साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
१०२ श्रीसाम्बपुराणम्
सूर्य उदित होने पर जहाँ दृश्य होता है, उसे उदय कहते हैं तथा जहाँ अदृश्य होते हैं, उसे अस्त कहते हैं।।१४।।
विदूरभावादर्कस्य भूमिलेखागतस्य च।
लीयते रश्मयो यस्मात्तेन रात्रौ न दृश्यते ॥१५॥
भूमिरेखा से सूर्य के अतिदूर स्थित होने के कारण तथा रश्मिसमूह लीन होने के कारण रात में सूर्य दृश्य नहीं होता।।१५।।
लेखायामास्थितः सूर्यो यत्र यत्र प्रदृश्यते।
ऊर्ध्वं शतसहस्रं तु योजनानां स दृश्यते ॥१६॥
भूमि रेखा में अवस्थित सूर्य जहाँ-जहाँ दृश्य होता है, शतसहस्र योजन ऊर्ध्व में भी वह दृश्य होता है।।१६।।
एवं पुष्करमध्यन्तु यथा भवति भास्करः।
त्रिंशद्भागन्तु मेदिन्यां मुहूर्तेन स गच्छति ॥१७॥
पूर्णं शतसहस्राणामेकत्रिंशच्छताधिकम्।
निमेषान्तरमात्रेण दिवि सूर्यः प्रसर्पति ॥१८॥
जब सूर्य पुष्कर-मध्य में अवस्थान करते हैं, तब पृथिवी का तीस भाग मुहूर्त में अतिक्रम करते हैं। पूर्ण, शत, सहस्र, एकत्रिंश शताधिक निमेषमात्र सूर्य आकाश में गमन करते हैं।।१७-१८।।
पञ्चाशता तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु।
मौहूर्तिकी गति ह्येषा सूर्यस्य तु विधीयते ॥१९॥
योजनानां सहस्रे द्वे शते द्वे चैव योजने।
निमिषान्तरमात्रेण दिवि सूर्यः प्रसर्पति ॥२०॥
पञ्चशत तथा अन्य सहस्राधिक मौहूर्तिकी गति इस सूर्य की होती है। सूर्य निमेष मात्र में दो हजार दो सौ योजन गमन करते हैं।।१९-२०।।
स शीघ्रमेव पर्येति भास्कराऽलातचक्रवत्।
भ्रमाद्यैर्भ्रममानेषु ऋक्षेषु विहरत्यसौ ॥२१॥
वह भास्कर शीघ्रता से अलातचक्र के समान परिभ्रमण करते-करते भ्रममाण नक्षत्रों में विहार करते हैं।।२१।।
इन्द्रः पूजयते सूर्यमुदयन्तं दिने दिने।
मध्याह्ने धर्मराजस्तु ह्यस्तं यान्तमपांपतिः ॥२२॥
विंशोऽध्यायः १०३
विंशोऽध्यायः १०३
इन्द्र प्रतिदिन उदीयमान सूर्य का पूजन करते हैं। मध्याह्न काल में धर्मराज पूजन करते हैं तथा अस्तगामी सूर्य का पूजन वरुण करते हैं।।२२।।
सोमस्तथार्धरात्रे तु कुबेरश्चैव सानुगः।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च पूजयन्ति निशाक्षये ॥२३॥
एवमग्निर्निर्र्ऋतिश्च वायुरीशान एव च।
पूजयन्ति क्रमेणैव भ्रममाणं दिवाकरम् ॥२४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यस्य परिक्रमणं नाम विंशतितमोऽध्यायः
इसी प्रकार अर्द्धरात्रि में सोम एवं सानुग (अनुगामी गण के साथ) कुबेर पूजन करते हैं। रात्रि के शेष काल में ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव सूर्य का पूजन करते हैं। इसी प्रकार अग्नि, निर्ऋति (दक्षिण पश्चिम कोण के शासक देवता), वायु तथा ईशान (अष्टम रुद्र) क्रमशः भ्रममान सूर्य का पूजन करते हैं।।२३-२४।।
श्री साम्बपुराणोक्त सूर्यपरिक्रमा तथा देवपूजन नामक विंश अध्याय समाप्त
एकविंशोऽध्यायः
(आदित्यरथवर्णनम्)
नारद उवाच
अथ सूर्यरथस्यास्य सन्निवेशं निबोध मे।
स्यन्दते चैकचक्रेण पञ्चारेण त्रिणेमिना ॥१॥
नारद कहते हैं—अब सूर्यरथ का सन्निवेश कहता हूँ, मुझसे सुनो। एक चक्र, पाँच अर (चक्र की नाभि तथा नेमि में संयोजित काष्ठ) तथा तीन नाभि द्वारा वह परिचालित होता है॥१॥
हिरण्मयेन कान्तेन ह्यष्टचर्मैकनेमिना।
चक्रेण भास्वता चैव दिवि सूर्य प्रसर्पति ॥२॥
हिरण्मय कान्तियुक्त अष्ट चर्म के नेमियुक्त उज्ज्वल रथ द्वारा द्युलोक में सूर्य गमन करते हैं॥२॥
नवयोजनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते।
द्विगुणोऽस्य रथोपस्थादीषादण्डप्रमाणतः ॥३॥
नव योजन सहस्र (९०००) इसकी विस्तृति एवं विशालता कही गयी है तथा रथ से द्विगुण इषादण्ड का प्रमाण है (अक्ष तथा युगधारणार्थ दण्ड)॥३॥
धुरेऽस्यैव तु विस्तीर्णे अरुणो नाम सारथिः।
स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथः संवत्सरात्मकः ॥४॥
इस विस्तीर्ण धूर का अरुण नामक सारथी है। उनका यह रथ ब्रह्मा द्वारा सृष्ट तथा संवत्सरात्मक है॥४॥
आसङ्गः काञ्चनो दिव्यो युक्तः परमगैर्हयैः।
छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर्यतश्चक्रं ततः स्थितैः ॥५॥
तेनासौ सर्पते व्योम्नि भास्वता तु दिवस्पतिः ॥६॥
यह स्वर्णवर्ण के द्रुतगामी अश्वों से जुता रथ है। अश्वरूप छन्दों से आकाश को उद्भासित करने वाले इस रथ पर दिवाकर संक्रमण करते हैं॥५-६॥
अथ मारीचसूर्यस्य प्रत्यङ्गानि रथस्य तु।
संवत्सरास्यावयवैः कल्पितानि यथाक्रमम् ॥७॥
एकविंशोऽध्यायः १०५
नाभ्यास्तिस्रस्तु चक्रस्य त्रयः कालाः प्रकीर्त्तिताः।
आराः पञ्चार्त्तवास्तस्य नेमिः षड्ऋतवः स्मृताः ॥८॥
तथोर्व्यो तस्य चायने दक्षिणोत्तरे।
मुहूर्त्ताश्च बन्धु रास्तस्य सव्यास्तस्य कलाः स्मृताः ॥९॥
मारीच सूर्य के रथ के अंगसमूह संवत्सर के अवयव के द्वारा यथाक्रम से कल्पित होते हैं। चक्र की तीन नाभि में तीन काल (भूत-भविष्यत् तथा वर्तमान) रहता है। जो अर हैं, वे पञ्च ऋतु हैं। नेमि को षड् ऋतु कहा है। उसकी दो डोरियाँ दक्षिण-उत्तर अयन हैं, धुरा मुहूर्त है एवं सव्य कलायें हैं॥७-९॥
तस्य काष्ठाः स्मृता घोणा ह्यक्षदण्डाः क्षणास्तु वै।
निमेषाश्चानुकक्षाश्च ईषा चास्य लवाः स्मृताः ॥१०॥
नाभिर्धनूर्ध्वो धर्मस्य ऊर्ध्वं तस्य समुच्छ्रितः।
युगाक्षकौ तु तौ तस्य चार्थकामावुभौ स्मृतौ ॥११॥
इसके काष्ठासमूह को (अष्टादश निमेषात्मक काल को) घोण तथा अक्षदण्ड-समूह को क्षण कहते हैं। निमेषसमूह को अनुकक्ष तथा ईषा को (रथावयव-विशेष को) लव कहा जाता है। नाभि के धनु के ऊर्ध्व को धर्म का ऊर्ध्व भाग कहते हैं। उसके युग को अर्थ तथा अक्ष को काम कहा गया है॥१०-११॥
अक्षरूपाणि च्छन्दांसि वहन्ते क्रमतो धुरम्।
गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुबेव च ॥१२॥
पंक्तिश्च बृहती चैव उष्णिगेव च सप्तमी।
चक्रमक्षनिबद्धं तु ध्रुवे चाक्षः समर्थितः ॥१३॥
इसके अक्षरूप छन्द यथाक्रम से भार वहन करते हैं। गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती तथा उष्णिक्—ये सात छन्द हैं। इसके चक्र से अक्षसमूह निबद्ध है तथा ध्रुव में अक्ष समर्थित है॥१२-१३॥
सहचक्रो भ्रमत्यक्षः स चाक्षो भ्रमति ध्रुवे।
मोक्षः सहैव चक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः ॥१४॥
चक्र के साथ अक्ष भ्रमण करता है और वह अक्ष ध्रुव में भ्रमण करता है। ध्रुव के द्वारा परिचालित वह अक्ष चक्र के साथ भ्रमण करता है॥१४॥
एवमर्थवशात्तस्य सन्निवेशो रथस्य तु।
तथा संसर्पते व्योम्नि संसिद्धो भास्करो रथः ॥१५॥
इस प्रकार प्रयोजनानुरूप सूर्यदेव का रथ सन्निवेशित है। आकाश में यह सिद्ध सूर्यरथ क्रमपूर्वक परिभ्रमण करता है॥१५॥
१०६ श्रीसाम्बपुराणम्
जेतासौ तु रविर्देवान्नभः संसर्पते तथा।
युगाक्षकोटिसम्बद्धे तस्य वै स्यन्दनस्य तु॥१६॥
ते भ्रमेते ध्रुवासक्ते तच्चक्रं युगयोस्तु वै।
भ्रमतो मण्डलान्यस्य खेचरस्य रथस्य तु॥१७॥
जयशील रवि देवगण को आकांश में परिचालित करते हैं। उनका रथ का युग कोटि अक्ष से सम्बद्ध है। चक्र तथा युग ध्रुव से आसक्त है। ऐसा आकाशगामी रथ मण्डलों में भ्रमण करता रहता है॥१६-१७॥
कुलालचक्रवद् भाति मण्डलं सर्वतोदिशम्।
रज्जुभ्यां प्रगृहीते ते चक्रे वै चेरतुर्ध्रुवे॥१८॥
यह मण्डल कुम्हार के चक्र के समान सभी दिशाओं को प्रकाशित करता है। रज्जु के द्वारा प्रगृहीत दो चक्र ध्रुव में विचरण करते रहते हैं॥१८॥
ह्रसेते तस्य रश्मी ते मण्डले दक्षिणायने।
उत्तरे त्वथ वर्धेते पुरा रश्मी युगे तु वै॥१९॥
तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु।
अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरन्तरं तयोः।
स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यै ऋषिभिस्तथा॥२०॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सर्पग्रामणिराक्षसैः।
एते वसन्ति सूर्ये वै मासौ द्वौ द्वौ क्रमेण तु॥२१॥
दक्षिणायन में सूर्यरश्मि का ह्रास होता है। पुनः उत्तरायण में रश्मियुक्त होकर वृद्धि प्राप्त करता है। ऐसे ही सूर्य बाहर मण्डलों में भ्रमण करते हैं। उन काष्ठाद्वय के पार्थक्य से अशीति शत मण्डल होता है। देवगण, आदित्यगण तथा ऋषिगण, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, ग्रामणि तथा राक्षसों के साथ सूर्यदेव रथ पर अधिष्ठित रहते हैं। ये सभी क्रमशः दो-दो मास सूर्य के रथ में अवस्थान करते हैं॥१९-२१॥
धातार्यमा पुलस्त्यश्च पुलहश्च प्रजापतिः॥२२॥
उरगो वासुकिश्चैव कच्छनीरस्तथेरितः।
तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ गायतां वरौ॥२३॥
कृतस्थल्यप्सराश्चैव या तथा पुञ्जिकस्थली।
ग्रामण्यौ रथकृत्स्नश्च रथौजाश्चैव तावुभौ॥२४॥
धाता, अर्यमा, पुलस्त्य, पुलह, प्रजापति, सर्प, वासुकी, कच्छ, नीर, तुम्बुरु तथा नारद, गायन में श्रेष्ठ गन्धर्वद्वय, गायिका कृतस्थली, पुञ्जिकस्थली अप्सरायें, दो यातुधान, दो सर्प तथा व्याघ्र उस रथ पर रहते हैं॥२२-२४॥
एकविंशोऽध्यायः १०७
रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च यातुधानौ स्मृतावभौ।
मधुमाधवयोरेष गणौ वसति भास्करे॥२५॥
राक्षस हेति-प्रहेती—ये दो लोग यातुधान कहे गये हैं। मधु (चैत्र) तथा माधव (वैशाख) मास में गणलोग सूर्य में अवस्थान करते हैं॥२५॥
वसतो ग्रैष्मिकौ मासौ मित्रश्च वरुणश्च ह।
ऋषिरत्रिर्वशिष्ठश्च तक्षकोऽनन्त एव च॥२६॥
मेनका सहजान्या च गन्धर्वौ च हहाहूहूः।
रथस्वनश्च ग्रामण्यौ रथचित्रश्च तावुभौ॥२७॥
ग्रीष्म के दो मास में मित्र तथा वरुण वास करते हैं। ऋषि हैं—वशिष्ठ तथा अत्रि। सर्प हैं—तक्षक एवं अनन्त। मेनका तथा सहजन्या हैं—अप्सरा। हाहा-हूहू गन्धर्व हैं। रथस्वन तथा रथचित्र हैं—ग्रामणी॥२६-२७॥
पौरुषेयो वधश्चैव यातुधानौ च तावुभौ।
शुचिशुक्रौ तु द्वौ मासौ सूर्ये ह्येते वसन्ति वै॥२८॥
पौरुषेय तथा वध—ये दो यातुधान हैं। शुचि तथा शुक्र (शुचि अर्थात् ज्येष्ठ, शुक्र अर्थात् आषाढ़) मास में ये सूर्य में वास करते हैं॥२८॥
अथ सूर्ये पुनस्त्वन्या निवसन्तिस्म देवताः।
इन्द्रश्चैव विवस्वांश्च अङ्गिरा भृगुरेव च॥२९॥
एलापत्रस्तथा शङ्खपालः सर्पौ च तावुभौ।
विश्वावसूग्रसेनौ च प्रेतोऽसमरथस्तथा॥३०॥
प्रम्लोचन्त्यप्सराश्चैवाऽनुम्लोचन्तीव ते शुभे।
यातुधानौ तथा सर्पौ व्याघ्रश्चैव स्मृतावभौ॥३१॥
तदनन्तर सूर्य में अन्य देवता वास करते हैं—इन्द्र तथा विवस्वान् देवता, अंगिरा तथा भृगु ऋषि, एलापत्र तथा शङ्खपाल सर्प, विश्वावसु, उग्रसेन, प्रेत, असमरथ, गन्धर्व, प्रम्लोचन्ती तथा अनुम्लोचन्ती शुभजनक अप्सरा, दो यातुधान, दो सर्प एवं व्याघ्र निवास करते हैं॥२९-३१॥
एते नभौ नभस्यौ च निवसन्ति दिवाकरे।
शरद्यान्याः पुनः शुभ्रा निवसन्तिस्म देवताः॥३२॥
ये सभी श्रावण तथा भाद्र में सूर्य में निवास करते हैं। शरत् काल में अन्यान्य देवगण वास करते हैं॥३२॥
| १०८ | श्रीसाम्बपुराणम् |
|---|
पर्जन्यश्चैव पूषा च भारद्वाजः सगौतमः।
चित्रसेनश्च गन्धर्वस्तथा वसुरुचिश्चयः॥३३॥
विश्वाची च घृताची च उभे तु पुण्यलक्षणे।
नागस्त्वैरावतश्चैव विश्रुतश्च धनञ्जयः॥३४॥
सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानी ग्रामणीश्च तौ।
आपो वातश्च द्वावेतौ यातुधानौ प्रकीर्तितौ॥३५॥
वसन्त्येते तु वै सूर्ये ईषोर्जौ कालपर्ययात्।
पर्जन्य तथा पूषा देवता, भारद्वाज तथा गौतम ऋषि, गन्धर्वगण, चित्रसेन, रुचि तथा चय नामक वसुद्वय, पुण्यलक्षणा विश्वाची तथा घृताची अप्सरा, नाग तथा ऐरावत, विश्रुत एवं धनञ्जय, सेनजित् सुषेण-सेनानी तथा ग्रामरक्षक, अप तथा वात—ये दो यातुधान। ये सभी कालक्रम से आश्विन एवं कार्तिक में सूर्य में निवास करते हैं॥३३-३५॥
हैमन्तिकौ तु द्वौ मासौ वसन्ति तु दिवाकरे॥३६॥
अंशो भागश्च द्वावेतौ कश्यपश्च क्रतुश्च तौ।
भुजङ्गश्च महापद्मः सर्पः कर्कोटकस्तथा॥३७॥
चित्राङ्गदश्च गन्धर्व ऊर्णायुश्चैव तावुभौ।
अप्सराः पूर्वचित्तिश्च गन्धर्वा चोर्वशी तथा॥३८॥
तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ।
अवस्फूर्जश्च विद्युच्च यातुधानौ तु तौ स्मृतौ॥३९॥
अग्रहायण तथा पौष (हैमान्तिक) मास में ये दिवाकर में निवास करते हैं—अंश तथा भाग ये दो देवता, कश्यप तथा ऋतु ऋषि, भुजङ्ग महापद्म तथा कर्कोटक सर्प, चित्रांगद तथा ऊर्णायु गन्धर्व, पूर्वचित्ति तथा उर्वशी अप्सरा, तार्क्ष्य (गरुड़) तथा अरिष्टनेमि—दो सेनानी (ग्रामणी) एवं दो यातुधान—अवस्फूर्ज तथा विद्युत्॥३६-३९॥
सह चैव सहस्ये च वसन्त्येते दिवाकरे।
ततः शैशिरयश्चापि मासयोर्निवसन्ति वै॥४०॥
त्वष्टा विष्णुर्जमदग्निः विश्वामित्रस्तथैव च।
काद्रवेयौ तथा नागौ कम्बलाश्वतरावुभौ॥४१॥
गन्धर्वौ धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च तावुभौ।
इत्येते निवसन्ति स्म द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे॥४२॥
माघ तथा फाल्गुन में ये सूर्य में अवस्थान करते हैं। तदनन्तर शीतकालीन मासद्वय में ये वास करते हैं—त्वष्टा एवं विष्णु देवता, जगदग्नि तथा विश्वामित्र ऋषि, काद्रवेय तथा कम्बलाश्वतर नाग, धृतराष्ट्र तथा सूर्य वर्चा गन्धर्व—ये सब दो-दो मास सूर्य में रहते हैं॥४०-४२॥
एकविंशोऽध्यायः १०९
स्थानाभिमानिनो होते गणा द्वादशसप्तकाः।
तिलोत्तमा च रम्भा च शुभे चाप्सरसां वरे ॥४३॥
ग्रामणीः ऋतुजिच्चैव सप्तजिच्च महायशाः।
ब्रह्मप्रेतश्च रक्षो वै यक्षप्रेतश्च तावुभौ ॥४४॥
सूर्यमाप्यायन्येते तेजसां तेज उत्तमम्।
प्रथितैः स्वैर्वचोभिश्च स्तुवन्ति ऋषयो रविम् ॥४५॥
स्थानाभिलाषी ये ८४ जन सूर्य के परिकर हैं। मंगलमयी अप्सराश्रेष्ठ तिलोत्तमा तथा रम्भा, ऋतुजित् तथा सप्तजित् महायशस्वी ग्रामणी, ब्रह्मप्रेत तथा यक्षप्रेत—ये राक्षस। तेजस्वी सूर्य को आप्यायित करते हैं। ऋषिगण अपने-अपने प्रसिद्ध वाक्यों से सूर्य की स्तुति करते हैं॥४३-४५॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव गीतनृत्यैरुपासते।
विद्युद् ग्रामणिो यक्षाः कुर्वन्तिस्म प्रदक्षिणम् ॥४६॥
गन्धर्व तथा अप्सरायें गीत-नृत्य से उपासना करते हैं। विद्युत्, ग्रामणीगण तथा यक्षगण प्रदक्षिणा करके स्तुति करते हैं॥४६॥
सर्पाः वहन्ति सूर्यं वै यातुधानानुयान्ति च।
बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम् ॥४७॥
सर्पगण सूर्य का वहन करते हैं। यातुधान उनका अनुगमन करते हैं। बालखिल्य ऋषिगण उदय के समय सूर्य को परिवृत करके अस्ताचल-पर्यन्त ले जाते हैं॥४७॥
एतेषामेव देवानां यथावीर्यं यथातपः।
यथायोगं यथातत्त्वं यथासत्त्वं यथाबलम् ॥४८॥
तथा तपत्यसौ सूर्यस्तेषामिन्द्रस्तु तेजसाम्।
एते तपन्ति वर्षन्ति यान्ति भान्ति सृजन्ति च ॥४९॥
जिन देवतागण की जैसी शक्ति है, जैसी तपस्या है, जैसा योग है, जैसा तत्त्व है, जैसा सत्व है, जैसा बल है, उसे तेजोसमूह श्रेष्ठ सूर्य उसी प्रकार का ताप प्रदान करते हैं। तब ये देवगण ताप देते हैं, वर्षा कराते हैं, गमन-प्रकाश प्रदान करते हैं तथा सृष्टि करते हैं॥४८-४९॥
भूतानामशुभं कर्म व्यपोहन्ति च कीर्त्तिताः।
एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ते सानुगा दिवि ॥५०॥
तपन्तश्च जपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै प्रजाः।
गोपायन्तिस्म भूतानि सर्वाणीहानुकम्पया ॥५१॥
११० श्रीसाम्बपुराणम्
ये प्राणियों के जो अशुभ कर्म कहे गये हैं, उनका अपनोदन करके सूर्य के साथ द्युलोक में भ्रमण करते हैं। ये प्रजागण को ताप देते हैं, जप करने पर आनन्द देते हैं और जगत् पर कृपा करके प्राणीगण की रक्षा करते हैं।।५०-५१।।
स्थानाभिमानिनामेतत् स्थानं मन्वन्तरेषु वै।
अतीतानागताश्चैव वर्त्तन्ते साम्प्रतं च ये॥५२॥
स्थानाभिमानियों के मन्वन्तर का यही स्थान है। अतीत, अनागत तथा वर्त्तमान में जो हैं, उनके लिये भी यही स्थान है।।५२।।
ग्रैष्मे हिमे च वर्षासु विमुञ्चमानो
घर्मं हिमं च वर्षं च दिवानिशं च।
गच्छत्यसावृतुवशात् परिवर्त्य रश्मीन्
देवान् पितृंश्च मनुजांश्च स तर्पयन् वै॥५३॥
ग्रीष्म, हिम तथा वर्षा में यथाक्रमेण गर्मी, हिम तथा वृष्टि प्रदान करते हैं। सूर्य ऋतु के वशात् रश्मि-निवर्त्तन नहीं करके देवता, पितृ एवं मनुष्यों को तृप्ति प्रदान करते हैं।।५३।।
प्रीणाति देवानमृतेन सूर्यः सोमं सुषुम्नेन विवर्द्धयित्वा।
शुक्ले तु पूर्णं दिवसक्रमेण तं कृष्णपक्षे विबुधाः पिबन्ति ॥५४॥
सूर्य देव अमृत द्वारा देवगण का प्रीतिविधान करते हैं। सोम का वर्षण सुषुम्ना नाड़ी से करते हैं। शुक्लपक्ष के दिवसक्रम में (प्रतिदिन क्रमानुसार) उसे पूर्ण करते हैं। कृष्ण पक्ष में देवता उसका पान करते हैं।।५४।।
पीतं तु सोमं हि कलावशिष्टं कृष्णे च पक्षे रुचिभिः क्षरन्तम्।
स्वधामृतं तं पितरः पिबन्ति सर्पाश्च सौम्याश्च तथैव काव्याः ॥५५॥
पीत कलावशिष्ट कृष्ण पक्ष की कान्ति द्वारा क्षरित उसे पितृगण स्वधामृत रूप से पान करते हैं। वैसे ही सर्प, सौम्य तथा काव्यगण भी पीते हैं।।५५।।
सूर्येण गोभिस्तु समुद्गताभिरद्भिः पुनश्चैव समुज्झिताभिः।
वृष्ट्याभिवृद्ध्यापि तथौषधीभिर्मर्त्याः सुधामन्नरसैर्जयन्ति ॥५६॥
सूर्य की किरणों से समुद्भूत, पुनः परित्यक्त जल द्वारा वृष्टिरूपेण अभिवृद्ध औषधि द्वारा, अन्नरस द्वारा मर्त्यगण (मनुष्य जाति) सुधा प्राप्त करते हैं।।५६।।
मासार्द्धतृप्तिस्त्वमृतात्सुराणां मासं च तृप्तिः स्वधया पितॄणाम्।
अन्नेन शश्वच्च दधाति मर्त्यान् सूर्यः स्वयं तत्र विभाति गोभिः ॥५७॥
अमृत से देवगण की एक पक्ष (आधा मास) तक तृप्ति होती है। स्वधा से देवगण एक मास तृप्त रहते हैं। मृत्युलोक-वासी जीवगण को निरन्तर अन्न से तृप्त करके सूर्य अपनी किरणों से प्रकाश प्रदान करते हैं।।५७।।
एकविंशोऽध्यायः १११
अयं हरिद्विर्हरितैस्तुरङ्गैः हरद्विरापो हरितैश्च रश्मिभिः । विसर्गकाले विसृजंश्च ताः पुनर्विभर्ति शश्वत् सविता चराचरम् ॥५८॥
यह सूर्य हरित वर्ण तुरङ्ग के साथ हरित वर्ण रश्मि द्वारा जल का आहरण करते हैं। पुनः वर्षा काल में उसका वर्षण करते हैं। यह सविता स्वयं निरन्तर चराचर का पालन करते हैं॥५८॥
अहोरात्राद्रथेनासावेकचक्रेण वै भ्रमन्। सप्तद्वीपसमुद्रां गां सप्तभिः सप्तभिर्द्रुतम् ॥५९॥
अहोरात्र एक चक्रयुक्त रथ पर आसीन वह सूर्य सात अश्वों द्वारा द्रुत गति होकर सप्तद्वीप-युक्त समुद्रवेष्टित पृथिवी का परिक्रमण करते हैं॥५९॥
छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर्यरतश्चक्रं ततः स्थितैः। कामरूपैः सकृद्युक्तैर्बृहद्भिस्तैर्मनोजवैः ॥६०॥ हरितैरथ यैः पिङ्गैरिश्वरैर्ब्रह्मवादिभिः । त्र्यशीतिमण्डलं प्रातरह्नोऽर्धेन विभावसोः ॥६१॥ वहन्ति हरयश्चैव मण्डलं दिवसक्रमात्। कल्पादौ सम्प्रयुक्तास्ते वहन्त्याभूतसम्प्लवम् ॥६२॥ आवृतो बालखिल्यैस्तैर्भ्रमतो रात्र्यहानि तु। ग्रथितैः स्वर्वचोभिश्च स्तूयमानो महर्षिभिः ॥६३॥
अश्वरूप छन्द के द्वारा वहाँ स्थित चक्र परिचालित होता है। वह कामरूप है। मन की अपेक्षा से गमनशील है। वह रथ से युक्त होकर वहन करता है। वे हरित तथा पिंगल वर्ण हैं। ब्रह्मवादी ईश्वर गण के साथ दिन के अर्धभाग में सूर्य के तिरासी मण्डल दिवसक्रम से अश्वगण वहन करते हैं। दिन-रात में भ्रमण करते-करते बालखिल्य द्वारा आवृत होकर (सूर्य) महर्षिगण द्वारा ग्रथित स्वर्गीय वचन द्वारा स्तुत हैं॥६०-६३॥
सेव्यते गीतनृत्यैश्च गन्धर्वैरप्सरोगणैः। पतङ्गपतगैरैश्चैर्भ्रममाणैर्दिवस्पतिः । वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्रानुगतः शशी ॥६४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे आदित्यरथवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः
गन्धर्व तथा अप्सरागण द्वारा गीत एवं नृत्य तथा भ्राम्यमाण पतङ्ग, पक्षी और अश्वसमूह द्वारा दिवस्पति (सूर्य) सेवित होते हैं। नक्षत्रगण से अनुगत होकर निर्दिष्ट पथ से चन्द्रमा विचरण करते हैं॥६४॥
श्रीसाम्बपुराण में सूर्य के रथवर्णन नामक इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त
द्वाविंशोऽध्यायः
(सोमवृद्धिक्षयः)
साम्ब उवाच
सूर्यलोके त्वया दृष्टः सूर्यसोमसमागमः।
स कथं क्षीयते सोमः क्षीणश्चाप्यायते कथम् ॥१॥
यथा सोमं पिबन्तिस्म कृष्णपक्षेऽमृताशिनः।
देवताः पितरश्चैव तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ॥२॥
साम्ब कहते हैं—आपने सूर्यलोक में सूर्य तथा चन्द्र का समागम देखा है। चन्द्र का क्यों क्षय होता है और क्षय के उपरान्त वे कैसे वृद्धि प्राप्त होते हैं?
हे सुव्रत! कृष्णपक्ष में अमृत-भक्षणकारी देवगण तथा पितृगण जैसे सोमपान करते हैं, वह मुझसे बताईये ॥१-२॥
नारद उवाच
राका चानुगती चैव पौर्णमासी द्विधा स्मृता।
सिनीवाली कुहूश्चैव अमावास्या द्विधैव तु ॥३॥
नारद कहते हैं—पूर्णिमा राका तथा अनुगतिभेद से दो प्रकार की कही गयी है। अमावास्या भी सिनीवाली तथा कुहू—दो तरह की होती है ॥३॥
अमा नाम रवे रश्मिश्चन्द्रलोके प्रतिष्ठितः।
तस्यां सोमो वसेद् यस्मादमावस्या ततः स्मृता ॥४॥
पूर्वोदिते कलाहीने पौर्णमास्यां निशाकरे।
पूर्णिमानुमतीर्ज्ञेया पश्चाद् गच्छति भास्करः ॥५॥
सूर्य की अमा नामक रश्मि चन्द्रलोक में वास करती है, उसे ही अमावस्या कहा जाता है। पूर्णिमा तिथि में चन्द्र कलाहीन होकर पूर्व में उदित होते हैं। उस पूर्णिमा तिथि को अनुमति जानना चाहिये। तब सूर्य पीछे जाते हैं ॥४-५॥
यस्मात्तामनुमन्यन्ते पितरो दैवतैः सह।
तस्मादनुमतिर्नाम पूर्णिमा प्रथमा स्मृता ॥६॥
यदा ह्यास्तमियात् सूर्यः पूर्णचन्द्रस्य चोदयः।
युगपत् सा तु वै राका तदा भवति पूर्णिमा ॥७॥
द्वाविंशोऽध्यायः ११३
चूँकि पितृगण देवताओं के साथ अनुगमन करते हैं, इसलिये अनुमति नामक पूर्णिमा को पहले कहा गया है। जब सूर्य अस्तगामी होते हैं एवं युगपत् पूर्ण चन्द्र का उदय होता है, तब उस पूर्णिमा तिथि को राका कहते हैं॥६-७॥
राका तामनुमन्यन्ते देवताः पितृभिः सह।
रक्षणाच्चैव सूर्यस्य राकेति कवयोऽब्रुवन् ॥८॥
सिनीवाली प्रमाणन्तु क्षीणशेषो निशाकरः।
अमावास्यां विशत्यर्कः सिनीवाली ततः स्मृता ॥९॥
देवगण पितृगण के साथ राका के शेष भाग का अनुमान करके सूर्य का रक्षण करने के कारण विद्वान् लोग इसे राका कहते हैं। सिनीवाली चन्द्र के क्षीणशेष का प्रमाण करके अमावस्या में सूर्य प्रवेश करते हैं, अतः उसे सिनीवाली कहा गया है॥८-९॥
कुहेति कोकिलस्योक्तिर्यावत् कालं समाप्यते।
तत्कालतुल्या चैषा वै ह्यमावास्या कुहूः स्मृता ॥१०॥
कोकिल के मुख से निर्गत वाणी जितने समय में समाप्त होती है, उस कालतुल्य अमावस्या को कुहू कहे हैं॥१०॥
अनुमत्यां सराकायां सिनीवाल्यां कुहूं विना।
एतासां पुरतः कालः कुहूमात्रं कुहूः स्मृता ॥११॥
राका के अनुमति के अंश तथा कुहू के अतिरिक्त सिनीवाली के अंश के पूर्वकाल को कुहू कहते हैं॥११॥
कलाः षोडश सोमस्य शुक्ले वर्धयते रविः।
अमृतानामतः कृष्णे पीयन्ते दैवतैः क्रमात् ॥१२॥
रवि शुक्ल पक्ष में चन्द्र के सोलह भाग को बढ़ाता है। उस अमृत को कृष्णपक्ष के देवता क्रमशः पान करते हैं॥१२॥
प्रथमां पिबते वह्निर्द्वितीयां तु रविः कलाम्।
विश्वेदेवास्तृतीयां तु चतुर्थीं तु प्रजापतिः ॥१३॥
प्रथम कला का अग्नि पान करते हैं, सूर्य द्वितीय कला का पान करता है, विश्वेदेवगण तृतीय कला का तथा प्रजापति चतुर्थ कला का पान करते हैं॥१३॥
पञ्चमीं वरुणश्चापि षष्ठीं पिबति वासवः।
सप्तमीमृषयो दिव्या वसवोऽष्टौ तथाष्टमीम् ॥१४॥
वरुण पञ्चम कला का, वासव षष्ठ कला का, दिव्य ऋषिगण सप्तम कला का एवं अष्टवसुगण अष्टम कला का पान करते हैं॥१४॥
साम्ब०—८
नवमीं कृष्णपक्षस्य पिबतीन्दोः कलां यमः।
११४ श्रीसाम्बपुराणम्
नवमीं कृष्णपक्षस्य पिबतीन्दोः कलां यमः।
दशमीं मरुतश्चापि रुद्रा एकादशीं कलाम्॥१५॥
द्वादशीं तु कलां विष्णुर्धनदश्च त्रयोदशीम्।
चतुर्दशीं पशुपतिः कलां पिबति नित्यशः॥१६॥
कृष्णपक्ष की नवम कला का यम पान करते हैं। मरुद्गण दशम कला का, रुद्रगण एकादश कला का, विष्णु द्वादश कला का, कुबेर त्रयोदश कला का तथा पशुपति नित्य ही चतुर्दश कला का पान करते हैं॥१५-१६॥
ततः पञ्चदशीं चापि पिबन्ति पितरः कलाम्।
कलावशिष्टो निष्पीतः प्रविष्टः सूर्यमण्डलम्।
अमायां विशते तस्मादमावास्या ततः स्मृता॥१७॥
तदनन्तर पञ्चदश कला का पितृगण पान करते हैं। बची हुई कला सूर्य में प्रविष्ट हो जाती है। अमा में प्रवेश करने के कारण ही इसे अमावास्या कहा जाता है॥१७॥
विशेष—अमा—चन्द्र मण्डल में १६ कला है। अमा तो महाकला है। माला का सूत्र जैसे सब दानों में अनुप्रविष्ट है, उसी प्रकार यह कला भी अन्य कलाओं में अनुप्रविष्ट रहती है। यह नित्य है, वृद्धि-क्षयरहित है। यह सभी कलाओं का आश्रय है।
पूर्वाह्ने प्रविशत्यर्कं मध्याह्ने च वनस्पतिम्।
अपराह्ने विशत्यप्सु स्वां योनिं वारिसम्भवः॥१८॥
पूर्वाह्न में चन्द्र सूर्य में प्रवेश करता है। मध्याह्न में वनस्पति में, अपराह्न में जलोद्भूत सोम (चन्द्र) स्वयोनि (अपने उत्पत्तिस्थान—जल) में प्रवेश करता है॥१८॥
वनस्पतिगते सोमे यश्छिनत्ति वनस्पतिम्।
पातयेदपि वा पर्णं युज्यते ब्रह्महत्यया॥१९॥
सोम मध्याह्न में वनस्पति में गमन करते हैं। जो व्यक्ति इस समय वनस्पति का छेदन करते हैं या उसके पत्तों को गिराते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या का पाक लगता है॥१९॥
अपः प्रविश्य सोमस्तु शेषया कलयैकया।
तृणगुल्मलतावृक्षान्प्रीणयति चौषधीम्॥२०॥
सोम शेष एक कला द्वारा जल में प्रविष्ट होकर तृण, गुल्म, लता, वृक्ष तथा औषधि का वर्द्धन करते हैं॥२०॥
तमोषधिगतं गावश्चरन्त्यापः पिबन्ति वै।
तदङ्गानुगतं गोभ्यो क्षीरत्वमुपगच्छति॥२१॥
द्वाविंशोऽध्यायः ११५
गाय जब औषधिस्थित जल का पान करती है, तब उसके अंग-प्रत्यङ्ग में क्षीरत्व प्राप्त होता है॥२१॥
तत्क्षीरममृतं भूत्वा मन्त्रपूतं द्विजातिभिः । स्वाहाकारवषट्कारैर्हुताश्चाहुतयः क्रमात् ॥२२॥ हुतमग्निषु देवार्थे पुनः सोमं विवर्धयेत् । एवं संक्षीयते सोमः क्षीणश्चाप्यायते पुनः ॥२३॥
ब्राह्मणों द्वारा मन्त्रपूत उस अमृतमय क्षीर से स्वाहा तथा वषट् मन्त्रों से क्रमशः अग्नि में आहुति दी जाती है। देवता के उद्देश्य से अग्नि में आहूत होकर वह सोम का वर्धन करती है। इस प्रकार सोम क्षीणता को प्राप्त करके पुनः वर्द्धित होता है॥२२-२३॥
तस्मात् सूर्यः शशाङ्कस्य वृद्धिकर्त्ता स्वरश्मिभिः । एवं सम्पूज्यते देवैः परमात्मा महाद्युतिः ॥२४॥ गत्वा मित्रवनं साम्ब त्वमाराधय भास्करम् । नहि पापकृतः साम्ब भक्तिर्भवति भास्करे । तस्मात्त्वं परया भक्त्या प्रपद्यस्व दिवाकरम् ॥२५॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सोमवृद्धिक्षयो नाम द्वाविंशोऽध्यायः
अतएव सूर्य अपनी रश्मियों द्वारा चन्द्र के वृद्धिकर्त्ता हैं। इसलिये देवगण महाकान्ति-युक्त सूर्य की पूजा करते हैं। हे साम्ब! तुम मित्रवन में जाकर सूर्य्याराधना करो। पापीगण कभी भी सूर्य की भक्ति नहीं कर सकते। अतएव हे साम्ब! तुम परम भक्ति के साथ सूर्य की शरण लो॥२४-२५॥
श्रीसाम्बपुराण का चन्द्र की वृद्धि तथा क्षयनामक द्वाविंश अध्याय समाप्त
त्रयोविंशोऽध्यायः
(राहुग्रहणविचारः)
साम्ब उवाच
सूर्यलोके त्वया विप्र गतेन ऋषिसत्तम।
आश्चर्याणि विचित्राणि दृष्टानि सुबहूनि वै॥१॥
जन्मविस्मयकर्तॄणि दुर्विज्ञेयानि मानुषैः।
तदिदं मम सन्देहं चिरकालस्थितं हृदि॥२॥
यदि श्राव्यमिदं वापि मन्यसे कथयस्व मे।
सूर्यस्य ग्रहणं दृष्ट्वा ममासीद्व्याकुलं मनः॥३॥
राहुश्च तमसो राशिस्तेजोराशिर्दिवाकरः।
स कथं ग्रस्यते तेन भानुः स्वर्भानुना मुने॥४॥
यस्य तेजोभिरखिलैः प्रकाशं क्रियते जगत्।
तदत्र परमार्थोऽयं तं समाख्यातुमर्हसि॥५॥
साम्ब कहते हैं—हे ऋषिश्रेष्ठ ब्राह्मण (नारद)! सूर्यलोक में आपने अनेक विचित्र आश्चर्य देखा है। मनुष्य के लिये जन्म की विस्मयता अत्यन्त दुर्विज्ञेय है। मेरे मन में दीर्घकाल से एक सन्देह है। उसे यदि आप सुनने योग्य मानें तब कहिये। सूर्य-ग्रहण देखकर मेरा मन अत्यन्त व्याकुल है। हे महामुने! राहु एक तमोराशि मात्र है; जबकि दिवाकर तेजोराशि हैं। हे महामुने! जिस सूर्य के तेज से निखिल जगत् प्रकाशित होता है, वह सूर्य कैसे राहु से ग्रस्त हो जाते हैं? अतएव इस विषय का यथार्थ तत्त्व मुझसे कहिये॥१-५॥
नारद उवाच
अविज्ञेयमनालक्ष्यं ज्ञानगम्यं महात्मनाम्।
रवेर्ग्रहणसंयोगे कथ्यमानं निबोध मे॥६॥
नारद कहते हैं—जो अविज्ञेय तथा अदृश्य है, केवल महात्मागण द्वारा ज्ञानगम्य है, उस सूर्य के ग्रहण-संयोग के सम्बन्ध में मुझसे सुनो॥६॥
राहुणा ग्रस्यते नार्को व्येतु ते हृदयव्यथा।
कस्य शक्तिर्गृहीतुं वै तेजोराशिं दिवाकरम्॥७॥
त्रयोविंशोऽध्यायः ११७
राहु कभी भी सूर्य का ग्रास नहीं करता। अपने हृदय की व्यथा दूर करो। तेजोराशि दिवाकर को ग्रास करने की शक्ति किसमें है?।।७।।
सर्वस्थोऽयमसंग्राह्यो ह्यबुधस्य जनस्य तु। इदं त्वद्दर्शनं साम्ब शृणु यत्ते वदाम्यहम्॥८॥
यह सूर्य सर्वत्र स्थित तथा अग्राह्य है। अज्ञजन के लिये तो अदृश्य-सा है। हे साम्ब! जो तुमसे कहता हूँ, सुनो।।८।।
यज्ज्ञात्वा तु महाज्ञानं न करिष्यति संशयम्। यदि सत्यमयं ग्रस्तस्तेजोराशिर्दिवाकरः॥९॥ तत् कथं नोदरस्थेन राहुर्भस्मीकृतः क्षणात्। तथापि राहुणाक्रम्य भानुर्वक्त्रप्रवेशितः॥१०॥ तत्कथं दर्शनैस्तीक्ष्णैः शतधा न विखण्डितः। निर्मुक्तश्च पुनर्द्दृष्टस्तथैवाखण्डमण्डलः॥११॥
इस ज्ञान को प्राप्त करके तुम कोई संशय न करो। यदि यह तेजोराशि दिवाकर वास्तव में ग्रस्त होता, तब उदरस्थित सूर्य द्वारा राहु तत्क्षण भस्म क्यों नहीं हो जाता। तथापि यदि राहु सूर्य पर आक्रमण करता है तब मुख में रखकर उनका दाँतों से खण्ड-खण्ड क्यों नहीं कर देता; अपितु राहु द्वारा (ग्रहण से) निर्मुक्त होकर सूर्य पुनः परिपूर्ण रूप ही लक्षित होता है।।९-११।।
न वास्यापहृतं तेजो न स्थानादवरोपितः। यदि चाप्येष निष्पीतः कथं दीप्ततरो भवेत्॥१२॥
इसके अतिरिक्त सूर्य का कोई तेज भी अपहृत नहीं होता। वह स्थान से विच्युत भी नहीं होता। यदि राहू ने सूर्य का निःशेष पान किया होता, तब सूर्य कैसे अधिक प्रकाशमान हो पाता।।१२।।
तस्मान्न तेजसोराशि राहोर्वक्त्रं गमिष्यति। भक्षार्थं सर्वभूतानां सोमः सृष्टः स्वयम्भुवा॥१३॥ तत्रस्थममृतं चापि सम्भृतं सूर्यतेजसा। पिबन्त्यम्बुमयं देवाः पितरश्च स्वधामयम्॥१४॥
अतएव तेजोराशि सूर्य कभी भी राहु के मुख में नहीं जाते। स्वयम्भू ब्रह्मा ने सभी प्राणियों के भक्षणार्थ सोम की सृष्टि की है। चन्द्र (सोम) स्थित अमृत भी सूर्यतेज से वर्द्धित होता है। देवगण उसी का जलमय (अमृत रूप में) तथा पितृगण स्वधामय पान करते हैं।।१३-१४।।
११८ श्रीसाम्बपुराणम्
त्रयस्त्रिंशत्त्रयश्चैव त्रयस्त्रिंशत्तथैव च।
त्रयस्त्रिंशत् सहस्राश्च देवाः सोमं पिबन्ति ते ॥१५॥
तैंतीस हजार देवगण उस सोम का पान करते हैं।।१५।।
राहोर्यदामृताद्भागः पुरा सृष्टः स्वयम्भुवा।
तस्मात्तं राहुरभ्येत्य पातुमिच्छति पर्वसु ॥१६॥
ब्रह्मा ने पूर्व में राहु के लिये अमृत भाग की सृष्टि की थी; इसीलिये राहु पर्वकाल में उसे पीना चाहता है।।१६।।
उद्धृत्य पार्थिवीं छायामल्लाकारस्तमोमयः।
पातुमिच्छंस्ततश्चन्द्रमाच्छादयति छायया ॥१७॥
अमृत-पान की इच्छा करके अन्धकारमय वाष्पाकार राहु पार्थिव छाया उद्धृत करते हैं और उस छाया से चन्द्र को आच्छन्न कर लेते हैं।।१७।।
शुक्ले स चन्द्रमभ्येति कृष्णे पर्वणि भास्करम्।
सूर्यमण्डलसंस्थं तु चन्द्रमेव जिघांसति ॥१८॥
शुक्ल पक्ष में वह चन्द्र की ओर जाता है तथा कृष्ण पक्ष के पर्वकाल में (ग्रहण काल में) सूर्य की ओर जाता है। किन्तु राहु सूर्यमण्डल-स्थित चन्द्र का ही विनाश करना चाहता है।।१८।।
तस्मात् पिबति तं राहुस्तनुमस्य विनाशयन्।
अविहिंसन् यथा पद्मं पिबते भ्रमरो मधु ॥१९॥
चन्द्रस्य वामृतं तद्वद्भैदाद्राहुरश्नुते।
जैसे भ्रमर पद्म का विनाश न करके केवल उसका मधुपान करता है, उसी प्रकार राहु भी चन्द्र का विनाश नहीं करता; अपितु चन्द्रस्थ मधु का पान करता है।।१९।।
चन्द्रकान्तो मणिर्यद्वद्धीनं क्षरति तत्क्षणात् ॥२०॥
तुषारोऽपि न हीयेत तेजसा नैव मुच्यते।
यथा सूर्यमणिश्चापि सूर्यादुत्पाद्य पावकम् ॥२१॥
न भवत्यङ्गहीनो वै तेजसा नैव मुच्यते।
एवं चन्द्रश्च सूर्यश्च छादितावपि राहुणा ॥२२॥
तेजसा न विमुच्येते नाङ्गहीनौ बभूवतुः।
पर्वण्यस्य तु चन्द्रस्य माणिक्यफलसात्कृतिः ॥२३॥
चन्द्रकान्तमणि चन्द्र के तेज को प्राप्त कर लेता है, परन्तु इससे चन्द्र का कोई क्षय नहीं होता, तुषार भी समाप्त नहीं होता तथा चन्द्र अपने तेज से च्युत नहीं होता। जैसे
त्रयोविंशोऽध्यायः ११९
सूर्यकान्त मणि सूर्य से अग्नि उत्पन्न कर लेती है, परन्तु सूर्य अंगहीन नहीं होते, तेज से विच्युत नहीं होते। ऐसे ही सूर्य तथा चन्द्र राहु द्वारा आच्छन्न होने पर भी तेज से च्युत तथा अंगहीन नहीं होते। परन्तु प्रति पर्व में चन्द्र को माणिक्य फल की प्राप्ति होती है॥२०-२३॥
सोमो दैवत्संयोगाच्छायायोगाच्च पार्थिवात्।
राहोश्च वरदानाद्वै प्रस्त्रवत्यमृतं शशी॥२४॥
स्वदोहकाले सम्प्राप्ते वत्सं दृष्ट्वा यथा च गौः।
स्वाङ्गादिव क्षरेत् क्षीरं तथेन्दुः क्षरतेऽमृतम्॥२५॥
दैववशात् पृथ्वी की छाया के योग से एवं राहु को मिले वरदान के कारण चन्द्र अमृत का क्षरण करता है। दोहनकाल में गाय जैसे अपने बछड़े को देखकर अपने अंग से दुग्ध उत्पन्न करती है, वैसे ही चन्द्र भी अमृत क्षरण करता है। सूर्य देवताओं के लिये पिता तथा चन्द्र माता के समान परिगणित होते हैं॥२४-२५॥
मातृस्तनं यथा पीत्वा तृप्यन्ते सर्वजन्तवः।
पीत्वामृतं तथा सोमो तृप्यन्ते पितृदेवताः॥२६॥
जैसे माँ के स्तनपान से सभी प्राणी तृप्त हो जाते हैं, वैसे ही पितृदेवगण चन्द्र का अमृत पीकर तृप्त हो जाते हैं॥२६॥
सम्भृतं पर्वयोगेषु तथायं क्षरते शशी।
तं क्षरन्तं यथाभागमुपयुञ्जन्ति देवताः॥२७॥
चन्द्र पर्वों पर अमृत का क्षरण करते हैं और उसका देवगण अपने भाग के अनुसार भोग करते हैं॥२७॥
तस्मिन् काले समभ्येत्य राहुरप्यपकर्षति।
सर्वमर्द्धं त्रिभागं वा पादं पादार्धमेव वा॥२८॥
आक्रम्य पार्थिवीं छायां यावतीं चन्द्रमण्डलम्।
स्मृतः स भागो राहोस्तु देवभागश्च शेषकः॥२९॥
उस समय राहु आकर (अमृत का) आकर्षण करता है। पूर्ण, आधा, तीन भाग, पाद अथवा पादार्ध पृथ्वी की छाया के अनुसार जितने चन्द्रमण्डल पर आक्रमण करता है, वह भाग राहु का तथा शेष देवगण का हो जाता है॥२८-२९॥
तृप्तिं विधाय देवानां राहोः पर्वगतस्य च।
चन्द्रो न क्षीणतां याति तेजसा नैव मुच्यते॥३०॥
देवताओं की तथा पर्वगत राहु की तृप्ति का विधान करके चन्द्रमा क्षीण नहीं होता, किंवा तेज से विच्युत भी नहीं होता॥३०॥
१२० श्रीसाम्बपुराणम्
तिथिभागस्तु यावन्तं पुनरर्कप्रमाणतः। एवं छायास्थिते काले भगवानेष कीर्त्तितः ॥३१॥
सूर्य प्रमाण में जितनी तिथि का भाग है, उतनी पृथ्वी की छाया द्वारा आच्छन्नता के समय भगवान् सूर्य को राहुग्रस्त कहा जाता है॥३१॥
अधो राहुः परः सोमः सोमादूर्ध्वं दिवाकरः। पर्वकाले स्थितिस्त्वेवं विपरीता गतौ पुनः ॥३२॥ अतश्छादयते राहुरभ्रवच्छशिभास्करौ। राहुरभ्रकसंस्थानं सोममाच्छाद्य तिष्ठति ॥३३॥ उद्धृत्य पार्थिवीं छायां धूमान्मेघ इवोत्थितः।
नीचे राहु, उसके ऊपर चन्द्र, चन्द्र के ऊपर सूर्य—पर्वकाल में इनकी यह स्थिति होती है और विपरीत गति होती है। अतएव जैसे मेघ चन्द्र-सूर्य को आच्छन्न करता है, वैसे ही राहु भी उसे ढक लेता है। राहु मेघमण्डल-पर्यन्त चन्द्र को आच्छन्न करके स्थित रहता है॥३२-३३॥
तेऽभ्रावखण्डितं तस्य केवलं श्यामलीकृतम्। कर्दमेन यथा वस्त्रं शुक्लत्वमपहन्यते ॥३४॥
मेघमण्डल के समान राहु केवल सूर्य को कलङ्कित (काले रंग की छाया से युक्त) करता है। जैसे कीचड़ से वस्त्र की शुक्लता अपगत हो जाती है, वैसे ही एक हिस्से को अथवा पूर्ण चन्द्रमण्डल को राहु आच्छन्न करता है। जैसे पुनः धो देने पर वस्त्र शुभ्र हो जाता है, वैसे ही राहुमुक्त चन्द्रमण्डल भी निर्मल हो जाता है॥३४॥
राहुणाच्छादितावापि दृष्ट्वा चन्द्रदिवाकरौ। विप्राः शान्तिपरा भूत्वा पुनराप्याययन्ति वै ॥३५॥
अथवा चन्द्र-सूर्य को राहु द्वारा आच्छादित देखकर ब्राह्मणगण उसकी शान्ति करने लगते हैं और पुनः उन्हें मुक्त देखकर आनन्दित होते हैं॥३५॥
एवञ्च गृह्यते सूर्य्यश्चन्द्रमास्तत्र गृह्यते ॥३६॥ अबुधास्तत्र पश्यन्ति मनुष्या मांसचक्षुषः। जगत् सम्मोहनं चैव ग्रहणं चन्द्रसूर्ययोः ॥३७॥
इस प्रकार राहु चन्द्र तथा सूर्य को जब ग्रहण करता है तब चर्मचक्षु वाले अबोध मानव उसे चन्द्र-सूर्य का ग्रहण मानते हैं तथा समस्त जगत् उस ग्रहण से सम्मोहित हो जाता है॥३६-३७॥
त्रयोविंशोऽध्यायः १२१
पुण्यं महापवित्रं तु स्नाने दाने तथा जपे।
विदित्वा चास्य माहात्म्यं सर्वदेवसमागमम्।
ध्यात्वा श्रुत्वा पठित्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३८॥
इति श्रीसाम्बपुराणे राहुग्रहणविचारो नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः
स्नान, दान तथा जपविशेष के लिये ग्रहणकाल अत्यन्त महापुण्यमय तथा पवित्र समय होता है। सभी देवता इस समय एकत्र होते हैं और इसका माहात्म्य जानकर ध्यान करते हैं, श्रवण करते हैं तथा पाठ करते हैं और समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।।३८।।
श्रीसाम्बपुराण में राहुग्रहणविचार नामक त्रयोविंश अध्याय समाप्त