चन्दन एवं यज्ञीय सरल, देवदारु, शाल तथा खदिर को समिधा के लिये प्रशस्त माना गया है।।९-११।।

श्लेष्मातको नक्तमालः कपित्थः शाल्मली तथा।।१२।।
बिल्वजः कोविदारश्च करञ्जः शल्लकी द्रुमः।
चिरबिल्वस्तथाक्रोन्टस्तिक्तकाम्नातकौ तथा।।१३।।
निम्बो विभीतकश्चैते होमकर्मणि गर्हिताः।।१४।।

श्लेष्मातक, नक्तमाल (कञ्जक वृक्ष), कपित्थ (काक्षी नामक सुगन्ध काष्ठ), शाल्मली (सेमल), बिल्वंज, कोविदार (मन्दार), करञ्ज, शल्लली, चिरबिल्व, कोण्ट, चिरायता, आमडा, नीम, बहेड़ा का काष्ठ होमकार्य हेतु निन्दित कहा गया है।।१२-१४।।

एवं समेधितस्याग्नेः समन्तात् कुशविष्टरम्।
दत्वा प्रागुत्तमं तन्तु ततस्तं परिमार्जयेत्।
सावित्रीमन्त्रपूतेन वारिणा त्रिः समन्ततः।।१५।।

समिधा के चतुर्दिक कुश बिछाकर पूर्व की ओर उत्तम कुश से सावित्री मन्त्र के द्वारा पवित्र जल छिड़कते हुये तीन बार परिमार्जन करना चाहिये।।१५।।

ततः कुशमयं कृत्वा ह्यात्मनोऽथाङ्गुलीयकम्।
ततोऽग्नेर्दक्षिणे पार्श्वे कल्पयेद् ब्रह्मणस्तनुम्।।१६।।
ततः स्रुचं स्रुवं चैव प्रणीतामाज्यभाजनम्।
प्रक्षाल्य स्पर्शयेदग्निं स्रुवं चाज्येन संस्पृशेत्।।१७।।