साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पञ्चदशोऽध्यायः ७७
पञ्चदशोऽध्यायः ७७
यदोदरं ज्योतिरतिग्मकं स्थितं यदप्सु तेजो यदपीह चक्षुषि।
अग्नौ यदुष्णं भगणे यदाहितं तथैव तद्रूपमनेकधा स्थितम् ॥१३॥
जठर का जो तेज है, जल का जो तेज है, चक्षु का जो तेज है, अग्नि की जो उष्णता है और नक्षत्रों में जो तेज आहित है, वह आपका ही रूप है और आप ही अनेक रूप में अवस्थान करते हैं॥१३॥
सुरद्विषः सागरतोयवासिनः प्रचण्डपाशासिपरश्वधायुधाः।
समुत्थिता ये भुवि पापचेतसः प्रयान्ति नाशं तव देवदर्शनात् ॥१४॥
हे देव! सागर जलनिवासी, प्रचण्ड पाश, परशु तथा विविध अस्त्रधारी असुरगण एवं पृथ्वी में पापचेता जो असुर उत्थित होते हैं, वे तुम्हारे दर्शनमात्र से ही नाश प्राप्त हो जाते हैं॥१४॥
स्तुतः स भगवानेवं प्रजापतिमुखैः सुरैः।
मत्वा तेषामभिप्रायमुवाच भगवानिदम् ॥१५॥
इस प्रकार से प्रजापति-प्रमुख देवगण द्वारा स्तुत होकर सूर्यदेव उनके अभिप्राय को जानकर इस प्रकार बोले॥१५॥
हितं चोपहितं नित्यं गायत्र्यं यद्वचः परम्।
तद्वै ब्रूत सुरा क्षिप्रं किं मया क्रियतां स्वयम् ॥१६॥
आपके गायत्री-मूलक जो वाक्य हैं, वे सदा हितकारी हैं। हे देवगण! शीघ्र कहिये, मुझे क्या करना है?॥१६॥
लब्धानुज्ञास्ततस्ते तु सुराः संहृष्टमानसाः।
त्वष्टारं पूजयामासुर्मनोवाक्कायकर्मभिः ॥१७॥
आदेश पाकर देवगण हृष्टचित्त से मानसिक-वाचिक तथा कायिक कर्म से त्वष्टा (सूर्य) की पूजा करने लगे॥१७॥
ततस्तं तेजसो राशिं सर्वलोकविधानवित्।
भ्रमिमारोपयामास विश्वकर्मा विभावसुम् ॥१८॥
तदनन्तर सकल लोकों के विधानकारी विश्वकर्मा ने तेजोराशि विभावसु (सूर्य) को भ्रमि (घूर्णिचक्र) पर स्थापित किया॥१८॥
अमृतेनाभिषिक्तस्य स्तूयमानस्य चारणैः।
तेजसः शातनं चक्रे विश्वकर्मा शनैः शनैः ॥१९॥
विश्वकर्मा धीरे-धीरे अमृत से अभिषिक्त एवं चारणों द्वारा स्तूयमान सूर्यदेव के तेज का छेदन करने लगे (उनकी काट-छाँट करके मसृणता सम्पादन करने लगे)॥१९॥
७८ श्रीसाम्बपुराणम्
आजानुलिखितश्चासौ सुरासुरमनोरगैः।
नाभ्यनन्दत् सलिखनं ततस्तेनावतारितः॥२०॥
देवता, असुर तथा सर्पगण द्वारा सूर्य को जानु-पर्यन्त लिखा गया (छेदन किया गया), उसे उन्होंने अभिनन्दित नहीं किया। तब विश्वकर्मा ने उन्हें घूर्णिचक्र से उतारा॥२०॥
ततः प्रभृति देवस्य चरणौ नित्यसंवृतौ।
तापय हृदयं चैव युक्ततेजोऽभवत्ततः॥२१॥
तब से सूर्य के चरणद्वय नित्य संवृत हैं तथा वे हृदय को तप्त करने वाले तेज से युक्त हैं॥२१॥
शातितञ्चास्य यत्तेजस्तेन चक्रं विनिर्मितम्।
येन विष्णुर्जघानोग्रान् दानवानमितौजसः॥२२॥
इन सूर्य का जो तेज खण्डित किया गया था, उससे चक्र निर्मित हुआ और उस चक्र से विष्णु भगवान् ने अति तेजस्वी असुरों का विनाश किया॥२२॥
शूलशक्तिगदाचक्रं शरासनपरश्वधान्।
दैवतेभ्यो ददौ कृत्वा विश्वकर्मा महामतिः॥२३॥
महामति विश्वकर्मा ने उस तेज से शूल, शक्ति, गदा, चक्र, धनुष, बाण तथा परशु का निर्माण करके देवताओं को प्रदान किया॥२३॥
ब्रह्मवक्त्रोद्भवं स्तोत्रं संध्ययोरुभयोर्जपन्।
कुलं पुनाति पुरुषो व्याधिभिर्न च पीड्यते॥२४॥
प्रजावान् सिद्धकर्मा च जीवेत् साग्रं शरच्छतम्।
पुत्रवान् धनवांश्चैव सर्वत्रैवापराजितः॥२५॥
विभिन्नप्राणसंघाते सावित्र्यं लोकमाप्नुयात्॥२६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ब्रह्मस्तोत्रं नाम पञ्चदशोऽध्यायः
ब्रह्मा के मुख से निर्गत इस स्तोत्र को प्रातः तथा सायं सन्ध्याकाल में जो जपता है, वह पुरुष अपने कुल को पवित्र करता है और उसे व्याधिजनित पीड़ा नहीं होती। वह पुरुष प्रजायुक्त तथा सिद्धकर्मा होकर शताधिक वर्ष तक जीवित रहता है एवं पुत्रवान्, धनवान् होकर सर्वत्र विजयी होता है। विभिन्न जन्मों में क्रमशः उन्नत योनि में जन्म पाता है और पवित्र लोकों में गमन करता है॥२४-२६॥
श्री साम्बपुराण का ब्रह्मास्तव नामक पञ्चदश अध्याय समाप्त
षोडशोऽध्यायः
(सूर्यस्य परिवारवर्णनम्)
नारद उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि दण्डनायकपिङ्गलौ।
राज्ञस्तोषौ तथा चान्यान् पार्श्वस्थान् दिण्डिना सह ॥१॥
नारद कहते हैं—इसके अनन्तर दण्डनायक पिङ्गल, राज्ञ, स्तोष एवं दण्डि के साथ अन्य पार्श्वचरों की कथा कहता हूँ॥१॥
ब्रह्मणा सह संगम्य पुरा देवैर्विचारितम्।
एष कारुणिकः सूर्यो दैत्येभ्यो दास्यते वरान् ॥२॥
ते तु लब्धवरा भूत्वा बाधन्ते दिवौकसः।
तस्मात्तेषां विघातार्थमेधामः प्रणता वयम् ॥३॥
पुराकाल में एक समय देवगण ब्रह्मा के साथ बैठकर सोच रहे थे कि एकमात्र कारुणिक सूर्य दैत्यों को वर देते हैं और उनसे वर प्राप्त करके स्वर्ग में रहने वाले देवताओं को वे दैत्यगण पीड़ित करते हैं। अतएव उनको प्रतिहत करने के लिये हमको सूर्यदेव के समक्ष प्रणत होना चाहिये॥२-३॥
अस्माभिः प्रतिरुद्धास्ते न द्रक्ष्यन्ति दिवाकरम्।
सम्मन्त्र्यैवं ततस्त्विन्द्रो वामपार्श्वे रवेः स्थितः ॥४॥
दण्डनायकसंज्ञस्तु सर्वलोकस्य स प्रभुः।
उक्तश्च स तदार्केण त्वं प्रजा दण्डनायकः ॥५॥
दण्डनीतिकरो यस्मात्तस्मात्त्वं दण्डनायकः।
लिखते यः प्रजानां तु सुकृतं यच्च दुष्कृतम् ॥६॥
हमारे द्वारा प्रतिरुद्ध होकर वे (असुर) दिवाकर सूर्य को नहीं देख पायेंगे। इस प्रकार मन्त्रणा करके इन्द्र ने रवि के वाम पार्श्व में अवस्थान किया। दण्डनायक नाम से प्रसिद्ध वे सभी लोकों के प्रभु हैं। उनसे सूर्यदेव ने कहा—तुम प्रजागण के दण्ड का विधान करो। दण्डनीति का विधान करने के लिये तुम दण्डनायक कहलाओगे तथा तुम प्रजा के सुकृत या दुष्कृत को लिखोगे॥४-६॥
अग्निर्दक्षिणपार्श्वे तु पिङ्गलत्वात् स पिङ्गलः।
अश्विनौ चापि सूर्यस्य पार्श्वयोरुभयोः स्थितौ।
अश्वरूपात् समुत्पन्नौ तेन तावश्विनौ स्मृतौ ॥७॥
८० श्रीसाम्बपुराणम्
अग्नि ने सूर्य के दाहिने पार्श्व में अवस्थान किया। पिङ्गल वर्ण के कारण उनको पिङ्गल कहा गया। दोनों अश्विनीकुमार सूर्य के दोनों पार्श्व में स्थित हुये। अश्वरूप में उत्पन्न होने के कारण इनको अश्विनद्वय कहा जाता है।।७।।
पूर्वद्वारे स्थितौ तस्य राज्ञस्तोषौ महाबलौ।
कार्त्तिकेयः स्मृतो राज्ञस्तोषश्चापि हरः स्मृतः ॥८॥
राजूदीप्तौ स्मृतो धातुर्नकारः प्रत्ययोऽस्य तु।
सुरसेनापतित्वेन स यस्माद्दीप्यते सदा।
तस्माच्च कार्त्तिकेयस्तु नाम्ना राज्ञ इति स्मृतः ॥९॥
सूर्य के पूर्व द्वार पर महाबलशाली राज्ञ तथा स्तोष ने अवस्थान किया। कार्त्तिकेय राज्ञ नाम से तथा हर स्तोष नाम से अभिहित हैं। राज (राजू) धातु का अर्थ दीप्ति है और प्रत्ययार्थ 'न' इससे युक्त होता है। देवगण के सेनापतिरूप से वे सर्वदा दीप्तिमान रहते हैं।।८-९।।
तुस गतौ स्मृतो धातुस्तस्य सप्रत्ययः स्मृतः।
गच्छत्यतीव यस्माद्वा राज्ञस्तोषो विधीयते ॥१०॥
खरं हि दुरतिक्रान्तं कृत्वा द्वारमवस्थितौ।
पक्षिप्रेताधिपौ नाम्ना स्मृतौ कल्माषपक्षिणौ ॥११॥
तुस धातु का अर्थ है—गति, यह प्रत्ययार्थ 'स' से युक्त है। जो अत्यन्त गमन करते हैं, इस अर्थ में हर को स्तोष नाम से अभिहित किया गया है। यह राज्ञ तथा स्तोष का वर्णन किया गया। खर (मुखविवर) दुरतिक्रमणीय दो जन द्वार पर स्थित हैं। वे पक्षी तथा प्रेतों के अधिपति हैं। इनको कल्माष तथा पक्षी भी कहते हैं।।१०-११।।
वर्णस्य शबलत्वात्तु यतः कल्माष उच्यते।
पक्षोऽस्यास्तीत्यतः पक्षी गरुड़ः परिकीर्त्तितः ॥१२॥
उनमें जिसका वर्ण धवल है, उसे कल्माष कहते हैं। जिसे पंख (पक्ष) हैं, वह पक्षी है। यहाँ गरुड़ को ही पक्षी कहा गया है।।१२।।
स्थितो दक्षिणतस्तस्य जान्दकारः समाठरः।
जान्दकारश्चित्रगुप्तो माठरः काल उच्यते ॥१३॥
यमस्यार्थकरो नित्यं चित्रगुप्तो महामतिः।
कालो जान्द इति प्रोक्तो जान्दकारस्ततस्तु सः ॥१४॥
सूर्य के दक्षिण में जान्दकार तथा माठर रहते हैं। चित्रगुप्त को जान्दकार एवं काल तथा यम को माठर कहा गया है। यम का अर्थ-साधन करते हैं—महामति चित्रगुप्त।
षोडशोऽध्यायः ८१
षोडशोऽध्यायः ८१
जान्द शब्द का अर्थ है—प्रयोजन। इसलिये यम का सब समय सर्वप्रयोजन-साधक होने के कारण चित्रगुप्त जान्दकार कहे जाते हैं॥१३-१४॥
दक्षिणस्यां निवासोऽस्य दिशि यस्मात्तु नित्यशः । धातुर्मठ निवासेति कालस्तेन तु माठरः ॥१५॥
क्योंकि नित्य दक्षिण दिशा में ये निवास करते हैं और मठ धातु का अर्थ है—निवास; इसीलिये काल को माठर कहते हैं॥१५॥
प्राप्नुयानक्षुतापौ तु रवेः पश्चिमतः स्थितौ । क्षुतापो वरुणो ज्ञेयः प्राप्नुयानस्तु सागरः ॥१६॥
प्राप्नुयान तथा क्षुताप रवि के पश्चिम में स्थित हैं। वरुण को क्षुताप तथा सागर को प्राप्नुयान कहा जाता है॥१६॥
उत्तरेण स्थितोऽर्कस्य कुबेरः सविनायकः । कुबेरो धनदो ज्ञेयो हस्तिरूपो विनायकः ॥१७॥
सूर्य के उत्तर में विनायक के साथ कुबेर स्थित हैं। कुबेर धनद हैं तथा हस्तिरूप विनायक हैं॥१७॥
रेवन्तश्चैव दिण्डिश्च द्वावेव पूर्वतः स्थितौ । दिण्डिर्ज्ञेयस्तयो रुद्रो रेवन्तस्तनयो रवेः ॥१८॥
रेवन्त तथा दिण्ड दोनों सूर्य के पूर्व में स्थित हैं। उनमें दिण्ड को रुद्र जानना चाहिये तथा रेवन्त रविपुत्र हैं॥१८॥
इत्येतेऽनुचराः प्रोक्ता संख्या चैषां निबोध मे । माठरो जान्दकारश्च धनदोऽथ विनायकः ॥१९॥ प्राप्नुयानक्षुतापौ तु द्वौ च कल्माषपक्षिणौ । अश्विनौ तु ततो ज्ञेयो दण्डनायकपिङ्गलौ ॥२०॥ सखरद्वारिकौ ज्ञेयौ राज्ञस्तोषौ ततः स्मृतौ । रेवन्तश्चैव दिण्डिश्च इत्येतेऽनुचराः स्मृता ॥२१॥
ये सभी सूर्य के अनुचर हैं। इनकी संख्या मुझसे सुनो—माठर, जान्दकार, धनद, विनायक, प्राप्नुयान, क्षुताप, कल्माष, पक्षी, अश्विनीकुमार, दण्डनायक, पिङ्गल, खर, द्वारिक, राज्ञ, स्तोष, रेवत तथा दिण्ड—ये सभी उनके अनुचर कहे गये हैं॥१९-२१॥
दशाष्टौ च समाख्याताः संक्षेपात् संख्यया पुनः । इति ते नामभिस्तुत्यैर्दानवार्थे विनायकाः । परिवार्य स्थिता सूर्य नानाप्रहरणायुधाः ॥२२॥
८२ | श्रीसाम्बपुराणम्
संक्षेप में इन १८ अनुचरों का वर्णन किया गया। ये सभी दानवों को बाधा देने के लिये नाना प्रकार के अस्त्र तथा आयुध धारण करके सूर्य को घेर कर सदा अवस्थित रहते हैं॥२२॥
स्वरूपाश्चान्यरूपाश्च विरूपाः कामरूपिणः।
परिवार्य स्थिताः सूर्यं भानुरूपाश्च देवताः॥२३॥
ऋचो यजूंषि सामानि वाङ्मयोक्तानि यानि तु।
नानारूपैः स्थितान्येव रवेस्तानि समन्ततः॥२४॥
स्वरूप, अन्यरूप, विरूप, कामरूप एवं भानुरूप देवतागण सूर्य को घेर कर अवस्थान करते हैं। वाङ्मयरूपेण प्रसिद्ध ऋक्, यजुः तथा साम नानारूपेण सूर्य के चारो ओर स्थित रहते हैं॥२३-२४॥
नारद उवाच
वक्ष्याम्यथातः पुनरेव दिण्डिं सूर्यस्य सर्वप्रवरं प्रधानम्।
व्योम्यावसं तिष्ठति यस्तु नग्नः सोऽप्युच्यते रुद्र इहापि दिण्डी ॥२५॥
नारद कहते हैं—मैं पुनः दिण्डि की बात कहता हूँ। वे सूर्य के अनुचरों में श्रेष्ठ हैं। वे नग्नावस्था में आकाश में विराजमान रहते हैं और वे ही रुद्र भी हैं, जो यहाँ दिण्डि नाम से कथित हैं॥२५॥
छित्वा पुरा ब्रह्मशिरः किलासौ प्रगृह्य तच्चास्य शिरःकपालम्।
बहूदकं पुष्पफलैरुपेतं नग्नो ययौ दारुवनं ऋषीणाम्॥२६॥
दृष्ट्वा तु तं भैक्ष्यकरं सुरेशं क्षुब्धास्त्रियो मुक्तवस्त्राः प्रयाताः।
योषित्सु तासु क्षुभितासु सर्वे जघ्नुर्हरन्तं मुनयः सुरुष्टा ॥२७॥
स हन्यमानो मुनिमुख्यसर्वै गृहीतलोष्टैर्ऋषिदण्डकाष्ठैः।
विहाय तं देशमजःस्वरूपी ततो रवेर्लोकमथाजगाम॥२८॥
पूर्व काल में उन्होंने ब्रह्मा के शिर का छेदन किया और उस मस्तक, कपाल तथा फल-फूल के साथ बहुत जल पीकर नग्नावस्था में ऋषिगण के दारुवन में आये। ऐसे भिक्षुकरूपी सुरेश (रुद्र) को देखकर वहाँ की स्त्रियाँ क्षुब्ध होकर विवस्त्र हो गईं। स्त्रियों की विक्षुब्धता को देखकर सभी मुनिगण रुष्ट होकर रुद्र (हर) को मारने लगे॥२७-२८॥
आगच्छमानं प्रकरास्तमूचुर्देवेश नित्यं भ्रमसे किमर्थम्।
स त्वाह तान् पापविमोचनार्थं भ्रमामि तीर्थानि सुरालयांश्च॥२९॥
सूर्यदेव के प्रधान परिचारक ने आकर इनसे पूछा—हे देवेश! किसलिये नित्य भ्रमण करते हैं? इसपर उन्होंने कहा कि तीर्थों एवं देवालयों में पापों को दूर करने के लिये मैं भ्रमण करता हूँ॥२९॥
षोडशोऽध्यायः ८३
ते भूय ऊचुः प्रवरास्तमेवमत्रैव तिष्ठस्व रवेः पुरस्तात्।
शुद्धिं तवैवैष करिष्यतीह शुद्धस्ततो यास्यसि रुद्रलोकम् ॥३०॥
वे श्रेष्ठ परिकरगण पुनः उनसे बोले—यहाँ रवि भगवान् के सम्मुख आप रहिये। ये ही आपका शुद्धि-विधान करेंगे। तदनन्तर हे रुद्र! शुद्ध होकर अपने लोक जाइयेगा॥३०॥
इत्येवमुक्तः प्रवरैः स रुद्रस्तत्रैव तस्थौ रवितोषणार्थम्।
नग्नो जटी यष्टिकपालपाणी रूपेण चैवाप्रतिमस्त्रिलोके ॥३१॥
तुष्टाव देवं सविता तदाह प्रीतोऽस्मि तं वागमृतातवाहम्।
मद्दर्शनादेव भवान् विशुद्धो दिण्डी च नाम्ना भवितासि लोके ॥३२॥
स्थानं व्रजस्व त्वमतीव पुण्यं पापापहं लौकिकनामधेयम्।
त्यक्त्वा कपालं प्रविशुद्धमूर्तिर्मया सह स्थास्यसि तत्र नित्यम् ॥३३॥
उन श्रेष्ठ परिकरों के उनसे यह कहने पर रुद्र ने वहीं पर अवस्थान किया। वे नग्न, जटाधारी, हस्तद्वय में कपाल तथा लाठीधारी—इस रूप में त्रिभुवन में अतुलनीय थे। उन्होंने सूर्य का स्तवन किया तब सूर्यदेव ने उनसे कहा—तुम्हारे वाक्यामृत से मैं तुमसे प्रसन्न हो गया। मेरे दर्शन मात्र से तुम विशुद्ध हो गये हो तथा दिण्डी नाम से लोक में प्रसिद्धि प्राप्त करोगे। तुम पापविनाशक लौकिक नामयुक्त हो अति पुण्यस्थानों पर विचरण और कपाल त्याग करके मेरे साथ नित्य सौम्य मूर्ति में रहोगे॥३१-३३॥
अष्टादशैते प्रवरास्तु भानोश्चतुर्दशान्ये च रवेरधस्तात्।
देवौ च तौ द्वौ तु ऋषिप्रधानौ गन्धर्वसर्पावमितप्रभावौ ॥३४॥
यक्षौ च यौ द्वौ च निशाचरौ तु नृत्ये च ये द्वेऽप्सरसां वरिष्ठे।
वसन्ति येहर्तिषु खेऽप्सु सूर्ये तेषां समीतिश्चतुरुत्तराणाम् ॥३५॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यपरिकरवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः
ये १८ लोग भानु के श्रेष्ठ परिकर हैं। रवि के निम्न भाग में अपर १४ लोग एवं दो लोग ऋषिप्रधान देवता तथा अतुल शक्तियुक्त गन्धर्व तथा सर्प हैं। ये दोनों यक्ष हैं। ये निशाचर हैं तथा नृत्य में भी श्रेष्ठ हैं। जो इस ऋषिलोक में, आकाश, जल तथा सूर्यलोक में निवास करते हैं, उनका समाज उत्तरादि चतुर्दिकू है॥३४-३५॥
श्री साम्बपुराण का सूर्यपरिवार-वर्णन नामक षोडश अध्याय समाप्त
सप्तदशोऽध्यायः
(माहेश्वरस्तोत्रम्)
नारद उवाच
दिण्डिप्रोक्तमिदञ्चापि शृणु साम्ब महास्तवम्।
प्रणम्य शिरसा देवमुदयस्थं दिवाकरम् ॥१॥
भक्त्या भानुं प्रपद्येऽहं सर्वपापप्रणाशनम्।
देवदानवयक्षाणां ग्रहाणां ज्योतिषामपि ॥२॥
तेजस्याभ्यधिकं देवं व्रजामि शरणं प्रभुम्।
एवमुक्त्वा विरूपाक्षो ध्यानासक्तो बभूव ह ॥३॥
नारद कहते हैं—हे साम्ब! दिण्डि द्वारा कथित महास्तव का भी स्मरण करो। उदीयमान देव दिवाकर को मस्तक से प्रणाम करके वे स्तुति करने लगे। भक्तिपूर्वक सर्वपाप-प्रणाशक भानु की शरण लेता हूँ। जो देव, दानव, यक्ष, ग्रह तथा ताराओं के मध्य में अतिशय तेजयुक्त हैं; मैं उनकी शरण लेता हूँ। इस प्रकार कहकर दिण्डीरूप रुद्र विरूपाक्ष ने सूर्यदेव की स्तुति हेतु ध्यान किया॥१-३॥
ध्यानात् संस्मृत्य मनसा पौराणीमात्मनस्तनूम्।
वाग्भिस्तुष्टाव तं देवं तमोघ्नं रश्मिमालिनम् ॥४॥
ध्यान-प्रभाव से मन द्वारा अपने पूर्वतन शरीर का स्मरण करके वाक्य से तमोविनाशक उन देव की स्तुति करने लगे॥४॥
दिविस्थितं मयूखाग्रैर्द्योतयन्तं दिशो दश।
वसुधामन्तरिक्षं च व्याप्तवन्तं मरीचिभिः ॥५॥
आदित्यं भास्करं सूर्यं सवितारं दिवाकरम्।
पूषणमर्यमानं च स्वर्भानुं दीप्ततेजसम् ॥६॥
जो द्युलोक में विराजमान हैं, अपनी किरणों के अग्रभाग से दशो दिशाओं को आलोकित करते हैं, अपनी किरणों द्वारा भूलोक तथा द्युलोक को व्याप्त करते हैं, जो आदित्य, भास्कर, सूर्य, सविता, दिवाकर, पूषा, अर्यमा, स्वर्भानु तथा दीप्ततेजा हैं॥५-६॥
चतुर्युगान्तं कालाग्निं दुष्प्रेक्ष्यं प्रलयान्तकम्।
योगेश्वरमनन्तं च रक्तं पीतं सितासितम् ॥७॥
सप्तदशोऽध्यायः ८५
सप्तदशोऽध्यायः ८५
ऋषीणामग्निहोत्रेषु यज्ञे वेदेषु संस्थितम्।
अक्षरं परमं गुह्यं मोक्षद्वारं सुरोत्तमम् ॥८॥
छन्दोभिरश्वरूपैश्च सकृद्युक्तैर्विहङ्गमैः।
उदयास्तमनोयुक्तं सदा मेरोः प्रदक्षिणम् ॥९॥
अमृतीभूतसत्यं च पुण्यतीर्थं पृथग्विधम्।
विश्वस्थितिमचिन्त्यञ्च प्रपन्नोऽस्मि प्रभाकरम् ॥१०॥
जो चतुर्युग का अन्त करते हैं अर्थात् उदयास्त रूप कालक्रम से क्रमशः एक-एक युग का अन्त करते-करते चारो युगों का क्रम समाप्त कर देते हैं; जो कालाग्नि के समान दुष्प्रेक्ष्य, महाप्रलय के अन्तक के समान हैं; जो योगेश्वर, अनन्त एवं रक्त-पीत-शुक्ल तथा कृष्ण वर्ण वाले हैं; जो ऋषियों के अग्निहोत्र, यज्ञ तथा वेद में स्थित हैं; जो विनाशरहित, परमगृह, मोक्षद्वार के समान, देवताओं में उत्तम हैं, उन देव की स्तुति करता हूँ। जो अश्वरूप छन्दों से तथा पक्षिगण द्वारा युक्त तथा उदयास्त काल में सदैव मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं; जो अविनश्वर तथा सत्यरूप, पुण्य तीर्थरूप, नानारूप युक्त, विश्व के स्थितिकारक, अचिन्त्य, प्रभाकर हैं, उनकी मैं शरण लेता हूँ॥७-१०॥
त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः।
वायुराकाशमापश्च पृथिवीगिरिसागराः ॥११॥
ग्रहनक्षत्रचन्द्रार्काविनयस्त्वं महौषधम्।
व्यक्ताव्यक्तेषु भूतेषु धर्माधर्मप्रवर्त्तकः ॥१२॥
दर्शनादेव ते देव मुक्तोऽहं ब्रह्महत्यया।
दिव्यं पश्यामि ते रूपं प्रकाशं ज्ञानचक्षुषा ॥१३॥
आप ही ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, प्रजापति, वायु, आकाश तथा जल हैं; आप ही पृथिवी, पर्वत तथा सागर भी हैं। आप ही ग्रह, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, पृथिवी, महौषधी, व्यक्त-अव्यक्त हैं। आप ही प्राणीगण के धर्म तथा अधर्म के प्रवर्तक भी हैं। हे देव! आपके दर्शनमात्र से ही मैं ब्रह्महत्या-जैसे पाप से मुक्त हो सका हूँ। मैं ज्ञान-चक्षु से आपका प्रकाशक दिव्य रूप देखता हूँ॥११-१३॥
स्रवद्भिरिव दीप्ताभिर्गोभिर्लोकान् प्रकाशयन्।
धारयन् दृश्यसे वापि विभूतिं पारमेश्वरीम् ॥१४॥
आप क्षरणशील दीप्त किरणों से सभी भुवनों को प्रकाशित करते-करते पारमेश्वरी विभूति धारण करके स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं॥१४॥
एवं स्तुतः स देवेशस्तुष्टः प्रोवाच तं हरम्।
ज्ञानमैश्वर्यमोक्षौ च क्षराक्षरविकल्पना ॥१५॥
८६ श्रीसाम्बपुराणम्
महत्त्वं सूक्ष्मता चैव सर्वभूतेष्ववस्थितिः।
सर्वं तत्तुल्यमस्माकमहं यत् स भवानपि ॥१६॥
इस प्रकार स्तुत होकर परितुष्ट देवेश सूर्य ने दिण्डीरूपी हर से कहा—ज्ञान, ऐश्वर्य, मोक्ष, क्षर-अक्षर विकल्पना, महत्त्व, सूक्ष्मता, सर्व प्राणियों में अवस्थिति, जो कुछ मेरा है, वह तुम्हारा हो जाय। मैं जैसा हूँ, वैसे ही तुम भी हो जाओ॥१५-१६॥
ब्राह्मी माहेश्वरी चैव वैष्णवी चैव या तनुः।
एकः स पुरुषो भूत्वा कारणादुद्बहा स्थितिः ॥१७॥
एतज्ज्ञात्वा महाज्ञानं ज्ञात्वा मामात्मनस्तनुम्।
अत्रैव देव! तिष्ठ त्वं विमुक्तो ब्रह्महत्यया ॥१८॥
अविमुक्त इहागत्य मुक्तस्त्वं पाप्मना यथा।
अविमुक्तं तथा नाम्ना क्षेत्रमेतद् भविष्यति ॥१९॥
ये क्रोशपरिमाणे तु ह्यस्मिन् क्षेत्रे नराः स्थिताः।
आवयोः प्रणमस्यन्ति ते भविष्यन्त्यकल्मषाः ॥२०॥
ब्राह्मी, माहेश्वरी तथा वैष्णवी जो तनु है, वह एक ही कारण से उद्भूत होकर स्थिति-विधान करती है। हे देव! यह महाज्ञान-लाभ करके मेरे तथा अपने तनु को एक जानकर ब्रह्महत्या से मुक्त होकर तुम यहाँ अवस्थान करो। अविमुक्त अवस्था में यहाँ आकर तुम पाप से मुक्त हो गये हो, अतएव यह क्षेत्र अविमुक्त कहा जायेगा। इस क्षेत्र के क्रोशपरिणाम में जो लोग हम दोनों को प्रणाम करेंगे, वे अकल्मष तथा पापरहित हो जायेंगे॥१७-२०॥
पठन् शृण्वंस्तथा चेमं पुण्यं संवादमावयोः।
किल्विषाच्च विमुच्येते मुच्यते च महाभयात् ॥२१॥
चक्षुपीडा मनःपीडा ग्रहपीडा तथैव च।
शमयेदेकजप्येन दुःस्वप्नं शमयेत्तथा ॥२२॥
इति श्रीशाम्बपुराणे माहेश्वरस्तोत्रं नाम सप्तदशोऽध्यायः
हमारे इस पुण्यमय संवाद को जो पढ़ेंगे अथवा सुनेंगे, वे पाप से मुक्त होंगे तथा महान् भय से भी मुक्त होंगे। नेत्रपीडा, मनःपीडा तथा ग्रहपीडा का इस स्तुति के एक बार जप से ही शमन हो जायेगा तथा दुःस्वप्न नष्ट होंगे॥२१-२२॥
श्री साम्बपुराण का माहेश्वर स्तुति नामक सप्तदश अध्याय समाप्त
अष्टादशोऽध्यायः
(देवताख्यापनम्)
नारद उवाच
अतो व्योमं प्रवक्ष्यामि यत्रोत्पन्नं यथा च यत्।
अण्डैः हिरण्यगर्भस्य यदल्पं गर्भसंज्ञितम् ॥१॥
तत्रोत्पन्नमिदं व्योम कपाले द्योमहीमये।
अथोल्बणः काञ्चनमयश्चतुरस्रोऽङ्घ्रितो महान् ॥२॥
उत्पन्नः स चतुःशृङ्गो मेरुर्देवतसंश्रयः।
दिक्पद्मपत्रा पृथिवी मेरुस्तस्याश्च कर्णिका ॥३॥
नारद कहते हैं—अब व्योम (आकाश) की कथा कहूँगा। इसकी उत्पत्ति जहाँ से जिस प्रकार से होती है, अब उसे कहूँगा। हिरण्यगर्भ के अण्डसमूह द्वारा अथवा अल्प गर्भ नामक स्थान से यह व्योम उत्पन्न हुआ है। स्वर्ग तथा पृथ्वी इसके दो हिस्से हैं (जैसे घड़े के दो हिस्से (कपाल) होते हैं, उसी प्रकार)। तदनन्तर अति उज्ज्वल स्वर्णमय महान् चतुरस्र चरणों से उत्पन्न हुआ। यह है—चार शृङ्गयुक्त मेरु अथवा देवगण का आश्रयस्थल। इसकी सभी दिशायें पद्मपत्रतुल्य हैं, पृथिवी तथा मेरु उसकी कर्णिका हैं॥१-३॥
युगाक्षकोटिविन्यस्तं तत्र कृत्वा रथं रविः।
सर्वैर्देवैः परिवृतस्तस्य याति प्रदक्षिणम् ॥४॥
वहाँ रवि युगाक्षकोटि विन्यस्त रथ का निर्माण करके देवगण के साथ परिवृत होकर उस पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं॥४॥
तस्मिन् मेरौ त्रयस्त्रिंशद् वसन्ते याज्ञिकाः सुराः।
रुद्रा एकादश ज्ञेया आदित्या द्वादशैव तु ॥५॥
तथैव वसवो ह्यष्टावश्विनौ चैव याज्ञिकौ।
वसून् वदन्ति हि पितॄन् रुद्रस्त्वेव पितामहान् ॥६॥
प्रपितामहाश्च आदित्यानाश्विनावात्मनस्तनुम्।
पितॄन् भूयः प्रवक्ष्यामि ऋतुसंवत्सरार्तवान् ॥७॥
उस मेरु पर ३३ याज्ञिक देवता वास करते हैं। ११ रुद्र, १२ आदित्य, आठ वसु एवं अश्विनीकुमारद्वय वहाँ यज्ञिक हैं। सब मिलाकर ३३ होते हैं पितृपुरुष। रुद्रगण के पितामह हैं, आदित्य गण के प्रपितामह हैं तथा अश्विनीकुमारद्वय को निज-तनु कहा गया है। अब पितृगण, ऋतु, संवत्सर तथा ऋतुजात द्रव्यादि का प्रसङ्ग कहा जायेगा॥५-७॥
८८
श्रीसाम्बपुराणम्
अतो यज्ञभुजामेषां पृथङ्नामानि मे शृणु।
अजैकपादहिर्बुध्न्यस्त्वष्टा रुद्रश्च वीर्यवान् ॥८॥
हरश्चैवाथ शर्वश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः।
वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा ॥९॥
ईश्वरो भुवनस्येति रुद्रा एकादश स्मृताः।
अब यज्ञभुक् (जो यज्ञ का भाग लेते हैं) देवता का नाम मुझसे सुनो—अज, एकपात्, अहिर्बुध्न्य (स्रष्टा तथा वीर्यवान्), रुद्र, हर, शर्व (अपराजित), त्र्यम्बक, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत। ये ११ रुद्र भुवन के ईश्वर कहे गये हैं॥८-९॥
आदित्यानां तु नामानि विष्णुः शक्रश्च वीर्यवान् ॥१०॥
अर्यमा चैव धाता च मित्रोऽथ वरुणस्तथा।
विवस्वान् सविता चैव पूषा त्वष्टा तथैव च ॥११॥
अंशुर्भर्गश्चातितेजा आदित्या द्वादश स्मृताः।
धरो ध्रुवश्च सोमश्च आपश्चैवानिलोऽनलः ॥१२॥
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्त्तिताः।
नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि।
आदित्यगण के नाम हैं—विष्णु, वीर्यवान्, शक्र, अर्यमा, धाता, मित्र, वरुण, विवस्वान्, सविता, पूषा, त्वष्टा, अंशु तथा भग। ये सभी अति तेजस्वी द्वादश आदित्य कहे गये हैं। अब अष्टवसु का नाम सुनो—धर, ध्रुव, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष एवं प्रभात। नासत्य तथा दस्र—ये दो अश्विनीकुमार हैं॥१०-१२॥
विश्वेदेवान् प्रवक्ष्यामि नामभिस्तान्निबोध मे ॥१३॥
क्रतुर्दक्षो वसुः सत्यः कालः कामो धुरिस्तथा।
लोचनश्चार्दवश्चैव पुरुरव इमे दश ॥१४॥
अब विश्वेदेव का नाम कहता हूँ, मुझसे सुनो। ऋतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, धुरि, लोचन, आर्द्रव तथा पुरुरव—ये दस विश्वेदेव कहे गये हैं॥१३-१४॥
वर्त्तमाना इमे देवाः शृणु मन्वन्तरे भवान्।
याम्यश्च तुषिताश्चैव तथैव वशवर्तिनः ॥१५॥
सत्याश्च भूतरजसः साध्याश्च तदनन्तरम्।
उक्तमन्वन्तरेष्वेव देवा द्वादश द्वादश ॥१६॥
पारावतास्तथा त्वन्ये साध्याश्च तुषितैः सह।
साध्यान् देवान् प्रवक्ष्यामि नामभिस्तान् निबोध मे ॥१७॥
अष्टादशोऽध्यायः ८९
अष्टादशोऽध्यायः ८९
अब मन्वन्तर की बात सुनो। याम्य, तुषित, वशवर्ती, सत्य, भूतरज, साध्यगण। उक्त मन्वन्तर समूह के १२-१२ देवता हैं। पारावत एवं तुषित गण के साथ अन्य साध्यगण हैं। साध्य देवताओं का नाम कहता हूँ; सुनो।।१५-१७।।
मनोऽनुमन्ता प्राणश्च नरो नारायणस्तथा।
वृत्तिस्तपो हयश्चैव हंसो धर्मश्च वीर्यवान् ॥१८॥
विष्णुश्चापि प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कीर्त्तिताः।
एवं यज्ञभुजो देवा नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठिताः ॥१९॥
अतीतान् वर्तमानांश्च पुनश्चैव निबोध मे।
आदित्या मरुतो रुद्राः कश्यपस्यात्मजाः स्मृताः ॥२०॥
मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, नारायण, वृत्ति, तप, हय, हंस, वीर्यवान्, धर्म, विष्णु तथा प्रभु—ये १२ साध्य कहे गये हैं। यज्ञभुक् देवगण नित्य यज्ञ में प्रतिष्ठित हैं। अतीत एवं वर्तमान (देवगण की बात) मुझसे सुनो। आदित्यगण, मरुद्गण, रुद्रगण कश्यप के आत्मज हैं।।१८-२०।।
विश्वे च वसवः साध्या विज्ञेया धर्मसूनवः।
एवं धर्मसुतः सोमस्तृतीयो वसुरुच्यते ॥२१॥
धर्मोऽपि ब्रह्मणः पुत्रः पुराणे विश्रुतो मतः।
अथेन्द्रांश्च मनूंश्चैव नामभिस्तु निबोध मे ॥२२॥
विश्वेदेवगण, वसुगण तथा साध्यगण को धर्मपुत्ररूप से जानना चाहिये। इसी प्रकार से धर्मपुत्र सोम को तृतीय वसु कहा गया है। धर्म भी ब्रह्मा के पुत्र हैं। यह पुराण में कहा गया है। अब इन्द्रों का तथा मनुगण का नाम सुनो।।२१-२२।।
स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं ततः स्वारोचिषः स्मृतः।
औत्तमिस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥२३॥
इत्येते षडतिक्रान्ताः सप्तमः साम्प्रतो मनुः।
वैवस्वत इति ज्ञेया भविष्याः सप्त चापरे ॥२४॥
तेषामाद्योऽर्कसावर्णिर्ब्रह्मसावर्णिरिव च।
तस्माच्च भवसावर्णिर्धर्मसावर्णिरित्यतः ॥२५॥
पञ्चमो दक्षसावर्णिः पञ्च सावर्णयः स्मृताः।
रौत्यो भौत्यश्च द्वावन्त्यावित्येते मनवः स्मृता ॥२६॥
प्रथम स्वायम्भुव मनु एवं तत्पश्चात् स्वरोचिष मनु प्रसिद्ध हैं। औत्तमि, तामस, रैवत तथा चाक्षुष—ये छः मनु अतिक्रान्त हो चुके हैं। सम्प्रति सप्तम मनु वैवस्वत हैं। तदनन्तर भविष्यत् के सात मनु हैं। उनमें प्रथम हैं—अर्कसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, भवसावर्णि,
९० श्रीसाम्बपुराणम्
धर्मसावर्णि, दक्षसावर्णि—ये पञ्च सावर्णि हैं। शेष दो लोग हैं—रौत्य तथा भौत्य। ये सब मनुगण हैं॥२३-२६॥
इन्द्रस्तु विष्णुर्विज्ञेयो विपश्चित्तदनन्तरम्।
अद्भुतस्त्रिदिवश्चैव दशमस्त्विन्द्र उच्यते॥२७॥
सुशान्तिश्च सुकीर्तिश्च ऋतुधामा दिवस्पतिः।
इति भूता भविष्याश्च ज्ञेया इन्द्राश्चतुर्दश॥२८॥
कश्यपोऽत्रिर्वशिष्ठश्च भरद्वाजोऽथ गौतमः।
विश्वामित्रो जमदग्निश्च सप्तैते ऋषयः स्मृता॥२९॥
इन्द्र को विष्णु जानना चाहिये। तदनन्तर विपश्चित्, अद्भुत एवं त्रिदिव को दशम इन्द्र कहा गया है। सुशान्ति, सुकीर्ति, ऋतुधामा तथा दिवस्पति—ये अतीत के इन्द्र थे। भविष्यत् के इन्द्र चौदह हैं। कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, विश्वामित्र तथा जमदग्नि ये सात प्रसिद्ध ऋषि हैं॥२७-२९॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि मरुतोऽग्नीन् पितॄन् ग्रहान्।
प्रवहोऽथावहश्चैव उद्वहः संवहस्तथा॥३०॥
विवाहो निवहश्चैव परिवाहस्तथैव च।
अन्तरिक्षचरा ह्येते पृथङ्मार्गविचारिणः॥३१॥
अब मरुद्गण, अग्निसमूह, पितृगण, सभी ग्रह, प्रवह, आवह, उद्वह, संवह, विवाह, निवह एवं परिवाह—ये पृथक्-पृथक् पथ में विचरणशील अन्तरिक्षचारी हैं॥३०-३१॥
महेन्द्रेण प्रभिन्नाङ्गा मरुतः सप्त कीर्त्तिताः॥३२॥
महेन्द्र द्वारा किये गये भिन्न-भिन्न अंगों के कारण मरुद्गण सात कहे गये हैं॥३२॥
शौराग्निः शुचिनामा तु वैद्युतः पावकः स्मृतः।
निर्मथ्यपरमोऽन्योऽग्निस्त्रयः प्रोक्ता इमेऽग्नयः॥३३॥
शुचिनामक शौराग्नि, वैद्युताग्नि पावक हैं। अपर निर्मथ्यमान (अरणि काष्ठ के मन्थनजनित अग्नि) अग्नि, ये तीन अग्नि कही गयी हैं॥३३॥
अग्नीनां पुत्रपौत्रांश्च चत्वारिंशन्नवैव तु।
मरुतामपि सर्वेषां विज्ञेयाः सप्तसप्तकाः॥३४॥
अग्नि के पुत्र तथा पौत्रगण चालीस हैं तथा ऐसे ही मरुद्गण भी उनचास हैं॥३४॥
एवं संवत्सरो ह्यग्निर्ऋतवस्तस्य जज्ञिरे।
ऋतुपुत्रार्त्तवाः पञ्च इति सर्गः सनातनः॥३५॥
अष्टादशोऽध्यायः ९१
अष्टादशोऽध्यायः ९१
इसी प्रकार संवत्सर की अग्नि से ऋतुगण उत्पन्न होते हैं। ऋतुपुत्र पाँच आर्त्तवगण नित्य सर्ग से उत्पन्न हैं॥३५॥
संवत्सरस्तु प्रथमो द्वितीयः परिवत्सरः।
इद्वत्सरस्तृतीयश्च चतुर्थस्त्वनुवत्सरः ॥३६॥
पञ्चमो वत्सरस्तेषां वायुश्चैवानुवत्सरः।
तेषु संवत्सरो ह्यग्निः सूर्यस्तु परिवत्सरः ॥३७॥
सोम इद्वत्सरस्तेषां वायुश्चैवानुवत्सरः।
रुद्रस्तु वत्सरो ज्ञेयः पश्चाद्वायोर्युगात्मकाः ॥३८॥
संवत्सर अग्नि प्रथम है। द्वितीय परिवत्सर है। तृतीय इद्वत्सर, चतुर्थ अनुवत्सर एवं पञ्चम है—वत्सर। इनमें वायु है—अनुवत्सर, संवत्सर है—अग्नि, सूर्य है—परिवत्सर, सोम है—इद्वत्सर एवं रुद्र को वत्सर कहा गया है। तदनन्तर वायु के युगात्मकगण आगे कहते हैं॥३६-३८॥
आर्त्तवाः पितरो ज्ञेया ये जाता ऋतुसूनवः।
पितामहास्तु ऋतवो मासा वै सोमसूनवः ॥३९॥
प्रपितामहाश्च ऋतवः पश्चाद्वा ब्रह्मणः सुताः।
सौम्या बर्हिषदश्चैव अग्निष्वात्ताश्च ते त्रिधा ॥४०॥
आदित्यश्चैव सोमश्च लोहिताङ्गो बुधस्तथा।
बृहस्पतिश्च शुक्रश्च तथा चैव शनैश्चरः ॥४१॥
राहुश्च धूमकेतुश्च इत्येते वै नवग्रहाः।
त्रैलोक्यस्य त्विमे नित्यं भावाभावनिवेदकाः ॥४२॥
ऋतुपुत्र आर्त्तवगण को पितृपुरुष जानना चाहिये। पितामह हैं—ऋतुगण, मास हैं—सोमपुत्र। प्रपितामह ऋतुगण हैं, पश्चात् हैं—ब्रह्मपुत्रगण। सौम्य, बर्हिषद् एवं अग्निष्वात्त—ये तीन पितृपुरुष हैं। आदित्य (रवि), सोम (चन्द्र), लोहिताङ्ग (मंगल), बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर राहु तथा केतु—ये नव ग्रह हैं। ये त्रिभुवन में नित्य शुभाशुभ के ज्ञापक हैं॥३९-४२॥
आदित्यश्चैव सोमश्च स्मृतौ द्वौ मङ्गलग्रहौ।
राहुश्छायाग्रहश्चैव शेषास्ताराग्रहाः स्मृताः ॥४३॥
रवि तथा चन्द्र—ये मंगल ग्रह कहे गये हैं। राहु है—छायाग्रह। अन्य सबको ताराग्रह कहा गया है॥४३॥
नक्षत्राधिपतिः सोमो ग्रहराजो दिवाकरः।
पञ्च्यते वाग्निरदित्यश्चाब्मयश्चन्द्रमाः स्मृतः ॥४४॥
९२ श्रीसाम्बपुराणम्
नक्षत्र का अधिपति सोम है (चन्द्र है)। ग्रहराज हैं—दिवाकर। चन्द्रमा अग्नि तथा जलमय है॥४४॥
आदित्यः पठ्यते ब्रह्मा विष्णुस्तेषां च चन्द्रमाः ।
माहेश्वरस्तु विज्ञेयस्तृतीयोऽङ्गारको ग्रहः ॥४५॥
रवि हैं—ब्रह्मा, विष्णु हैं—चन्द्रमा एवं महेश्वर के पुत्र हैं—मंगल॥४५॥
कश्यपस्य सुतः सूर्यः सोमो धर्मसुतः स्मृतः ।
देवासुरगुरू द्वौ तु भानुमन्तौ महाग्रहौ ॥४६॥
कश्यप के पुत्र सूर्य हैं एवं चन्द्र धर्मपुत्र हैं। देव तथा असुरों के गुरु क्रमशः बृहस्पति तथा शुक्र हैं। ये उज्ज्वल महाग्रह हैं॥४६॥
प्रजापतिसुतावेतावुभौ शुक्रबृहस्पतिः ।
बुधः सोमात्मजः श्रीमान् सूर्यपुत्रः शनैश्चरः ॥४७॥
प्रजापति के पुत्र शुक्र तथा बृहस्पति हैं। बुध है—चन्द्रपुत्र तथा श्रीमान् शनैश्चर सूर्यपुत्र हैं॥४७॥
सैंहिकेयः स्मृतो राहुः केतुश्च ब्रह्मणः सुतः ।
सर्वेषां तु ग्रहाणां वै ह्यधस्ताच्चरते रविः ॥४८॥
राहु को सिंहिका का पुत्र तथा केतु को ब्रह्मा का पुत्र कहा गया है। समस्त ग्रहों के मध्य निम्न भाग में विचरणशील हैं—सूर्य॥४८॥
रवेरूर्ध्वं स्थितः सोमः सोमान्नक्षत्रमण्डलम् ।
नक्षत्रेभ्यो बुधस्तूर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः ॥४९॥
तस्मादङ्गारकश्चोर्ध्वं तस्य चोर्ध्वं बृहस्पतिः ।
तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं तस्योर्ध्वमृषिमण्डलम् ॥५०॥
रवि के ऊपर सोम (चन्द्र) स्थित हैं। सोम के ऊपर नक्षत्रमण्डल है। नक्षत्र के ऊपर शुक्र हैं और उसके ऊर्ध्व में है—मंगल। उसके ऊर्ध्व में है—बृहस्पति। उसके ऊर्ध्व में शनि तथा उसके ऊर्ध्व में ऋषिमण्डल विराजमान है॥४९-५०॥
ऋषिभ्यश्च ध्रुवस्योर्ध्वमासनं कथितं बुधैः ।
आदित्यनिलये राहुः कदाचित् सोममार्गगः ॥५१॥
सूर्यमण्डलसंस्थस्तु केतुर्नित्यं प्रसर्पति ।
नवयोजनसाहस्रो विस्तारो भास्करस्य तु ॥५२॥
विस्तारात् त्रिगुणं चास्य परिणाहेन मण्डलम् ।
द्विगुणः सूर्यविस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः ॥५३॥
अष्टादशोऽध्यायः ९३
अष्टादशोऽध्यायः ९३
ऋषियों से ऊर्ध्व में ध्रुव का आसन है। यह विद्वान् लोग कहते हैं। रविमण्डल में राहु अवस्थित है, जो कदाचित् सोम के पथ पर गमन करता है। सूर्यमण्डल-स्थित केतु नित्य सोममण्डल में गमन करता है। सूर्य का विस्तार ९००० योजन है। इस विस्तार से तीन गुणा परिणाह वाला मण्डल है। सूर्य के विस्तार का दूना चन्द्र का विस्तार कहा गया है॥५१-५३॥
विशेष— सूर्य से चन्द्र को दूना बताया गया है, यह सम्भव नहीं है।
त्रिगुणं मण्डलं चास्य यथैव सवितुस्तथा।
चन्द्रतः षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते ॥५४॥
भार्गवात् पादहीनो वै विज्ञेयस्तु बृहस्पतिः।
बृहस्पतेः पादहीनौ कुजसौम्यावुदाहृतौ ॥५५॥
विस्तारमण्डलाभ्यां च पादहीनस्तयोर्बुधः।
बुधतुल्यानि ऋक्षाणि सर्वह्रस्वानि यानि तु ॥५६॥
चन्द्र का मण्डल सूर्य से तिगुना (?) विस्तृत है। चन्द्र के सोलहवें भाग की विस्तृति शुक्र की है। शुक्र का पादहीन विस्तार बृहस्पति का है। बृहस्पति के एक पादहीन विस्तार के बराबर मंगल तथा बुध हैं। बुध के समान ही समस्त नक्षत्रों का विस्तार है॥५४-५६॥
योजनार्धप्रमाणानि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।
राहुः सूर्यप्रमाणस्तु कदाचित् सोऽपि सम्मितः।
तस्माद् ग्रहप्रमाणन्तु केतुस्त्वनियत: स्मृतः ॥५७॥
जो सब से हीन नक्षत्र है, उसका विस्तार आधा योजन प्रमाण है। उससे ह्रस्व कोई नक्षत्र नहीं है। राहु कभी-कभी सूर्यवत् प्रतीत होता है। तभी राहु को ग्रह मानते हैं। केतु का स्थान नियत नहीं है॥५७॥
भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकस्तदनन्तरम्।
महर्जनस्तपःसत्यं सप्तलोकाः प्रकीर्त्तिताः ॥५८॥
भूरूपं पार्थिवो लोको ह्यन्तरिक्षं भुवः स्मृतः।
स्वरित्येवं दिवं विद्याच्छेषास्तूर्ध्वं यथाक्रमम् ॥५९॥
भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपःलोक, सत्य लोक—ये सात लोक कहे गये हैं। भूलोक है—पार्थिव लोक, अन्तरिक्ष है—भुवर्लोक, स्वर्लोक है—द्युलोक। अन्य सबको यथाक्रम से ऊर्ध्वलोक जानना चाहिये॥५८-५९॥
भूतस्याधिपतिश्चाग्निस्ततो भूतपतिस्तु सः।
नभसोऽधिपतिर्वायुस्तेन वायुर्नभस्पतिः ॥६०॥
९४ || श्रीसाम्बपुराणम् ||
गन्धर्वाप्सरसश्चैव गुह्यकाः सह राक्षसैः।
भूर्लोकवासिनः सर्वेऽप्यन्तरिक्षचरान् शृणु ॥६१॥
भूलोकाधिपति हैं—अग्नि, इसीलिये अग्नि को भूतपति कहते हैं। नभोलोक के अधिपति हैं—वायु, तभी वे नभस्पति कहलाते हैं। स्वर्गलोकाधिपति हैं—सूर्य, अतः उन्हें दिवस्पति कहते हैं। गन्धर्व, अप्सरा, गुह्यक तथा राक्षस भूलोकवासी हैं। अब अन्तरिक्षचारियों की बात सुनो॥६०-६१॥
मरुतः सप्तभिः स्कन्धैः रुद्रास्तत्रैव चाश्विनौ।
आदित्या वसवः स्वर्गे तत्रैव च गवां गणः ॥६२॥
मरुद्गण, सप्त स्कन्धगण, रुद्रगण तथा अश्विनीकुमारद्वय वहाँ अन्तरिक्ष में रहते हैं। आदित्यगण एवं वसुगण स्वर्ग में रहते हैं। वहीं गौ की भी स्थिति है॥६२॥
चतुर्थे च महर्लोके तिष्ठन्त्याकल्पवासिनः।
प्रजानां पतिभिः सर्वैः सेव्यते पञ्चमो जनः ॥६३॥
मनुः सनत्कुमाराद्या वैराजश्च तपःस्थिताः।
सत्यस्तु सप्तमो लोको ह्यापुर्मार्गगतानिमान् ॥६४॥
चतुर्थ लोक महर्लोक में आकल्पवासी निवास करते हैं। सभी प्रजागण के पतिगण जनलोक में स्थित रहते हैं। वसु, सनत्कुमारादि तथा विराट-सम्बन्धित (वैराज) सभी तपलोक में अवस्थान करते हैं। सत्य सप्तम लोक में अवस्थित है। सभी मार्गगत लोकों का यही प्राप्ति-स्थान है॥६३-६४॥
ब्रह्मलोकः समाख्यातो ह्यप्रतीघातलक्षणः।
महीतलां सहस्राणां शतादूर्ध्वं दिवाकरः ॥६५॥
यह जो सत्यलोक (ब्रह्मलोक) नाम से ख्यात है, वह विघ्नरहित स्थान है। महीतल (पृथ्वी) से शत सहस्र ऊर्ध्व में दिवाकर स्थित हैं॥६५॥
दश तानि ध्रुवं यावद् द्विगुणाद् द्विगुणोत्तरे।
दश योजनकोट्यस्तु भूमेरूर्ध्वं ध्रुवः स्मृतः ॥६६॥
ये दस लोक ध्रुव लोक-पर्यन्त द्विगुण से लेकर उत्तरोत्तर द्विगुण वर्धित होते हैं। भूमि से ऊर्ध्व में दश योजन कोटि ध्रुवलोक को कहा गया है॥६६॥
त्रयोविंशतिलक्षाणि त्रैलोक्यात् संघ उच्यते।
द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च ॥६७॥
तेईस लाख त्रैलोक्य की उच्चता कही गई है। उसका द्विगुण है—शत सहस्र योजन॥६७॥
अष्टादशोऽध्यायः ९५
अष्टादशोऽध्यायः ९५
लोकोत्तरमथैकैकं ध्रुवादूर्ध्वं विधीयते ।
देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः ।
भूता विद्याधराश्चैव अष्टौ ते देवयोनयः ॥६८॥
अस्मिन्व्योम्नि त्वमी लोकाः सप्तैव सम्प्रतिष्ठिताः ।
मरुतः पितरो छन्दास्तस्मिन्नेवाग्नयो ग्रहाः ॥६९॥
ये चाप्येते समाख्याता मयाष्टौ देवयोनयः ।
मूर्तयोऽमूर्तयश्चैव सर्वे ते व्योम्यवस्थिताः ॥७०॥
एवंविधमिदं व्योम सर्वदेवमयं स्मृतम् ।
सर्वभूतमयं चैव सर्वश्रुतिमयं तथा ॥७१॥
तस्माद् योऽर्चयते व्योम तेन सर्वेऽर्चिताः पुराः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शुभार्थी व्योम पूजयेत् ॥७२॥
इति श्री साम्बपुराणे देवतोपाख्यापनं नामाष्टादशोऽध्यायः
ध्रुवलोक के ऊर्ध्व में एक लोक है। देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पन्नग, भूत तथा विद्याधर—यह आठ देवयोनि है। उस व्योम में यह सप्तलोक प्रतिष्ठित हैं। मरुद्गण, पितृगण, मेघसमूह, अग्नि तथा सभी ग्रह वहाँ अवस्थित हैं।
इस प्रकार यह व्योम सर्वदेवमय है। यह सर्वभूतमय तथा सर्वश्रुतिमय है। अतएव जो व्योम की अर्चना करते हैं, वे समस्त देवों की अर्चना करते हैं। अतः मंगलकामी व्यक्ति को सर्वप्रयास के साथ व्योम का पूजन करना चाहिये॥६८-७२॥
श्री साम्बपुराण का देवतोपाख्यान नामक अष्टादश अध्याय समाप्त
एकोनविंशोऽध्यायः
(व्योमोत्पत्तिः)
नारद उवाच
आकाशं खं वियद्व्योम चान्तरिक्षं नभोऽम्बरम्।
पुष्करं गगनं चेति मेरुस्तत्रैव कीर्त्यते ॥१॥
मेरुश्च पृथिवीमध्ये समन्तात्तस्य मेदिनी।
भूमेर्द्वीपविभागस्तु प्रवक्ष्यामि समन्ततः ॥२॥
आकाश, खं, वियत्, व्योम, अन्तरिक्ष, नभ, पुष्कर तथा गगन—यह सब आकाश के पर्याय हैं। वहीं मेरु भी कीर्तित है। यह पृथिवी के मध्य में है। उसके चारो ओर मेदिनी (पृथिवी) है। चारो ओर भूमि का द्वीपविभाग है॥१-२॥
जम्बूशककुशद्वीपक्रौञ्चगोमेदकानि च।
शाल्मलीपुष्कराख्ये च सप्तद्वीपानि भागशः ॥३॥
लवणक्षीरदध्यम्बुघृतोदेक्षुरसोदकाः ।
स्वादूदकश्च सप्तैते समुद्राः परिकीर्तिता ॥४॥
जम्बू, शक, कुश, क्रौञ्च, गोमेध, शाल्मलि तथा पुष्कर नामक सात द्वीप कहे गये हैं। लवण, क्षीर, दध्यम्बु, घृतोद, इक्षु, रसोदक तथा स्वादूदक नामक सात समुद्र कहे गये हैं॥३-४॥
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नील एव च।
श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव षडेते वर्षपर्वताः ॥५॥
हिमवान्, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत तथा शृङ्गवान्—ये छः वर्ष पर्वत कहे गये हैं॥५॥
मानसः सप्तमस्तेषां पुर्योऽष्टौ यत्र संस्थिताः ।
माहेन्द्री चाप्यथाग्नेयी याम्या च नैर्ऋती तथा ॥६॥
वारुणी वायवी चैव सौम्येशानी तथैव च।
मानसान्निर्जला भूमिलोंकालोकस्ततो गिरिः ॥७॥
तदनन्तर सप्तम है—मानस पर्वत। वहाँ आठ नगरी विद्यमान है। माहेन्द्री, आग्नेयी, याम्या, नैर्ऋती, वारुणी, वायवी, सौम्या तथा ईशानी—ये आठ नगरी हैं। मानस पर्वत से आगे निर्जला भूमि है और उसके आगे है—लोकालोक पर्वत॥६-७॥