साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
सप्तदशोऽध्यायः ८५
सप्तदशोऽध्यायः ८५
ऋषीणामग्निहोत्रेषु यज्ञे वेदेषु संस्थितम्।
अक्षरं परमं गुह्यं मोक्षद्वारं सुरोत्तमम् ॥८॥
छन्दोभिरश्वरूपैश्च सकृद्युक्तैर्विहङ्गमैः।
उदयास्तमनोयुक्तं सदा मेरोः प्रदक्षिणम् ॥९॥
अमृतीभूतसत्यं च पुण्यतीर्थं पृथग्विधम्।
विश्वस्थितिमचिन्त्यञ्च प्रपन्नोऽस्मि प्रभाकरम् ॥१०॥
जो चतुर्युग का अन्त करते हैं अर्थात् उदयास्त रूप कालक्रम से क्रमशः एक-एक युग का अन्त करते-करते चारो युगों का क्रम समाप्त कर देते हैं; जो कालाग्नि के समान दुष्प्रेक्ष्य, महाप्रलय के अन्तक के समान हैं; जो योगेश्वर, अनन्त एवं रक्त-पीत-शुक्ल तथा कृष्ण वर्ण वाले हैं; जो ऋषियों के अग्निहोत्र, यज्ञ तथा वेद में स्थित हैं; जो विनाशरहित, परमगृह, मोक्षद्वार के समान, देवताओं में उत्तम हैं, उन देव की स्तुति करता हूँ। जो अश्वरूप छन्दों से तथा पक्षिगण द्वारा युक्त तथा उदयास्त काल में सदैव मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं; जो अविनश्वर तथा सत्यरूप, पुण्य तीर्थरूप, नानारूप युक्त, विश्व के स्थितिकारक, अचिन्त्य, प्रभाकर हैं, उनकी मैं शरण लेता हूँ॥७-१०॥
त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः।
वायुराकाशमापश्च पृथिवीगिरिसागराः ॥११॥
ग्रहनक्षत्रचन्द्रार्काविनयस्त्वं महौषधम्।
व्यक्ताव्यक्तेषु भूतेषु धर्माधर्मप्रवर्त्तकः ॥१२॥
दर्शनादेव ते देव मुक्तोऽहं ब्रह्महत्यया।
दिव्यं पश्यामि ते रूपं प्रकाशं ज्ञानचक्षुषा ॥१३॥
आप ही ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, प्रजापति, वायु, आकाश तथा जल हैं; आप ही पृथिवी, पर्वत तथा सागर भी हैं। आप ही ग्रह, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, पृथिवी, महौषधी, व्यक्त-अव्यक्त हैं। आप ही प्राणीगण के धर्म तथा अधर्म के प्रवर्तक भी हैं। हे देव! आपके दर्शनमात्र से ही मैं ब्रह्महत्या-जैसे पाप से मुक्त हो सका हूँ। मैं ज्ञान-चक्षु से आपका प्रकाशक दिव्य रूप देखता हूँ॥११-१३॥
स्रवद्भिरिव दीप्ताभिर्गोभिर्लोकान् प्रकाशयन्।
धारयन् दृश्यसे वापि विभूतिं पारमेश्वरीम् ॥१४॥
आप क्षरणशील दीप्त किरणों से सभी भुवनों को प्रकाशित करते-करते पारमेश्वरी विभूति धारण करके स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं॥१४॥
एवं स्तुतः स देवेशस्तुष्टः प्रोवाच तं हरम्।
ज्ञानमैश्वर्यमोक्षौ च क्षराक्षरविकल्पना ॥१५॥
८६ श्रीसाम्बपुराणम्
महत्त्वं सूक्ष्मता चैव सर्वभूतेष्ववस्थितिः।
सर्वं तत्तुल्यमस्माकमहं यत् स भवानपि ॥१६॥
इस प्रकार स्तुत होकर परितुष्ट देवेश सूर्य ने दिण्डीरूपी हर से कहा—ज्ञान, ऐश्वर्य, मोक्ष, क्षर-अक्षर विकल्पना, महत्त्व, सूक्ष्मता, सर्व प्राणियों में अवस्थिति, जो कुछ मेरा है, वह तुम्हारा हो जाय। मैं जैसा हूँ, वैसे ही तुम भी हो जाओ॥१५-१६॥
ब्राह्मी माहेश्वरी चैव वैष्णवी चैव या तनुः।
एकः स पुरुषो भूत्वा कारणादुद्बहा स्थितिः ॥१७॥
एतज्ज्ञात्वा महाज्ञानं ज्ञात्वा मामात्मनस्तनुम्।
अत्रैव देव! तिष्ठ त्वं विमुक्तो ब्रह्महत्यया ॥१८॥
अविमुक्त इहागत्य मुक्तस्त्वं पाप्मना यथा।
अविमुक्तं तथा नाम्ना क्षेत्रमेतद् भविष्यति ॥१९॥
ये क्रोशपरिमाणे तु ह्यस्मिन् क्षेत्रे नराः स्थिताः।
आवयोः प्रणमस्यन्ति ते भविष्यन्त्यकल्मषाः ॥२०॥
ब्राह्मी, माहेश्वरी तथा वैष्णवी जो तनु है, वह एक ही कारण से उद्भूत होकर स्थिति-विधान करती है। हे देव! यह महाज्ञान-लाभ करके मेरे तथा अपने तनु को एक जानकर ब्रह्महत्या से मुक्त होकर तुम यहाँ अवस्थान करो। अविमुक्त अवस्था में यहाँ आकर तुम पाप से मुक्त हो गये हो, अतएव यह क्षेत्र अविमुक्त कहा जायेगा। इस क्षेत्र के क्रोशपरिणाम में जो लोग हम दोनों को प्रणाम करेंगे, वे अकल्मष तथा पापरहित हो जायेंगे॥१७-२०॥
पठन् शृण्वंस्तथा चेमं पुण्यं संवादमावयोः।
किल्विषाच्च विमुच्येते मुच्यते च महाभयात् ॥२१॥
चक्षुपीडा मनःपीडा ग्रहपीडा तथैव च।
शमयेदेकजप्येन दुःस्वप्नं शमयेत्तथा ॥२२॥
इति श्रीशाम्बपुराणे माहेश्वरस्तोत्रं नाम सप्तदशोऽध्यायः
हमारे इस पुण्यमय संवाद को जो पढ़ेंगे अथवा सुनेंगे, वे पाप से मुक्त होंगे तथा महान् भय से भी मुक्त होंगे। नेत्रपीडा, मनःपीडा तथा ग्रहपीडा का इस स्तुति के एक बार जप से ही शमन हो जायेगा तथा दुःस्वप्न नष्ट होंगे॥२१-२२॥
श्री साम्बपुराण का माहेश्वर स्तुति नामक सप्तदश अध्याय समाप्त
अष्टादशोऽध्यायः
(देवताख्यापनम्)
नारद उवाच
अतो व्योमं प्रवक्ष्यामि यत्रोत्पन्नं यथा च यत्।
अण्डैः हिरण्यगर्भस्य यदल्पं गर्भसंज्ञितम् ॥१॥
तत्रोत्पन्नमिदं व्योम कपाले द्योमहीमये।
अथोल्बणः काञ्चनमयश्चतुरस्रोऽङ्घ्रितो महान् ॥२॥
उत्पन्नः स चतुःशृङ्गो मेरुर्देवतसंश्रयः।
दिक्पद्मपत्रा पृथिवी मेरुस्तस्याश्च कर्णिका ॥३॥
नारद कहते हैं—अब व्योम (आकाश) की कथा कहूँगा। इसकी उत्पत्ति जहाँ से जिस प्रकार से होती है, अब उसे कहूँगा। हिरण्यगर्भ के अण्डसमूह द्वारा अथवा अल्प गर्भ नामक स्थान से यह व्योम उत्पन्न हुआ है। स्वर्ग तथा पृथ्वी इसके दो हिस्से हैं (जैसे घड़े के दो हिस्से (कपाल) होते हैं, उसी प्रकार)। तदनन्तर अति उज्ज्वल स्वर्णमय महान् चतुरस्र चरणों से उत्पन्न हुआ। यह है—चार शृङ्गयुक्त मेरु अथवा देवगण का आश्रयस्थल। इसकी सभी दिशायें पद्मपत्रतुल्य हैं, पृथिवी तथा मेरु उसकी कर्णिका हैं॥१-३॥
युगाक्षकोटिविन्यस्तं तत्र कृत्वा रथं रविः।
सर्वैर्देवैः परिवृतस्तस्य याति प्रदक्षिणम् ॥४॥
वहाँ रवि युगाक्षकोटि विन्यस्त रथ का निर्माण करके देवगण के साथ परिवृत होकर उस पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं॥४॥
तस्मिन् मेरौ त्रयस्त्रिंशद् वसन्ते याज्ञिकाः सुराः।
रुद्रा एकादश ज्ञेया आदित्या द्वादशैव तु ॥५॥
तथैव वसवो ह्यष्टावश्विनौ चैव याज्ञिकौ।
वसून् वदन्ति हि पितॄन् रुद्रस्त्वेव पितामहान् ॥६॥
प्रपितामहाश्च आदित्यानाश्विनावात्मनस्तनुम्।
पितॄन् भूयः प्रवक्ष्यामि ऋतुसंवत्सरार्तवान् ॥७॥
उस मेरु पर ३३ याज्ञिक देवता वास करते हैं। ११ रुद्र, १२ आदित्य, आठ वसु एवं अश्विनीकुमारद्वय वहाँ यज्ञिक हैं। सब मिलाकर ३३ होते हैं पितृपुरुष। रुद्रगण के पितामह हैं, आदित्य गण के प्रपितामह हैं तथा अश्विनीकुमारद्वय को निज-तनु कहा गया है। अब पितृगण, ऋतु, संवत्सर तथा ऋतुजात द्रव्यादि का प्रसङ्ग कहा जायेगा॥५-७॥
८८
श्रीसाम्बपुराणम्
अतो यज्ञभुजामेषां पृथङ्नामानि मे शृणु।
अजैकपादहिर्बुध्न्यस्त्वष्टा रुद्रश्च वीर्यवान् ॥८॥
हरश्चैवाथ शर्वश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः।
वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा ॥९॥
ईश्वरो भुवनस्येति रुद्रा एकादश स्मृताः।
अब यज्ञभुक् (जो यज्ञ का भाग लेते हैं) देवता का नाम मुझसे सुनो—अज, एकपात्, अहिर्बुध्न्य (स्रष्टा तथा वीर्यवान्), रुद्र, हर, शर्व (अपराजित), त्र्यम्बक, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत। ये ११ रुद्र भुवन के ईश्वर कहे गये हैं॥८-९॥
आदित्यानां तु नामानि विष्णुः शक्रश्च वीर्यवान् ॥१०॥
अर्यमा चैव धाता च मित्रोऽथ वरुणस्तथा।
विवस्वान् सविता चैव पूषा त्वष्टा तथैव च ॥११॥
अंशुर्भर्गश्चातितेजा आदित्या द्वादश स्मृताः।
धरो ध्रुवश्च सोमश्च आपश्चैवानिलोऽनलः ॥१२॥
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्त्तिताः।
नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि।
आदित्यगण के नाम हैं—विष्णु, वीर्यवान्, शक्र, अर्यमा, धाता, मित्र, वरुण, विवस्वान्, सविता, पूषा, त्वष्टा, अंशु तथा भग। ये सभी अति तेजस्वी द्वादश आदित्य कहे गये हैं। अब अष्टवसु का नाम सुनो—धर, ध्रुव, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष एवं प्रभात। नासत्य तथा दस्र—ये दो अश्विनीकुमार हैं॥१०-१२॥
विश्वेदेवान् प्रवक्ष्यामि नामभिस्तान्निबोध मे ॥१३॥
क्रतुर्दक्षो वसुः सत्यः कालः कामो धुरिस्तथा।
लोचनश्चार्दवश्चैव पुरुरव इमे दश ॥१४॥
अब विश्वेदेव का नाम कहता हूँ, मुझसे सुनो। ऋतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, धुरि, लोचन, आर्द्रव तथा पुरुरव—ये दस विश्वेदेव कहे गये हैं॥१३-१४॥
वर्त्तमाना इमे देवाः शृणु मन्वन्तरे भवान्।
याम्यश्च तुषिताश्चैव तथैव वशवर्तिनः ॥१५॥
सत्याश्च भूतरजसः साध्याश्च तदनन्तरम्।
उक्तमन्वन्तरेष्वेव देवा द्वादश द्वादश ॥१६॥
पारावतास्तथा त्वन्ये साध्याश्च तुषितैः सह।
साध्यान् देवान् प्रवक्ष्यामि नामभिस्तान् निबोध मे ॥१७॥
अष्टादशोऽध्यायः ८९
अष्टादशोऽध्यायः ८९
अब मन्वन्तर की बात सुनो। याम्य, तुषित, वशवर्ती, सत्य, भूतरज, साध्यगण। उक्त मन्वन्तर समूह के १२-१२ देवता हैं। पारावत एवं तुषित गण के साथ अन्य साध्यगण हैं। साध्य देवताओं का नाम कहता हूँ; सुनो।।१५-१७।।
मनोऽनुमन्ता प्राणश्च नरो नारायणस्तथा।
वृत्तिस्तपो हयश्चैव हंसो धर्मश्च वीर्यवान् ॥१८॥
विष्णुश्चापि प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कीर्त्तिताः।
एवं यज्ञभुजो देवा नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठिताः ॥१९॥
अतीतान् वर्तमानांश्च पुनश्चैव निबोध मे।
आदित्या मरुतो रुद्राः कश्यपस्यात्मजाः स्मृताः ॥२०॥
मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, नारायण, वृत्ति, तप, हय, हंस, वीर्यवान्, धर्म, विष्णु तथा प्रभु—ये १२ साध्य कहे गये हैं। यज्ञभुक् देवगण नित्य यज्ञ में प्रतिष्ठित हैं। अतीत एवं वर्तमान (देवगण की बात) मुझसे सुनो। आदित्यगण, मरुद्गण, रुद्रगण कश्यप के आत्मज हैं।।१८-२०।।
विश्वे च वसवः साध्या विज्ञेया धर्मसूनवः।
एवं धर्मसुतः सोमस्तृतीयो वसुरुच्यते ॥२१॥
धर्मोऽपि ब्रह्मणः पुत्रः पुराणे विश्रुतो मतः।
अथेन्द्रांश्च मनूंश्चैव नामभिस्तु निबोध मे ॥२२॥
विश्वेदेवगण, वसुगण तथा साध्यगण को धर्मपुत्ररूप से जानना चाहिये। इसी प्रकार से धर्मपुत्र सोम को तृतीय वसु कहा गया है। धर्म भी ब्रह्मा के पुत्र हैं। यह पुराण में कहा गया है। अब इन्द्रों का तथा मनुगण का नाम सुनो।।२१-२२।।
स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं ततः स्वारोचिषः स्मृतः।
औत्तमिस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥२३॥
इत्येते षडतिक्रान्ताः सप्तमः साम्प्रतो मनुः।
वैवस्वत इति ज्ञेया भविष्याः सप्त चापरे ॥२४॥
तेषामाद्योऽर्कसावर्णिर्ब्रह्मसावर्णिरिव च।
तस्माच्च भवसावर्णिर्धर्मसावर्णिरित्यतः ॥२५॥
पञ्चमो दक्षसावर्णिः पञ्च सावर्णयः स्मृताः।
रौत्यो भौत्यश्च द्वावन्त्यावित्येते मनवः स्मृता ॥२६॥
प्रथम स्वायम्भुव मनु एवं तत्पश्चात् स्वरोचिष मनु प्रसिद्ध हैं। औत्तमि, तामस, रैवत तथा चाक्षुष—ये छः मनु अतिक्रान्त हो चुके हैं। सम्प्रति सप्तम मनु वैवस्वत हैं। तदनन्तर भविष्यत् के सात मनु हैं। उनमें प्रथम हैं—अर्कसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, भवसावर्णि,
९० श्रीसाम्बपुराणम्
धर्मसावर्णि, दक्षसावर्णि—ये पञ्च सावर्णि हैं। शेष दो लोग हैं—रौत्य तथा भौत्य। ये सब मनुगण हैं॥२३-२६॥
इन्द्रस्तु विष्णुर्विज्ञेयो विपश्चित्तदनन्तरम्।
अद्भुतस्त्रिदिवश्चैव दशमस्त्विन्द्र उच्यते॥२७॥
सुशान्तिश्च सुकीर्तिश्च ऋतुधामा दिवस्पतिः।
इति भूता भविष्याश्च ज्ञेया इन्द्राश्चतुर्दश॥२८॥
कश्यपोऽत्रिर्वशिष्ठश्च भरद्वाजोऽथ गौतमः।
विश्वामित्रो जमदग्निश्च सप्तैते ऋषयः स्मृता॥२९॥
इन्द्र को विष्णु जानना चाहिये। तदनन्तर विपश्चित्, अद्भुत एवं त्रिदिव को दशम इन्द्र कहा गया है। सुशान्ति, सुकीर्ति, ऋतुधामा तथा दिवस्पति—ये अतीत के इन्द्र थे। भविष्यत् के इन्द्र चौदह हैं। कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, विश्वामित्र तथा जमदग्नि ये सात प्रसिद्ध ऋषि हैं॥२७-२९॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि मरुतोऽग्नीन् पितॄन् ग्रहान्।
प्रवहोऽथावहश्चैव उद्वहः संवहस्तथा॥३०॥
विवाहो निवहश्चैव परिवाहस्तथैव च।
अन्तरिक्षचरा ह्येते पृथङ्मार्गविचारिणः॥३१॥
अब मरुद्गण, अग्निसमूह, पितृगण, सभी ग्रह, प्रवह, आवह, उद्वह, संवह, विवाह, निवह एवं परिवाह—ये पृथक्-पृथक् पथ में विचरणशील अन्तरिक्षचारी हैं॥३०-३१॥
महेन्द्रेण प्रभिन्नाङ्गा मरुतः सप्त कीर्त्तिताः॥३२॥
महेन्द्र द्वारा किये गये भिन्न-भिन्न अंगों के कारण मरुद्गण सात कहे गये हैं॥३२॥
शौराग्निः शुचिनामा तु वैद्युतः पावकः स्मृतः।
निर्मथ्यपरमोऽन्योऽग्निस्त्रयः प्रोक्ता इमेऽग्नयः॥३३॥
शुचिनामक शौराग्नि, वैद्युताग्नि पावक हैं। अपर निर्मथ्यमान (अरणि काष्ठ के मन्थनजनित अग्नि) अग्नि, ये तीन अग्नि कही गयी हैं॥३३॥
अग्नीनां पुत्रपौत्रांश्च चत्वारिंशन्नवैव तु।
मरुतामपि सर्वेषां विज्ञेयाः सप्तसप्तकाः॥३४॥
अग्नि के पुत्र तथा पौत्रगण चालीस हैं तथा ऐसे ही मरुद्गण भी उनचास हैं॥३४॥
एवं संवत्सरो ह्यग्निर्ऋतवस्तस्य जज्ञिरे।
ऋतुपुत्रार्त्तवाः पञ्च इति सर्गः सनातनः॥३५॥
अष्टादशोऽध्यायः ९१
अष्टादशोऽध्यायः ९१
इसी प्रकार संवत्सर की अग्नि से ऋतुगण उत्पन्न होते हैं। ऋतुपुत्र पाँच आर्त्तवगण नित्य सर्ग से उत्पन्न हैं॥३५॥
संवत्सरस्तु प्रथमो द्वितीयः परिवत्सरः।
इद्वत्सरस्तृतीयश्च चतुर्थस्त्वनुवत्सरः ॥३६॥
पञ्चमो वत्सरस्तेषां वायुश्चैवानुवत्सरः।
तेषु संवत्सरो ह्यग्निः सूर्यस्तु परिवत्सरः ॥३७॥
सोम इद्वत्सरस्तेषां वायुश्चैवानुवत्सरः।
रुद्रस्तु वत्सरो ज्ञेयः पश्चाद्वायोर्युगात्मकाः ॥३८॥
संवत्सर अग्नि प्रथम है। द्वितीय परिवत्सर है। तृतीय इद्वत्सर, चतुर्थ अनुवत्सर एवं पञ्चम है—वत्सर। इनमें वायु है—अनुवत्सर, संवत्सर है—अग्नि, सूर्य है—परिवत्सर, सोम है—इद्वत्सर एवं रुद्र को वत्सर कहा गया है। तदनन्तर वायु के युगात्मकगण आगे कहते हैं॥३६-३८॥
आर्त्तवाः पितरो ज्ञेया ये जाता ऋतुसूनवः।
पितामहास्तु ऋतवो मासा वै सोमसूनवः ॥३९॥
प्रपितामहाश्च ऋतवः पश्चाद्वा ब्रह्मणः सुताः।
सौम्या बर्हिषदश्चैव अग्निष्वात्ताश्च ते त्रिधा ॥४०॥
आदित्यश्चैव सोमश्च लोहिताङ्गो बुधस्तथा।
बृहस्पतिश्च शुक्रश्च तथा चैव शनैश्चरः ॥४१॥
राहुश्च धूमकेतुश्च इत्येते वै नवग्रहाः।
त्रैलोक्यस्य त्विमे नित्यं भावाभावनिवेदकाः ॥४२॥
ऋतुपुत्र आर्त्तवगण को पितृपुरुष जानना चाहिये। पितामह हैं—ऋतुगण, मास हैं—सोमपुत्र। प्रपितामह ऋतुगण हैं, पश्चात् हैं—ब्रह्मपुत्रगण। सौम्य, बर्हिषद् एवं अग्निष्वात्त—ये तीन पितृपुरुष हैं। आदित्य (रवि), सोम (चन्द्र), लोहिताङ्ग (मंगल), बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर राहु तथा केतु—ये नव ग्रह हैं। ये त्रिभुवन में नित्य शुभाशुभ के ज्ञापक हैं॥३९-४२॥
आदित्यश्चैव सोमश्च स्मृतौ द्वौ मङ्गलग्रहौ।
राहुश्छायाग्रहश्चैव शेषास्ताराग्रहाः स्मृताः ॥४३॥
रवि तथा चन्द्र—ये मंगल ग्रह कहे गये हैं। राहु है—छायाग्रह। अन्य सबको ताराग्रह कहा गया है॥४३॥
नक्षत्राधिपतिः सोमो ग्रहराजो दिवाकरः।
पञ्च्यते वाग्निरदित्यश्चाब्मयश्चन्द्रमाः स्मृतः ॥४४॥
९२ श्रीसाम्बपुराणम्
नक्षत्र का अधिपति सोम है (चन्द्र है)। ग्रहराज हैं—दिवाकर। चन्द्रमा अग्नि तथा जलमय है॥४४॥
आदित्यः पठ्यते ब्रह्मा विष्णुस्तेषां च चन्द्रमाः ।
माहेश्वरस्तु विज्ञेयस्तृतीयोऽङ्गारको ग्रहः ॥४५॥
रवि हैं—ब्रह्मा, विष्णु हैं—चन्द्रमा एवं महेश्वर के पुत्र हैं—मंगल॥४५॥
कश्यपस्य सुतः सूर्यः सोमो धर्मसुतः स्मृतः ।
देवासुरगुरू द्वौ तु भानुमन्तौ महाग्रहौ ॥४६॥
कश्यप के पुत्र सूर्य हैं एवं चन्द्र धर्मपुत्र हैं। देव तथा असुरों के गुरु क्रमशः बृहस्पति तथा शुक्र हैं। ये उज्ज्वल महाग्रह हैं॥४६॥
प्रजापतिसुतावेतावुभौ शुक्रबृहस्पतिः ।
बुधः सोमात्मजः श्रीमान् सूर्यपुत्रः शनैश्चरः ॥४७॥
प्रजापति के पुत्र शुक्र तथा बृहस्पति हैं। बुध है—चन्द्रपुत्र तथा श्रीमान् शनैश्चर सूर्यपुत्र हैं॥४७॥
सैंहिकेयः स्मृतो राहुः केतुश्च ब्रह्मणः सुतः ।
सर्वेषां तु ग्रहाणां वै ह्यधस्ताच्चरते रविः ॥४८॥
राहु को सिंहिका का पुत्र तथा केतु को ब्रह्मा का पुत्र कहा गया है। समस्त ग्रहों के मध्य निम्न भाग में विचरणशील हैं—सूर्य॥४८॥
रवेरूर्ध्वं स्थितः सोमः सोमान्नक्षत्रमण्डलम् ।
नक्षत्रेभ्यो बुधस्तूर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः ॥४९॥
तस्मादङ्गारकश्चोर्ध्वं तस्य चोर्ध्वं बृहस्पतिः ।
तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं तस्योर्ध्वमृषिमण्डलम् ॥५०॥
रवि के ऊपर सोम (चन्द्र) स्थित हैं। सोम के ऊपर नक्षत्रमण्डल है। नक्षत्र के ऊपर शुक्र हैं और उसके ऊर्ध्व में है—मंगल। उसके ऊर्ध्व में है—बृहस्पति। उसके ऊर्ध्व में शनि तथा उसके ऊर्ध्व में ऋषिमण्डल विराजमान है॥४९-५०॥
ऋषिभ्यश्च ध्रुवस्योर्ध्वमासनं कथितं बुधैः ।
आदित्यनिलये राहुः कदाचित् सोममार्गगः ॥५१॥
सूर्यमण्डलसंस्थस्तु केतुर्नित्यं प्रसर्पति ।
नवयोजनसाहस्रो विस्तारो भास्करस्य तु ॥५२॥
विस्तारात् त्रिगुणं चास्य परिणाहेन मण्डलम् ।
द्विगुणः सूर्यविस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः ॥५३॥
अष्टादशोऽध्यायः ९३
अष्टादशोऽध्यायः ९३
ऋषियों से ऊर्ध्व में ध्रुव का आसन है। यह विद्वान् लोग कहते हैं। रविमण्डल में राहु अवस्थित है, जो कदाचित् सोम के पथ पर गमन करता है। सूर्यमण्डल-स्थित केतु नित्य सोममण्डल में गमन करता है। सूर्य का विस्तार ९००० योजन है। इस विस्तार से तीन गुणा परिणाह वाला मण्डल है। सूर्य के विस्तार का दूना चन्द्र का विस्तार कहा गया है॥५१-५३॥
विशेष— सूर्य से चन्द्र को दूना बताया गया है, यह सम्भव नहीं है।
त्रिगुणं मण्डलं चास्य यथैव सवितुस्तथा।
चन्द्रतः षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते ॥५४॥
भार्गवात् पादहीनो वै विज्ञेयस्तु बृहस्पतिः।
बृहस्पतेः पादहीनौ कुजसौम्यावुदाहृतौ ॥५५॥
विस्तारमण्डलाभ्यां च पादहीनस्तयोर्बुधः।
बुधतुल्यानि ऋक्षाणि सर्वह्रस्वानि यानि तु ॥५६॥
चन्द्र का मण्डल सूर्य से तिगुना (?) विस्तृत है। चन्द्र के सोलहवें भाग की विस्तृति शुक्र की है। शुक्र का पादहीन विस्तार बृहस्पति का है। बृहस्पति के एक पादहीन विस्तार के बराबर मंगल तथा बुध हैं। बुध के समान ही समस्त नक्षत्रों का विस्तार है॥५४-५६॥
योजनार्धप्रमाणानि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।
राहुः सूर्यप्रमाणस्तु कदाचित् सोऽपि सम्मितः।
तस्माद् ग्रहप्रमाणन्तु केतुस्त्वनियत: स्मृतः ॥५७॥
जो सब से हीन नक्षत्र है, उसका विस्तार आधा योजन प्रमाण है। उससे ह्रस्व कोई नक्षत्र नहीं है। राहु कभी-कभी सूर्यवत् प्रतीत होता है। तभी राहु को ग्रह मानते हैं। केतु का स्थान नियत नहीं है॥५७॥
भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकस्तदनन्तरम्।
महर्जनस्तपःसत्यं सप्तलोकाः प्रकीर्त्तिताः ॥५८॥
भूरूपं पार्थिवो लोको ह्यन्तरिक्षं भुवः स्मृतः।
स्वरित्येवं दिवं विद्याच्छेषास्तूर्ध्वं यथाक्रमम् ॥५९॥
भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपःलोक, सत्य लोक—ये सात लोक कहे गये हैं। भूलोक है—पार्थिव लोक, अन्तरिक्ष है—भुवर्लोक, स्वर्लोक है—द्युलोक। अन्य सबको यथाक्रम से ऊर्ध्वलोक जानना चाहिये॥५८-५९॥
भूतस्याधिपतिश्चाग्निस्ततो भूतपतिस्तु सः।
नभसोऽधिपतिर्वायुस्तेन वायुर्नभस्पतिः ॥६०॥
९४ || श्रीसाम्बपुराणम् ||
गन्धर्वाप्सरसश्चैव गुह्यकाः सह राक्षसैः।
भूर्लोकवासिनः सर्वेऽप्यन्तरिक्षचरान् शृणु ॥६१॥
भूलोकाधिपति हैं—अग्नि, इसीलिये अग्नि को भूतपति कहते हैं। नभोलोक के अधिपति हैं—वायु, तभी वे नभस्पति कहलाते हैं। स्वर्गलोकाधिपति हैं—सूर्य, अतः उन्हें दिवस्पति कहते हैं। गन्धर्व, अप्सरा, गुह्यक तथा राक्षस भूलोकवासी हैं। अब अन्तरिक्षचारियों की बात सुनो॥६०-६१॥
मरुतः सप्तभिः स्कन्धैः रुद्रास्तत्रैव चाश्विनौ।
आदित्या वसवः स्वर्गे तत्रैव च गवां गणः ॥६२॥
मरुद्गण, सप्त स्कन्धगण, रुद्रगण तथा अश्विनीकुमारद्वय वहाँ अन्तरिक्ष में रहते हैं। आदित्यगण एवं वसुगण स्वर्ग में रहते हैं। वहीं गौ की भी स्थिति है॥६२॥
चतुर्थे च महर्लोके तिष्ठन्त्याकल्पवासिनः।
प्रजानां पतिभिः सर्वैः सेव्यते पञ्चमो जनः ॥६३॥
मनुः सनत्कुमाराद्या वैराजश्च तपःस्थिताः।
सत्यस्तु सप्तमो लोको ह्यापुर्मार्गगतानिमान् ॥६४॥
चतुर्थ लोक महर्लोक में आकल्पवासी निवास करते हैं। सभी प्रजागण के पतिगण जनलोक में स्थित रहते हैं। वसु, सनत्कुमारादि तथा विराट-सम्बन्धित (वैराज) सभी तपलोक में अवस्थान करते हैं। सत्य सप्तम लोक में अवस्थित है। सभी मार्गगत लोकों का यही प्राप्ति-स्थान है॥६३-६४॥
ब्रह्मलोकः समाख्यातो ह्यप्रतीघातलक्षणः।
महीतलां सहस्राणां शतादूर्ध्वं दिवाकरः ॥६५॥
यह जो सत्यलोक (ब्रह्मलोक) नाम से ख्यात है, वह विघ्नरहित स्थान है। महीतल (पृथ्वी) से शत सहस्र ऊर्ध्व में दिवाकर स्थित हैं॥६५॥
दश तानि ध्रुवं यावद् द्विगुणाद् द्विगुणोत्तरे।
दश योजनकोट्यस्तु भूमेरूर्ध्वं ध्रुवः स्मृतः ॥६६॥
ये दस लोक ध्रुव लोक-पर्यन्त द्विगुण से लेकर उत्तरोत्तर द्विगुण वर्धित होते हैं। भूमि से ऊर्ध्व में दश योजन कोटि ध्रुवलोक को कहा गया है॥६६॥
त्रयोविंशतिलक्षाणि त्रैलोक्यात् संघ उच्यते।
द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च ॥६७॥
तेईस लाख त्रैलोक्य की उच्चता कही गई है। उसका द्विगुण है—शत सहस्र योजन॥६७॥
अष्टादशोऽध्यायः ९५
अष्टादशोऽध्यायः ९५
लोकोत्तरमथैकैकं ध्रुवादूर्ध्वं विधीयते ।
देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः ।
भूता विद्याधराश्चैव अष्टौ ते देवयोनयः ॥६८॥
अस्मिन्व्योम्नि त्वमी लोकाः सप्तैव सम्प्रतिष्ठिताः ।
मरुतः पितरो छन्दास्तस्मिन्नेवाग्नयो ग्रहाः ॥६९॥
ये चाप्येते समाख्याता मयाष्टौ देवयोनयः ।
मूर्तयोऽमूर्तयश्चैव सर्वे ते व्योम्यवस्थिताः ॥७०॥
एवंविधमिदं व्योम सर्वदेवमयं स्मृतम् ।
सर्वभूतमयं चैव सर्वश्रुतिमयं तथा ॥७१॥
तस्माद् योऽर्चयते व्योम तेन सर्वेऽर्चिताः पुराः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शुभार्थी व्योम पूजयेत् ॥७२॥
इति श्री साम्बपुराणे देवतोपाख्यापनं नामाष्टादशोऽध्यायः
ध्रुवलोक के ऊर्ध्व में एक लोक है। देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पन्नग, भूत तथा विद्याधर—यह आठ देवयोनि है। उस व्योम में यह सप्तलोक प्रतिष्ठित हैं। मरुद्गण, पितृगण, मेघसमूह, अग्नि तथा सभी ग्रह वहाँ अवस्थित हैं।
इस प्रकार यह व्योम सर्वदेवमय है। यह सर्वभूतमय तथा सर्वश्रुतिमय है। अतएव जो व्योम की अर्चना करते हैं, वे समस्त देवों की अर्चना करते हैं। अतः मंगलकामी व्यक्ति को सर्वप्रयास के साथ व्योम का पूजन करना चाहिये॥६८-७२॥
श्री साम्बपुराण का देवतोपाख्यान नामक अष्टादश अध्याय समाप्त
एकोनविंशोऽध्यायः
(व्योमोत्पत्तिः)
नारद उवाच
आकाशं खं वियद्व्योम चान्तरिक्षं नभोऽम्बरम्।
पुष्करं गगनं चेति मेरुस्तत्रैव कीर्त्यते ॥१॥
मेरुश्च पृथिवीमध्ये समन्तात्तस्य मेदिनी।
भूमेर्द्वीपविभागस्तु प्रवक्ष्यामि समन्ततः ॥२॥
आकाश, खं, वियत्, व्योम, अन्तरिक्ष, नभ, पुष्कर तथा गगन—यह सब आकाश के पर्याय हैं। वहीं मेरु भी कीर्तित है। यह पृथिवी के मध्य में है। उसके चारो ओर मेदिनी (पृथिवी) है। चारो ओर भूमि का द्वीपविभाग है॥१-२॥
जम्बूशककुशद्वीपक्रौञ्चगोमेदकानि च।
शाल्मलीपुष्कराख्ये च सप्तद्वीपानि भागशः ॥३॥
लवणक्षीरदध्यम्बुघृतोदेक्षुरसोदकाः ।
स्वादूदकश्च सप्तैते समुद्राः परिकीर्तिता ॥४॥
जम्बू, शक, कुश, क्रौञ्च, गोमेध, शाल्मलि तथा पुष्कर नामक सात द्वीप कहे गये हैं। लवण, क्षीर, दध्यम्बु, घृतोद, इक्षु, रसोदक तथा स्वादूदक नामक सात समुद्र कहे गये हैं॥३-४॥
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नील एव च।
श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव षडेते वर्षपर्वताः ॥५॥
हिमवान्, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत तथा शृङ्गवान्—ये छः वर्ष पर्वत कहे गये हैं॥५॥
मानसः सप्तमस्तेषां पुर्योऽष्टौ यत्र संस्थिताः ।
माहेन्द्री चाप्यथाग्नेयी याम्या च नैर्ऋती तथा ॥६॥
वारुणी वायवी चैव सौम्येशानी तथैव च।
मानसान्निर्जला भूमिलोंकालोकस्ततो गिरिः ॥७॥
तदनन्तर सप्तम है—मानस पर्वत। वहाँ आठ नगरी विद्यमान है। माहेन्द्री, आग्नेयी, याम्या, नैर्ऋती, वारुणी, वायवी, सौम्या तथा ईशानी—ये आठ नगरी हैं। मानस पर्वत से आगे निर्जला भूमि है और उसके आगे है—लोकालोक पर्वत॥६-७॥
एकोनविंशोऽध्यायः ९७
एकोनविंशोऽध्यायः ९७
ततस्त्वण्डकपालं तु तस्माच्च परतस्तमः।
ततोऽग्निर्वायुराकाशं ततो भूतादिरुच्यते ॥८॥
ततो महान् प्रधानं च प्रकृतिः पुरुषस्ततः।
पुरुषादीश्वरो ज्ञेय ईश्वरेणावृतं जगत् ॥९॥
तदनन्तर अण्डकपाल उसके बाद अन्धकार है। उसके आगे अग्नि, वायु, आकाश, तदनन्तर भूतादि हैं। तदनन्तर महान्, प्रधान एवं प्रकृति है। उसके पश्चात् पुरुष है और उस पुरुष से आगे ईश्वर अवस्थित है। उसी ईश्वर के द्वारा यह जगत् आवृत है॥८-९॥
ऊर्ध्वं मध्यमथश्चैते प्राङ्मया ये प्रकीर्त्तिता।
भूयस्तान् सम्प्रवक्ष्यामि ह्यण्डावरणकारणात् ॥१०॥
ऊर्ध्व, मध्य एवं अधः—यह मैंने पहले कह दिया है। अण्ड के आवरण का कारण कहकर पुनः उसकी बात कहूँगा॥१०॥
भूर्लोकश्च भुवश्चैव तृतीयः स्वः प्रकीर्त्तितः।
महर्जनस्तपः सत्यं सप्तलोकाः प्रकीर्त्तिताः ॥११॥
भूलोक, भुवर्लोक तथा तृतीय स्वर्गलोक कहा गया है। मह, जन, तप, सत्य—ये सात लोक प्रसिद्ध हैं॥११॥
ततस्त्वण्डकपाले च तस्माच्च परतस्तमः।
ततोऽग्निर्वायुराकाशः ततो भूतादिरुच्यते ॥१२॥
तदनन्तर अण्डकपाल एवं तत्पश्चात् अन्धकार की स्थिति है, तत्पश्चात् अग्नि, वायु, आकाश एवं तदनन्तर भूतादि की स्थिति कही जाती है॥१२॥
ततो महान् प्रधानं च प्रकृतिः पुरुषस्ततः।
पुरुषादीश्वरो ज्ञेय ईश्वरेणावृतं जगत् ॥१३॥
तदनन्तर महान्, प्रधान तथा प्रकृति; तदनन्तर पुरुष। पुरुष के पश्चात् ईश्वर, ईश्वर के द्वारा जगत् आवृत है॥१३॥
भूमेरधस्तात् सप्तैव लोकांस्तान्नामभिः शृणु।
ततः सुतलपातालौ तमस्तालस्ततः परः ॥१४॥
सुशालश्च विशालश्च सप्तमश्च रसातलः ॥१५॥
भूमि के निम्न भाग के सात लोकों के नाम सुनो। भूमि के नीचे सुतल, पाताल, तम, ताल, सुशाल, विशाल एवं सप्तम है—रसातल॥१४-१५॥
ततो महान् प्रधानं च प्रकृतिः पुरुषस्ततः।
पुरुषादीश्वरो ज्ञेय ईश्वरेणावृतं जगत् ॥१६॥
९८ श्रीसाम्बपुराणम्
एवं मेरोः समन्तात्तु सर्वमेतत् प्रकीर्त्तितम्। उत्पन्नं स चतुःशृङ्गः सुमेरुः शुद्धकाञ्चनः ॥११७॥ पृथिव्यां संस्थितो मध्ये सिद्धगन्धर्वसेवितः। चतुर्भिः काञ्चनैः शृङ्गैर्दिव्यैर्देवमिवोल्लिखत् ॥११८॥
तदनन्तर महान्, प्रधान तथा प्रकृति; तदनन्तर पुरुष, पुरुष के परे ईश्वर, ईश्वर द्वारा समस्त जगत् आवृत रहता है। मेरु के चारो ओर यह सब है। चतुःशृङ्ग-विशिष्ट शुद्ध स्वर्णमय सुमेरु उत्पन्न है। यह पृथिवी के मध्य में है। यह सिद्ध तथा गन्धर्व द्वारा सेवित है। यह चार स्वर्णमय दिव्य शिखरों से युक्त है तथा इसे देवता के समान कहा गया है॥११६-१८॥
योजनानां सहस्राणि चतुराशीतिरुच्छ्रितः। प्रवृष्टः षोडशाधस्तादष्टाविंशतिविस्तृतः ॥११९॥ विस्तरात् त्रिगुणश्चास्य परीणाहः समन्ततः। तस्य सौमनसं नाम शृङ्गमेकं तु काञ्चनम् ॥१२०॥
इसका एक शृङ्ग चौरासी हजार योजन उन्नत, सोलह सहस्त्र योजन वर्षणयोग्य स्थान एवं निम्न देश में अट्ठारह हजार योजन विस्तृत एवं विस्तार का तीन गुना चारो ओर फैला है। वह सौमनस नामक सुवर्णमय शृङ्ग है॥११९-२०॥
द्वितीयं पद्मरागाभं ज्योतिष्कं नामनामतः। तृतीयं नामतश्चित्रं सर्वधातुमयं शुभम् ॥१२१॥
द्वितीय शृङ्ग पर पद्मराग की प्रभातुल्य ज्योतिष्क नामक लोक विराजमान है। तृतीय शृङ्ग पर चित्रनामक सर्वधातुमय शुभ लोक है॥१२१॥
चतुर्थं राजतं शुक्लं चान्द्रमासमिति स्मृतम्। तस्य सौमनसं यत्तत् शृङ्गं जाम्बूनदं श्रुतम् ॥१२२॥ तदेव चोदयन्नाम्ना यत्रोद्यन् दृश्यते रविः। उत्तरेण परिक्रम्य जम्बूद्वीपे दिवाकरः ॥१२३॥ दृश्यो भवति भूतानां शिखरं तत्समाश्रितः। काञ्चनस्य च शृङ्गस्य तेजसार्कस्य चावृते ॥१२४॥
चतुर्थ चाँदी के समान शृङ्ग पर शुक्ल चन्द्र लोक ख्यात है। उसका जो सौमनस्य शृङ्ग है, वह जाम्बूनद नाम से प्रसिद्ध है। जो उदयाचल कहा गया है, वहाँ रवि दृष्ट होते हैं। उत्तर दिक् में परिक्रमा करके जम्बूद्वीप में उस शिखर का आश्रय लेकर दिवाकर प्राणियों को दृष्ट होते हैं। वह स्वर्णशृङ्ग सूर्यतेज से ढका है॥१२३-२४॥
एकोनविंशोऽध्यायः ९९
एकोनविंशोऽध्यायः ९९
उभे सन्ध्ये प्रकाशेते आताम्रे पूर्वपश्चिमे।
शृङ्गे सौमनसे सूर्ये ह्यत्तिष्ठत्युत्तरायणे ॥२५॥
उस सौमनस शृङ्ग पर उत्तरायण में सूर्य के आने पर प्रातः तथा सायंकाल में पूर्व तथा पश्चिम दिक् में सूर्य ताम्रवर्ण दिखलाई पड़ता है॥२५॥
ज्योतिष्के दक्षिणे चापि विषुवे मध्यगस्तयोः।
तस्येशानेऽभवत्सर्वः शृङ्गेऽग्निः पूर्वदक्षिणे ॥२६॥
सूर्य के दक्षिण दिशा (दक्षिणायन में जाने पर)······पूर्व तथा पश्चिम दिक् शुभ्र अग्निवर्ण के हो जाते हैं॥२६॥
नैर्ऋत्ये पितरो ज्ञेयो वायव्ये मरुतस्तथा।
मध्ये नारायणः साक्षाद् ब्रह्मज्योतींषि चैव हि।
आदित्यः स्वेन रूपेण तस्मिन् व्योम्नि प्रतिष्ठितः ॥२७॥
इति श्री साम्बपुराणे व्योमोत्पत्तिर्नामैकोनविंशोऽध्यायः
नैर्ऋत्य में पितरों का एवं वायव्य में मरुद्गणों का स्थान है तथा मध्य में साक्षात् नारायण विराजमान हैं, जो ब्रह्मज्योतिःस्वरूप हैं। उसी आकाश में सूर्य अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित है॥२७॥
श्री साम्बपुराण का व्योमोत्पत्ति नामक उनविंश अध्याय समाप्त
विंशोऽध्यायः
(सूर्यपरिक्रमणम्)
नारद उवाच
अथ हेममयस्यास्य मेरोः प्रतिदिशं स्थिताः।
चतुर्णां लोकपालानां पूर्वस्तान्नामभिः शृणु॥१॥
नारद कहते हैं—हेममय इस मेरु के प्रत्येक दिशा में स्थित चार लोकपालों की नगरी विद्यमान है। अब उनके नाम सुनो॥१॥
प्राच्यां दिशि सुमेरोस्तु महेन्द्रस्यामरावती।
दक्षिणे तु पुनर्मेरोर्यमस्य यमनीपुरी॥२॥
प्रतीच्यां तु पुनर्मेरोर्वरुणस्य सुखापुरी।
दिश्युत्तरस्यां मेरोस्तु सोमस्यापि विभापुरी॥३॥
मध्याह्नं मध्यरात्रं च उदयास्तमने तथा।
कुर्वंश्चतुर्षु पार्श्वेषु तपत्येष हि भास्करः॥४॥
सुमेरु के पूर्व की ओर महेन्द्र की अमरावती नगरी विद्यमान है। मेरु के दक्षिण में यमनी नामक यम की पुरी है। मेरु के पश्चिम में वरुण की सुखा नामक पुरी है और मेरु के उत्तर की ओर सोम की विभानामक पुरी स्थित है। उदय तथा अस्तगमन काल में मध्याह्न तथा मध्यरात्र (अर्थात् उदयकाल के दिवाभाग में मध्याह्न तथा अस्तगमनकाल में रात्रि में मध्यरात्र) का सम्पादन करके चारो ओर भास्कर ताप-दान करते हैं॥२-४॥
मध्यगश्चामरावत्यां यदा भवति भास्करः।
वैवस्वते संयमने चोत्तिष्ठन् दृश्यते तदा॥५॥
जब सूर्य अमरावती के मध्यगामी होता है, तब वैवस्वत (सूर्य) संयमनी पुरी से उठते हैं तथा दिखलाई पड़ते हैं॥५॥
सुखायामर्धरात्रं तु विभायामस्तमेति च।
वैवस्वते संयमने मध्यगस्तु रविर्यदा॥६॥
सुखायामथ वारुण्यामुत्तिष्ठन् दृश्यते तदा।
विभायामर्धरात्रं तु माहेन्द्रयामस्तमेति च॥७॥
१०१
सुखा (वरुणपुरी) में आधी रात को तथा विभा (सोम की पुरी) में सूर्य अस्त होते हैं। वैवस्वत संयमनी पुरी में जब मध्यगामी होते हैं तब वरुण की सुखा पुरी में उदित सूर्य दृश्यमान होते हैं। किन्तु तब विभा में अर्धरात्रि होती है एवं माहेन्द्र (अमरावती) पुरी में सूर्य का अस्तगमन होता है।।६-७।।
सुखायां चापि वारुण्यां मध्याह्ने चार्यमा यदा।
विभायां सोमपुर्यां स उत्तिष्ठति विभावसुः ॥८॥
सुखा नामक वरुण की पुरी में जब मध्याह्न में अर्यमा (सूर्य) रहते हैं तब विभा की सोमपुरी में विभावसु (सूर्य) उदित होते हैं।।८।।
रात्र्यर्धे त्वमरावत्यामस्तमेति यमस्य वै।
सोमपुर्यां विभायान्तु मध्याह्ने त्वर्यमा यदा ॥९॥
जब अमरावती में अर्द्धरात्रि होती है, तब यमपुरी में सूर्यास्त होता है। तब सोमपुरी विभा में मध्याह्न होता है।।९।।
माहेन्द्र्याममरावत्यामुत्तिष्ठति दिवाकरः।
अर्द्धरात्रं संयमने वारुण्यामस्तमेति च ॥१०॥
महेन्द्रपुरी अमरावती में जब दिवाकर उदित होते है, संयमनी में तब आधी रात होती है तथा वरुण की पुरी में सूर्यास्त होता है।।१०।।
एवं चतुर्षु पार्श्वेषु मेरोः कुर्वन् प्रदक्षिणाम्।
उदयास्तमने चासावुत्तिष्ठति पुनः पुनः॥११॥
इस प्रकार मेरु के चारो ओर प्रदक्षिणा करते हुये अस्त होने के पश्चात् बार-बार सूर्य उदित होता है।।११।।
पूर्वाह्ने वापराह्ने च द्वौ द्वौ देवालयौ तु सः।
तपत्येकञ्च मध्याह्ने ताभिरेव गभस्तिभिः ॥१२॥
पूर्वाह्न तथा अपराह्न में वह सूर्य दो-दो देवालय एवं मध्याह्न में एक देवालय में सब किरणों द्वारा ताप प्रदान करते हैं।।१२।।
उदितो वर्धमानाभिरामध्याक्रान्तये रविः।
ततः परं ह्रसन्तीभिर्गोभिरस्तु नियच्छति ॥१३॥
रवि उदित होने पर (मेरु) अतिक्रम के लिये क्रमशः वर्द्धमान किरण प्रकाशित करके एवं तदनन्तर क्षीण किरणों के साथ अस्तगमन करता है।।१३।।
यत्रोद्यन् दृश्यते चैव स तेषामुदयः स्मृतः।
अदृश्यं गच्छते यत्र तेषामस्तं तदुद्यते ॥१४॥
१०२ श्रीसाम्बपुराणम्
सूर्य उदित होने पर जहाँ दृश्य होता है, उसे उदय कहते हैं तथा जहाँ अदृश्य होते हैं, उसे अस्त कहते हैं।।१४।।
विदूरभावादर्कस्य भूमिलेखागतस्य च।
लीयते रश्मयो यस्मात्तेन रात्रौ न दृश्यते ॥१५॥
भूमिरेखा से सूर्य के अतिदूर स्थित होने के कारण तथा रश्मिसमूह लीन होने के कारण रात में सूर्य दृश्य नहीं होता।।१५।।
लेखायामास्थितः सूर्यो यत्र यत्र प्रदृश्यते।
ऊर्ध्वं शतसहस्रं तु योजनानां स दृश्यते ॥१६॥
भूमि रेखा में अवस्थित सूर्य जहाँ-जहाँ दृश्य होता है, शतसहस्र योजन ऊर्ध्व में भी वह दृश्य होता है।।१६।।
एवं पुष्करमध्यन्तु यथा भवति भास्करः।
त्रिंशद्भागन्तु मेदिन्यां मुहूर्तेन स गच्छति ॥१७॥
पूर्णं शतसहस्राणामेकत्रिंशच्छताधिकम्।
निमेषान्तरमात्रेण दिवि सूर्यः प्रसर्पति ॥१८॥
जब सूर्य पुष्कर-मध्य में अवस्थान करते हैं, तब पृथिवी का तीस भाग मुहूर्त में अतिक्रम करते हैं। पूर्ण, शत, सहस्र, एकत्रिंश शताधिक निमेषमात्र सूर्य आकाश में गमन करते हैं।।१७-१८।।
पञ्चाशता तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु।
मौहूर्तिकी गति ह्येषा सूर्यस्य तु विधीयते ॥१९॥
योजनानां सहस्रे द्वे शते द्वे चैव योजने।
निमिषान्तरमात्रेण दिवि सूर्यः प्रसर्पति ॥२०॥
पञ्चशत तथा अन्य सहस्राधिक मौहूर्तिकी गति इस सूर्य की होती है। सूर्य निमेष मात्र में दो हजार दो सौ योजन गमन करते हैं।।१९-२०।।
स शीघ्रमेव पर्येति भास्कराऽलातचक्रवत्।
भ्रमाद्यैर्भ्रममानेषु ऋक्षेषु विहरत्यसौ ॥२१॥
वह भास्कर शीघ्रता से अलातचक्र के समान परिभ्रमण करते-करते भ्रममाण नक्षत्रों में विहार करते हैं।।२१।।
इन्द्रः पूजयते सूर्यमुदयन्तं दिने दिने।
मध्याह्ने धर्मराजस्तु ह्यस्तं यान्तमपांपतिः ॥२२॥
विंशोऽध्यायः १०३
विंशोऽध्यायः १०३
इन्द्र प्रतिदिन उदीयमान सूर्य का पूजन करते हैं। मध्याह्न काल में धर्मराज पूजन करते हैं तथा अस्तगामी सूर्य का पूजन वरुण करते हैं।।२२।।
सोमस्तथार्धरात्रे तु कुबेरश्चैव सानुगः।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च पूजयन्ति निशाक्षये ॥२३॥
एवमग्निर्निर्र्ऋतिश्च वायुरीशान एव च।
पूजयन्ति क्रमेणैव भ्रममाणं दिवाकरम् ॥२४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यस्य परिक्रमणं नाम विंशतितमोऽध्यायः
इसी प्रकार अर्द्धरात्रि में सोम एवं सानुग (अनुगामी गण के साथ) कुबेर पूजन करते हैं। रात्रि के शेष काल में ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव सूर्य का पूजन करते हैं। इसी प्रकार अग्नि, निर्ऋति (दक्षिण पश्चिम कोण के शासक देवता), वायु तथा ईशान (अष्टम रुद्र) क्रमशः भ्रममान सूर्य का पूजन करते हैं।।२३-२४।।
श्री साम्बपुराणोक्त सूर्यपरिक्रमा तथा देवपूजन नामक विंश अध्याय समाप्त
एकविंशोऽध्यायः
(आदित्यरथवर्णनम्)
नारद उवाच
अथ सूर्यरथस्यास्य सन्निवेशं निबोध मे।
स्यन्दते चैकचक्रेण पञ्चारेण त्रिणेमिना ॥१॥
नारद कहते हैं—अब सूर्यरथ का सन्निवेश कहता हूँ, मुझसे सुनो। एक चक्र, पाँच अर (चक्र की नाभि तथा नेमि में संयोजित काष्ठ) तथा तीन नाभि द्वारा वह परिचालित होता है॥१॥
हिरण्मयेन कान्तेन ह्यष्टचर्मैकनेमिना।
चक्रेण भास्वता चैव दिवि सूर्य प्रसर्पति ॥२॥
हिरण्मय कान्तियुक्त अष्ट चर्म के नेमियुक्त उज्ज्वल रथ द्वारा द्युलोक में सूर्य गमन करते हैं॥२॥
नवयोजनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते।
द्विगुणोऽस्य रथोपस्थादीषादण्डप्रमाणतः ॥३॥
नव योजन सहस्र (९०००) इसकी विस्तृति एवं विशालता कही गयी है तथा रथ से द्विगुण इषादण्ड का प्रमाण है (अक्ष तथा युगधारणार्थ दण्ड)॥३॥
धुरेऽस्यैव तु विस्तीर्णे अरुणो नाम सारथिः।
स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथः संवत्सरात्मकः ॥४॥
इस विस्तीर्ण धूर का अरुण नामक सारथी है। उनका यह रथ ब्रह्मा द्वारा सृष्ट तथा संवत्सरात्मक है॥४॥
आसङ्गः काञ्चनो दिव्यो युक्तः परमगैर्हयैः।
छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर्यतश्चक्रं ततः स्थितैः ॥५॥
तेनासौ सर्पते व्योम्नि भास्वता तु दिवस्पतिः ॥६॥
यह स्वर्णवर्ण के द्रुतगामी अश्वों से जुता रथ है। अश्वरूप छन्दों से आकाश को उद्भासित करने वाले इस रथ पर दिवाकर संक्रमण करते हैं॥५-६॥
अथ मारीचसूर्यस्य प्रत्यङ्गानि रथस्य तु।
संवत्सरास्यावयवैः कल्पितानि यथाक्रमम् ॥७॥