साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः ११७
राहु कभी भी सूर्य का ग्रास नहीं करता। अपने हृदय की व्यथा दूर करो। तेजोराशि दिवाकर को ग्रास करने की शक्ति किसमें है?।।७।।
सर्वस्थोऽयमसंग्राह्यो ह्यबुधस्य जनस्य तु। इदं त्वद्दर्शनं साम्ब शृणु यत्ते वदाम्यहम्॥८॥
यह सूर्य सर्वत्र स्थित तथा अग्राह्य है। अज्ञजन के लिये तो अदृश्य-सा है। हे साम्ब! जो तुमसे कहता हूँ, सुनो।।८।।
यज्ज्ञात्वा तु महाज्ञानं न करिष्यति संशयम्। यदि सत्यमयं ग्रस्तस्तेजोराशिर्दिवाकरः॥९॥ तत् कथं नोदरस्थेन राहुर्भस्मीकृतः क्षणात्। तथापि राहुणाक्रम्य भानुर्वक्त्रप्रवेशितः॥१०॥ तत्कथं दर्शनैस्तीक्ष्णैः शतधा न विखण्डितः। निर्मुक्तश्च पुनर्द्दृष्टस्तथैवाखण्डमण्डलः॥११॥
इस ज्ञान को प्राप्त करके तुम कोई संशय न करो। यदि यह तेजोराशि दिवाकर वास्तव में ग्रस्त होता, तब उदरस्थित सूर्य द्वारा राहु तत्क्षण भस्म क्यों नहीं हो जाता। तथापि यदि राहु सूर्य पर आक्रमण करता है तब मुख में रखकर उनका दाँतों से खण्ड-खण्ड क्यों नहीं कर देता; अपितु राहु द्वारा (ग्रहण से) निर्मुक्त होकर सूर्य पुनः परिपूर्ण रूप ही लक्षित होता है।।९-११।।
न वास्यापहृतं तेजो न स्थानादवरोपितः। यदि चाप्येष निष्पीतः कथं दीप्ततरो भवेत्॥१२॥
इसके अतिरिक्त सूर्य का कोई तेज भी अपहृत नहीं होता। वह स्थान से विच्युत भी नहीं होता। यदि राहू ने सूर्य का निःशेष पान किया होता, तब सूर्य कैसे अधिक प्रकाशमान हो पाता।।१२।।
तस्मान्न तेजसोराशि राहोर्वक्त्रं गमिष्यति। भक्षार्थं सर्वभूतानां सोमः सृष्टः स्वयम्भुवा॥१३॥ तत्रस्थममृतं चापि सम्भृतं सूर्यतेजसा। पिबन्त्यम्बुमयं देवाः पितरश्च स्वधामयम्॥१४॥
अतएव तेजोराशि सूर्य कभी भी राहु के मुख में नहीं जाते। स्वयम्भू ब्रह्मा ने सभी प्राणियों के भक्षणार्थ सोम की सृष्टि की है। चन्द्र (सोम) स्थित अमृत भी सूर्यतेज से वर्द्धित होता है। देवगण उसी का जलमय (अमृत रूप में) तथा पितृगण स्वधामय पान करते हैं।।१३-१४।।