भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

षोडशोऽध्यायः ८१

जान्द शब्द का अर्थ है—प्रयोजन। इसलिये यम का सब समय सर्वप्रयोजन-साधक होने के कारण चित्रगुप्त जान्दकार कहे जाते हैं॥१३-१४॥

दक्षिणस्यां निवासोऽस्य दिशि यस्मात्तु नित्यशः । धातुर्मठ निवासेति कालस्तेन तु माठरः ॥१५॥

क्योंकि नित्य दक्षिण दिशा में ये निवास करते हैं और मठ धातु का अर्थ है—निवास; इसीलिये काल को माठर कहते हैं॥१५॥

प्राप्नुयानक्षुतापौ तु रवेः पश्चिमतः स्थितौ । क्षुतापो वरुणो ज्ञेयः प्राप्नुयानस्तु सागरः ॥१६॥

प्राप्नुयान तथा क्षुताप रवि के पश्चिम में स्थित हैं। वरुण को क्षुताप तथा सागर को प्राप्नुयान कहा जाता है॥१६॥

उत्तरेण स्थितोऽर्कस्य कुबेरः सविनायकः । कुबेरो धनदो ज्ञेयो हस्तिरूपो विनायकः ॥१७॥

सूर्य के उत्तर में विनायक के साथ कुबेर स्थित हैं। कुबेर धनद हैं तथा हस्तिरूप विनायक हैं॥१७॥

रेवन्तश्चैव दिण्डिश्च द्वावेव पूर्वतः स्थितौ । दिण्डिर्ज्ञेयस्तयो रुद्रो रेवन्तस्तनयो रवेः ॥१८॥

रेवन्त तथा दिण्ड दोनों सूर्य के पूर्व में स्थित हैं। उनमें दिण्ड को रुद्र जानना चाहिये तथा रेवन्त रविपुत्र हैं॥१८॥

इत्येतेऽनुचराः प्रोक्ता संख्या चैषां निबोध मे । माठरो जान्दकारश्च धनदोऽथ विनायकः ॥१९॥ प्राप्नुयानक्षुतापौ तु द्वौ च कल्माषपक्षिणौ । अश्विनौ तु ततो ज्ञेयो दण्डनायकपिङ्गलौ ॥२०॥ सखरद्वारिकौ ज्ञेयौ राज्ञस्तोषौ ततः स्मृतौ । रेवन्तश्चैव दिण्डिश्च इत्येतेऽनुचराः स्मृता ॥२१॥

ये सभी सूर्य के अनुचर हैं। इनकी संख्या मुझसे सुनो—माठर, जान्दकार, धनद, विनायक, प्राप्नुयान, क्षुताप, कल्माष, पक्षी, अश्विनीकुमार, दण्डनायक, पिङ्गल, खर, द्वारिक, राज्ञ, स्तोष, रेवत तथा दिण्ड—ये सभी उनके अनुचर कहे गये हैं॥१९-२१॥

दशाष्टौ च समाख्याताः संक्षेपात् संख्यया पुनः । इति ते नामभिस्तुत्यैर्दानवार्थे विनायकाः । परिवार्य स्थिता सूर्य नानाप्रहरणायुधाः ॥२२॥