साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें१०२ श्रीसाम्बपुराणम्
सूर्य उदित होने पर जहाँ दृश्य होता है, उसे उदय कहते हैं तथा जहाँ अदृश्य होते हैं, उसे अस्त कहते हैं।।१४।।
विदूरभावादर्कस्य भूमिलेखागतस्य च।
लीयते रश्मयो यस्मात्तेन रात्रौ न दृश्यते ॥१५॥
भूमिरेखा से सूर्य के अतिदूर स्थित होने के कारण तथा रश्मिसमूह लीन होने के कारण रात में सूर्य दृश्य नहीं होता।।१५।।
लेखायामास्थितः सूर्यो यत्र यत्र प्रदृश्यते।
ऊर्ध्वं शतसहस्रं तु योजनानां स दृश्यते ॥१६॥
भूमि रेखा में अवस्थित सूर्य जहाँ-जहाँ दृश्य होता है, शतसहस्र योजन ऊर्ध्व में भी वह दृश्य होता है।।१६।।
एवं पुष्करमध्यन्तु यथा भवति भास्करः।
त्रिंशद्भागन्तु मेदिन्यां मुहूर्तेन स गच्छति ॥१७॥
पूर्णं शतसहस्राणामेकत्रिंशच्छताधिकम्।
निमेषान्तरमात्रेण दिवि सूर्यः प्रसर्पति ॥१८॥
जब सूर्य पुष्कर-मध्य में अवस्थान करते हैं, तब पृथिवी का तीस भाग मुहूर्त में अतिक्रम करते हैं। पूर्ण, शत, सहस्र, एकत्रिंश शताधिक निमेषमात्र सूर्य आकाश में गमन करते हैं।।१७-१८।।
पञ्चाशता तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु।
मौहूर्तिकी गति ह्येषा सूर्यस्य तु विधीयते ॥१९॥
योजनानां सहस्रे द्वे शते द्वे चैव योजने।
निमिषान्तरमात्रेण दिवि सूर्यः प्रसर्पति ॥२०॥
पञ्चशत तथा अन्य सहस्राधिक मौहूर्तिकी गति इस सूर्य की होती है। सूर्य निमेष मात्र में दो हजार दो सौ योजन गमन करते हैं।।१९-२०।।
स शीघ्रमेव पर्येति भास्कराऽलातचक्रवत्।
भ्रमाद्यैर्भ्रममानेषु ऋक्षेषु विहरत्यसौ ॥२१॥
वह भास्कर शीघ्रता से अलातचक्र के समान परिभ्रमण करते-करते भ्रममाण नक्षत्रों में विहार करते हैं।।२१।।
इन्द्रः पूजयते सूर्यमुदयन्तं दिने दिने।
मध्याह्ने धर्मराजस्तु ह्यस्तं यान्तमपांपतिः ॥२२॥