भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 123

द्वाविंशोऽध्यायः ११३

चूँकि पितृगण देवताओं के साथ अनुगमन करते हैं, इसलिये अनुमति नामक पूर्णिमा को पहले कहा गया है। जब सूर्य अस्तगामी होते हैं एवं युगपत् पूर्ण चन्द्र का उदय होता है, तब उस पूर्णिमा तिथि को राका कहते हैं॥६-७॥

राका तामनुमन्यन्ते देवताः पितृभिः सह।
रक्षणाच्चैव सूर्यस्य राकेति कवयोऽब्रुवन् ॥८॥
सिनीवाली प्रमाणन्तु क्षीणशेषो निशाकरः।
अमावास्यां विशत्यर्कः सिनीवाली ततः स्मृता ॥९॥

देवगण पितृगण के साथ राका के शेष भाग का अनुमान करके सूर्य का रक्षण करने के कारण विद्वान् लोग इसे राका कहते हैं। सिनीवाली चन्द्र के क्षीणशेष का प्रमाण करके अमावस्या में सूर्य प्रवेश करते हैं, अतः उसे सिनीवाली कहा गया है॥८-९॥

कुहेति कोकिलस्योक्तिर्यावत् कालं समाप्यते।
तत्कालतुल्या चैषा वै ह्यमावास्या कुहूः स्मृता ॥१०॥

कोकिल के मुख से निर्गत वाणी जितने समय में समाप्त होती है, उस कालतुल्य अमावस्या को कुहू कहे हैं॥१०॥

अनुमत्यां सराकायां सिनीवाल्यां कुहूं विना।
एतासां पुरतः कालः कुहूमात्रं कुहूः स्मृता ॥११॥

राका के अनुमति के अंश तथा कुहू के अतिरिक्त सिनीवाली के अंश के पूर्वकाल को कुहू कहते हैं॥११॥

कलाः षोडश सोमस्य शुक्ले वर्धयते रविः।
अमृतानामतः कृष्णे पीयन्ते दैवतैः क्रमात् ॥१२॥

रवि शुक्ल पक्ष में चन्द्र के सोलह भाग को बढ़ाता है। उस अमृत को कृष्णपक्ष के देवता क्रमशः पान करते हैं॥१२॥

प्रथमां पिबते वह्निर्द्वितीयां तु रविः कलाम्।
विश्वेदेवास्तृतीयां तु चतुर्थीं तु प्रजापतिः ॥१३॥

प्रथम कला का अग्नि पान करते हैं, सूर्य द्वितीय कला का पान करता है, विश्वेदेवगण तृतीय कला का तथा प्रजापति चतुर्थ कला का पान करते हैं॥१३॥

पञ्चमीं वरुणश्चापि षष्ठीं पिबति वासवः।
सप्तमीमृषयो दिव्या वसवोऽष्टौ तथाष्टमीम् ॥१४॥

वरुण पञ्चम कला का, वासव षष्ठ कला का, दिव्य ऋषिगण सप्तम कला का एवं अष्टवसुगण अष्टम कला का पान करते हैं॥१४॥

साम्ब०—८