साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११४ श्रीसाम्बपुराणम्
नवमीं कृष्णपक्षस्य पिबतीन्दोः कलां यमः।
दशमीं मरुतश्चापि रुद्रा एकादशीं कलाम्॥१५॥
द्वादशीं तु कलां विष्णुर्धनदश्च त्रयोदशीम्।
चतुर्दशीं पशुपतिः कलां पिबति नित्यशः॥१६॥
कृष्णपक्ष की नवम कला का यम पान करते हैं। मरुद्गण दशम कला का, रुद्रगण एकादश कला का, विष्णु द्वादश कला का, कुबेर त्रयोदश कला का तथा पशुपति नित्य ही चतुर्दश कला का पान करते हैं॥१५-१६॥
ततः पञ्चदशीं चापि पिबन्ति पितरः कलाम्।
कलावशिष्टो निष्पीतः प्रविष्टः सूर्यमण्डलम्।
अमायां विशते तस्मादमावास्या ततः स्मृता॥१७॥
तदनन्तर पञ्चदश कला का पितृगण पान करते हैं। बची हुई कला सूर्य में प्रविष्ट हो जाती है। अमा में प्रवेश करने के कारण ही इसे अमावास्या कहा जाता है॥१७॥
विशेष—अमा—चन्द्र मण्डल में १६ कला है। अमा तो महाकला है। माला का सूत्र जैसे सब दानों में अनुप्रविष्ट है, उसी प्रकार यह कला भी अन्य कलाओं में अनुप्रविष्ट रहती है। यह नित्य है, वृद्धि-क्षयरहित है। यह सभी कलाओं का आश्रय है।
पूर्वाह्ने प्रविशत्यर्कं मध्याह्ने च वनस्पतिम्।
अपराह्ने विशत्यप्सु स्वां योनिं वारिसम्भवः॥१८॥
पूर्वाह्न में चन्द्र सूर्य में प्रवेश करता है। मध्याह्न में वनस्पति में, अपराह्न में जलोद्भूत सोम (चन्द्र) स्वयोनि (अपने उत्पत्तिस्थान—जल) में प्रवेश करता है॥१८॥
वनस्पतिगते सोमे यश्छिनत्ति वनस्पतिम्।
पातयेदपि वा पर्णं युज्यते ब्रह्महत्यया॥१९॥
सोम मध्याह्न में वनस्पति में गमन करते हैं। जो व्यक्ति इस समय वनस्पति का छेदन करते हैं या उसके पत्तों को गिराते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या का पाक लगता है॥१९॥
अपः प्रविश्य सोमस्तु शेषया कलयैकया।
तृणगुल्मलतावृक्षान्प्रीणयति चौषधीम्॥२०॥
सोम शेष एक कला द्वारा जल में प्रविष्ट होकर तृण, गुल्म, लता, वृक्ष तथा औषधि का वर्द्धन करते हैं॥२०॥
तमोषधिगतं गावश्चरन्त्यापः पिबन्ति वै।
तदङ्गानुगतं गोभ्यो क्षीरत्वमुपगच्छति॥२१॥