साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः
(राहुग्रहणविचारः)
साम्ब उवाच
सूर्यलोके त्वया विप्र गतेन ऋषिसत्तम।
आश्चर्याणि विचित्राणि दृष्टानि सुबहूनि वै॥१॥
जन्मविस्मयकर्तॄणि दुर्विज्ञेयानि मानुषैः।
तदिदं मम सन्देहं चिरकालस्थितं हृदि॥२॥
यदि श्राव्यमिदं वापि मन्यसे कथयस्व मे।
सूर्यस्य ग्रहणं दृष्ट्वा ममासीद्व्याकुलं मनः॥३॥
राहुश्च तमसो राशिस्तेजोराशिर्दिवाकरः।
स कथं ग्रस्यते तेन भानुः स्वर्भानुना मुने॥४॥
यस्य तेजोभिरखिलैः प्रकाशं क्रियते जगत्।
तदत्र परमार्थोऽयं तं समाख्यातुमर्हसि॥५॥
साम्ब कहते हैं—हे ऋषिश्रेष्ठ ब्राह्मण (नारद)! सूर्यलोक में आपने अनेक विचित्र आश्चर्य देखा है। मनुष्य के लिये जन्म की विस्मयता अत्यन्त दुर्विज्ञेय है। मेरे मन में दीर्घकाल से एक सन्देह है। उसे यदि आप सुनने योग्य मानें तब कहिये। सूर्य-ग्रहण देखकर मेरा मन अत्यन्त व्याकुल है। हे महामुने! राहु एक तमोराशि मात्र है; जबकि दिवाकर तेजोराशि हैं। हे महामुने! जिस सूर्य के तेज से निखिल जगत् प्रकाशित होता है, वह सूर्य कैसे राहु से ग्रस्त हो जाते हैं? अतएव इस विषय का यथार्थ तत्त्व मुझसे कहिये॥१-५॥
नारद उवाच
अविज्ञेयमनालक्ष्यं ज्ञानगम्यं महात्मनाम्।
रवेर्ग्रहणसंयोगे कथ्यमानं निबोध मे॥६॥
नारद कहते हैं—जो अविज्ञेय तथा अदृश्य है, केवल महात्मागण द्वारा ज्ञानगम्य है, उस सूर्य के ग्रहण-संयोग के सम्बन्ध में मुझसे सुनो॥६॥
राहुणा ग्रस्यते नार्को व्येतु ते हृदयव्यथा।
कस्य शक्तिर्गृहीतुं वै तेजोराशिं दिवाकरम्॥७॥