भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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८२ | श्रीसाम्बपुराणम्

संक्षेप में इन १८ अनुचरों का वर्णन किया गया। ये सभी दानवों को बाधा देने के लिये नाना प्रकार के अस्त्र तथा आयुध धारण करके सूर्य को घेर कर सदा अवस्थित रहते हैं॥२२॥

स्वरूपाश्चान्यरूपाश्च विरूपाः कामरूपिणः।
परिवार्य स्थिताः सूर्यं भानुरूपाश्च देवताः॥२३॥
ऋचो यजूंषि सामानि वाङ्मयोक्तानि यानि तु।
नानारूपैः स्थितान्येव रवेस्तानि समन्ततः॥२४॥

स्वरूप, अन्यरूप, विरूप, कामरूप एवं भानुरूप देवतागण सूर्य को घेर कर अवस्थान करते हैं। वाङ्मयरूपेण प्रसिद्ध ऋक्, यजुः तथा साम नानारूपेण सूर्य के चारो ओर स्थित रहते हैं॥२३-२४॥

नारद उवाच

वक्ष्याम्यथातः पुनरेव दिण्डिं सूर्यस्य सर्वप्रवरं प्रधानम्।
व्योम्यावसं तिष्ठति यस्तु नग्नः सोऽप्युच्यते रुद्र इहापि दिण्डी ॥२५॥

नारद कहते हैं—मैं पुनः दिण्डि की बात कहता हूँ। वे सूर्य के अनुचरों में श्रेष्ठ हैं। वे नग्नावस्था में आकाश में विराजमान रहते हैं और वे ही रुद्र भी हैं, जो यहाँ दिण्डि नाम से कथित हैं॥२५॥

छित्वा पुरा ब्रह्मशिरः किलासौ प्रगृह्य तच्चास्य शिरःकपालम्।
बहूदकं पुष्पफलैरुपेतं नग्नो ययौ दारुवनं ऋषीणाम्॥२६॥
दृष्ट्वा तु तं भैक्ष्यकरं सुरेशं क्षुब्धास्त्रियो मुक्तवस्त्राः प्रयाताः।
योषित्सु तासु क्षुभितासु सर्वे जघ्नुर्हरन्तं मुनयः सुरुष्टा ॥२७॥
स हन्यमानो मुनिमुख्यसर्वै गृहीतलोष्टैर्ऋषिदण्डकाष्ठैः।
विहाय तं देशमजःस्वरूपी ततो रवेर्लोकमथाजगाम॥२८॥

पूर्व काल में उन्होंने ब्रह्मा के शिर का छेदन किया और उस मस्तक, कपाल तथा फल-फूल के साथ बहुत जल पीकर नग्नावस्था में ऋषिगण के दारुवन में आये। ऐसे भिक्षुकरूपी सुरेश (रुद्र) को देखकर वहाँ की स्त्रियाँ क्षुब्ध होकर विवस्त्र हो गईं। स्त्रियों की विक्षुब्धता को देखकर सभी मुनिगण रुष्ट होकर रुद्र (हर) को मारने लगे॥२७-२८॥

आगच्छमानं प्रकरास्तमूचुर्देवेश नित्यं भ्रमसे किमर्थम्।
स त्वाह तान् पापविमोचनार्थं भ्रमामि तीर्थानि सुरालयांश्च॥२९॥

सूर्यदेव के प्रधान परिचारक ने आकर इनसे पूछा—हे देवेश! किसलिये नित्य भ्रमण करते हैं? इसपर उन्होंने कहा कि तीर्थों एवं देवालयों में पापों को दूर करने के लिये मैं भ्रमण करता हूँ॥२९॥