भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 197

सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः

(अग्निविधानम्)

वसिष्ठ उवाच

अतोऽग्रे संप्रवक्ष्यामि विधानमनुपूर्वशः ।
धूपो निवेद्यते येन आदित्यस्याग्निना सदा ॥१॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—इसके पश्चात् मैं तुमसे पहले आनुपूर्वीक विधान का वर्णन करता हूँ, जिसमें अग्नि के साथ सूर्यदेव को धूप निवेदन करना होगा ॥१॥

शुचिरग्निः स्मृतः सूर्यो वायुस्तस्य सुतः स्मृतः ।
अस्यान्तःस्थः स वै यस्मात्ततोऽसौ वायु नान्तरः ॥२॥
अतोऽस्य तेज उत्थाप्य रवेर्धूपं निवेदयेत् ।
तमुत्थाप्य विधानेन शुचौ देशे निवेश्य च ॥३॥
मन्त्रेण तु रविं देवं नित्यमेवं प्रसादयेत् ।
अरण्यां तु शमीमय्यां पिप्पल्यां पुत्रकं रवेः ॥४॥
निर्मथ्य तं समुत्थाप्य धमयेत् व्यजनेन तु ।
मूर्तिमुल्लिख्य दर्भेण ह्यग्निं संस्थाप्य यत्नतः ॥५॥

पवित्र अग्नि को सूर्य कहा गया है। वायु को उनका पुत्र कहा जाता है। यद्यपि अग्नि के अन्तर में सूर्य रहते हैं, इसीलिये उसे वायु से पृथक् कहा गया है। इसीलिये अग्नि के तेज का उत्पादन करके (अग्नि प्रज्वलित करके) सूर्य को धूप दिया जाता है। विधानपूर्वक पवित्र देश में अग्नि उत्पन्न करके मन्त्रों द्वारा नित्य सूर्यदेव की प्रसन्नता प्राप्त करनी चाहिये। अरणि काष्ठ में, शमीवृक्ष में, रवि के पुत्र पिप्पली वृक्ष में मन्थन करके व्यजन (पंखा) द्वारा हवा देनी चाहिये। कुश से मूर्त्ति का निर्माण करके यत्नपूर्वक अग्नि में स्थापित करना चाहिये ॥२-५॥

ततः स्रुचं स्रुवं चैव प्रणीतामाज्यभाजनम् ।
प्रमृज्य स्पर्शयेदग्निं कुशेनाग्निं च संस्पृशेत् ॥६॥
कुशं गृह्य तु हस्ताभ्यामाज्यं प्रथममुत्सृजेत् ।
नाग्निं मुखेनोपधमेन्न च पादौ प्रतापयेत् ॥७॥
अधस्तान्नोपधमायाच्च न चैनमभिलङ्घयेत् ।
सुसमिद्धं ततः कृत्वा होमयेज्जातवेदसम् ॥८॥