भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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द्वाविंशोऽध्यायः ११५

गाय जब औषधिस्थित जल का पान करती है, तब उसके अंग-प्रत्यङ्ग में क्षीरत्व प्राप्त होता है॥२१॥

तत्क्षीरममृतं भूत्वा मन्त्रपूतं द्विजातिभिः । स्वाहाकारवषट्कारैर्हुताश्चाहुतयः क्रमात् ॥२२॥ हुतमग्निषु देवार्थे पुनः सोमं विवर्धयेत् । एवं संक्षीयते सोमः क्षीणश्चाप्यायते पुनः ॥२३॥

ब्राह्मणों द्वारा मन्त्रपूत उस अमृतमय क्षीर से स्वाहा तथा वषट् मन्त्रों से क्रमशः अग्नि में आहुति दी जाती है। देवता के उद्देश्य से अग्नि में आहूत होकर वह सोम का वर्धन करती है। इस प्रकार सोम क्षीणता को प्राप्त करके पुनः वर्द्धित होता है॥२२-२३॥

तस्मात् सूर्यः शशाङ्कस्य वृद्धिकर्त्ता स्वरश्मिभिः । एवं सम्पूज्यते देवैः परमात्मा महाद्युतिः ॥२४॥ गत्वा मित्रवनं साम्ब त्वमाराधय भास्करम् । नहि पापकृतः साम्ब भक्तिर्भवति भास्करे । तस्मात्त्वं परया भक्त्या प्रपद्यस्व दिवाकरम् ॥२५॥

इति श्रीसाम्बपुराणे सोमवृद्धिक्षयो नाम द्वाविंशोऽध्यायः

अतएव सूर्य अपनी रश्मियों द्वारा चन्द्र के वृद्धिकर्त्ता हैं। इसलिये देवगण महाकान्ति-युक्त सूर्य की पूजा करते हैं। हे साम्ब! तुम मित्रवन में जाकर सूर्य्याराधना करो। पापीगण कभी भी सूर्य की भक्ति नहीं कर सकते। अतएव हे साम्ब! तुम परम भक्ति के साथ सूर्य की शरण लो॥२४-२५॥

श्रीसाम्बपुराण का चन्द्र की वृद्धि तथा क्षयनामक द्वाविंश अध्याय समाप्त

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