साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
त्रयोविंशोऽध्यायः ११७
राहु कभी भी सूर्य का ग्रास नहीं करता। अपने हृदय की व्यथा दूर करो। तेजोराशि दिवाकर को ग्रास करने की शक्ति किसमें है?।।७।।
सर्वस्थोऽयमसंग्राह्यो ह्यबुधस्य जनस्य तु। इदं त्वद्दर्शनं साम्ब शृणु यत्ते वदाम्यहम्॥८॥
यह सूर्य सर्वत्र स्थित तथा अग्राह्य है। अज्ञजन के लिये तो अदृश्य-सा है। हे साम्ब! जो तुमसे कहता हूँ, सुनो।।८।।
यज्ज्ञात्वा तु महाज्ञानं न करिष्यति संशयम्। यदि सत्यमयं ग्रस्तस्तेजोराशिर्दिवाकरः॥९॥ तत् कथं नोदरस्थेन राहुर्भस्मीकृतः क्षणात्। तथापि राहुणाक्रम्य भानुर्वक्त्रप्रवेशितः॥१०॥ तत्कथं दर्शनैस्तीक्ष्णैः शतधा न विखण्डितः। निर्मुक्तश्च पुनर्द्दृष्टस्तथैवाखण्डमण्डलः॥११॥
इस ज्ञान को प्राप्त करके तुम कोई संशय न करो। यदि यह तेजोराशि दिवाकर वास्तव में ग्रस्त होता, तब उदरस्थित सूर्य द्वारा राहु तत्क्षण भस्म क्यों नहीं हो जाता। तथापि यदि राहु सूर्य पर आक्रमण करता है तब मुख में रखकर उनका दाँतों से खण्ड-खण्ड क्यों नहीं कर देता; अपितु राहु द्वारा (ग्रहण से) निर्मुक्त होकर सूर्य पुनः परिपूर्ण रूप ही लक्षित होता है।।९-११।।
न वास्यापहृतं तेजो न स्थानादवरोपितः। यदि चाप्येष निष्पीतः कथं दीप्ततरो भवेत्॥१२॥
इसके अतिरिक्त सूर्य का कोई तेज भी अपहृत नहीं होता। वह स्थान से विच्युत भी नहीं होता। यदि राहू ने सूर्य का निःशेष पान किया होता, तब सूर्य कैसे अधिक प्रकाशमान हो पाता।।१२।।
तस्मान्न तेजसोराशि राहोर्वक्त्रं गमिष्यति। भक्षार्थं सर्वभूतानां सोमः सृष्टः स्वयम्भुवा॥१३॥ तत्रस्थममृतं चापि सम्भृतं सूर्यतेजसा। पिबन्त्यम्बुमयं देवाः पितरश्च स्वधामयम्॥१४॥
अतएव तेजोराशि सूर्य कभी भी राहु के मुख में नहीं जाते। स्वयम्भू ब्रह्मा ने सभी प्राणियों के भक्षणार्थ सोम की सृष्टि की है। चन्द्र (सोम) स्थित अमृत भी सूर्यतेज से वर्द्धित होता है। देवगण उसी का जलमय (अमृत रूप में) तथा पितृगण स्वधामय पान करते हैं।।१३-१४।।
११८ श्रीसाम्बपुराणम्
त्रयस्त्रिंशत्त्रयश्चैव त्रयस्त्रिंशत्तथैव च।
त्रयस्त्रिंशत् सहस्राश्च देवाः सोमं पिबन्ति ते ॥१५॥
तैंतीस हजार देवगण उस सोम का पान करते हैं।।१५।।
राहोर्यदामृताद्भागः पुरा सृष्टः स्वयम्भुवा।
तस्मात्तं राहुरभ्येत्य पातुमिच्छति पर्वसु ॥१६॥
ब्रह्मा ने पूर्व में राहु के लिये अमृत भाग की सृष्टि की थी; इसीलिये राहु पर्वकाल में उसे पीना चाहता है।।१६।।
उद्धृत्य पार्थिवीं छायामल्लाकारस्तमोमयः।
पातुमिच्छंस्ततश्चन्द्रमाच्छादयति छायया ॥१७॥
अमृत-पान की इच्छा करके अन्धकारमय वाष्पाकार राहु पार्थिव छाया उद्धृत करते हैं और उस छाया से चन्द्र को आच्छन्न कर लेते हैं।।१७।।
शुक्ले स चन्द्रमभ्येति कृष्णे पर्वणि भास्करम्।
सूर्यमण्डलसंस्थं तु चन्द्रमेव जिघांसति ॥१८॥
शुक्ल पक्ष में वह चन्द्र की ओर जाता है तथा कृष्ण पक्ष के पर्वकाल में (ग्रहण काल में) सूर्य की ओर जाता है। किन्तु राहु सूर्यमण्डल-स्थित चन्द्र का ही विनाश करना चाहता है।।१८।।
तस्मात् पिबति तं राहुस्तनुमस्य विनाशयन्।
अविहिंसन् यथा पद्मं पिबते भ्रमरो मधु ॥१९॥
चन्द्रस्य वामृतं तद्वद्भैदाद्राहुरश्नुते।
जैसे भ्रमर पद्म का विनाश न करके केवल उसका मधुपान करता है, उसी प्रकार राहु भी चन्द्र का विनाश नहीं करता; अपितु चन्द्रस्थ मधु का पान करता है।।१९।।
चन्द्रकान्तो मणिर्यद्वद्धीनं क्षरति तत्क्षणात् ॥२०॥
तुषारोऽपि न हीयेत तेजसा नैव मुच्यते।
यथा सूर्यमणिश्चापि सूर्यादुत्पाद्य पावकम् ॥२१॥
न भवत्यङ्गहीनो वै तेजसा नैव मुच्यते।
एवं चन्द्रश्च सूर्यश्च छादितावपि राहुणा ॥२२॥
तेजसा न विमुच्येते नाङ्गहीनौ बभूवतुः।
पर्वण्यस्य तु चन्द्रस्य माणिक्यफलसात्कृतिः ॥२३॥
चन्द्रकान्तमणि चन्द्र के तेज को प्राप्त कर लेता है, परन्तु इससे चन्द्र का कोई क्षय नहीं होता, तुषार भी समाप्त नहीं होता तथा चन्द्र अपने तेज से च्युत नहीं होता। जैसे
त्रयोविंशोऽध्यायः ११९
सूर्यकान्त मणि सूर्य से अग्नि उत्पन्न कर लेती है, परन्तु सूर्य अंगहीन नहीं होते, तेज से विच्युत नहीं होते। ऐसे ही सूर्य तथा चन्द्र राहु द्वारा आच्छन्न होने पर भी तेज से च्युत तथा अंगहीन नहीं होते। परन्तु प्रति पर्व में चन्द्र को माणिक्य फल की प्राप्ति होती है॥२०-२३॥
सोमो दैवत्संयोगाच्छायायोगाच्च पार्थिवात्।
राहोश्च वरदानाद्वै प्रस्त्रवत्यमृतं शशी॥२४॥
स्वदोहकाले सम्प्राप्ते वत्सं दृष्ट्वा यथा च गौः।
स्वाङ्गादिव क्षरेत् क्षीरं तथेन्दुः क्षरतेऽमृतम्॥२५॥
दैववशात् पृथ्वी की छाया के योग से एवं राहु को मिले वरदान के कारण चन्द्र अमृत का क्षरण करता है। दोहनकाल में गाय जैसे अपने बछड़े को देखकर अपने अंग से दुग्ध उत्पन्न करती है, वैसे ही चन्द्र भी अमृत क्षरण करता है। सूर्य देवताओं के लिये पिता तथा चन्द्र माता के समान परिगणित होते हैं॥२४-२५॥
मातृस्तनं यथा पीत्वा तृप्यन्ते सर्वजन्तवः।
पीत्वामृतं तथा सोमो तृप्यन्ते पितृदेवताः॥२६॥
जैसे माँ के स्तनपान से सभी प्राणी तृप्त हो जाते हैं, वैसे ही पितृदेवगण चन्द्र का अमृत पीकर तृप्त हो जाते हैं॥२६॥
सम्भृतं पर्वयोगेषु तथायं क्षरते शशी।
तं क्षरन्तं यथाभागमुपयुञ्जन्ति देवताः॥२७॥
चन्द्र पर्वों पर अमृत का क्षरण करते हैं और उसका देवगण अपने भाग के अनुसार भोग करते हैं॥२७॥
तस्मिन् काले समभ्येत्य राहुरप्यपकर्षति।
सर्वमर्द्धं त्रिभागं वा पादं पादार्धमेव वा॥२८॥
आक्रम्य पार्थिवीं छायां यावतीं चन्द्रमण्डलम्।
स्मृतः स भागो राहोस्तु देवभागश्च शेषकः॥२९॥
उस समय राहु आकर (अमृत का) आकर्षण करता है। पूर्ण, आधा, तीन भाग, पाद अथवा पादार्ध पृथ्वी की छाया के अनुसार जितने चन्द्रमण्डल पर आक्रमण करता है, वह भाग राहु का तथा शेष देवगण का हो जाता है॥२८-२९॥
तृप्तिं विधाय देवानां राहोः पर्वगतस्य च।
चन्द्रो न क्षीणतां याति तेजसा नैव मुच्यते॥३०॥
देवताओं की तथा पर्वगत राहु की तृप्ति का विधान करके चन्द्रमा क्षीण नहीं होता, किंवा तेज से विच्युत भी नहीं होता॥३०॥
१२० श्रीसाम्बपुराणम्
तिथिभागस्तु यावन्तं पुनरर्कप्रमाणतः। एवं छायास्थिते काले भगवानेष कीर्त्तितः ॥३१॥
सूर्य प्रमाण में जितनी तिथि का भाग है, उतनी पृथ्वी की छाया द्वारा आच्छन्नता के समय भगवान् सूर्य को राहुग्रस्त कहा जाता है॥३१॥
अधो राहुः परः सोमः सोमादूर्ध्वं दिवाकरः। पर्वकाले स्थितिस्त्वेवं विपरीता गतौ पुनः ॥३२॥ अतश्छादयते राहुरभ्रवच्छशिभास्करौ। राहुरभ्रकसंस्थानं सोममाच्छाद्य तिष्ठति ॥३३॥ उद्धृत्य पार्थिवीं छायां धूमान्मेघ इवोत्थितः।
नीचे राहु, उसके ऊपर चन्द्र, चन्द्र के ऊपर सूर्य—पर्वकाल में इनकी यह स्थिति होती है और विपरीत गति होती है। अतएव जैसे मेघ चन्द्र-सूर्य को आच्छन्न करता है, वैसे ही राहु भी उसे ढक लेता है। राहु मेघमण्डल-पर्यन्त चन्द्र को आच्छन्न करके स्थित रहता है॥३२-३३॥
तेऽभ्रावखण्डितं तस्य केवलं श्यामलीकृतम्। कर्दमेन यथा वस्त्रं शुक्लत्वमपहन्यते ॥३४॥
मेघमण्डल के समान राहु केवल सूर्य को कलङ्कित (काले रंग की छाया से युक्त) करता है। जैसे कीचड़ से वस्त्र की शुक्लता अपगत हो जाती है, वैसे ही एक हिस्से को अथवा पूर्ण चन्द्रमण्डल को राहु आच्छन्न करता है। जैसे पुनः धो देने पर वस्त्र शुभ्र हो जाता है, वैसे ही राहुमुक्त चन्द्रमण्डल भी निर्मल हो जाता है॥३४॥
राहुणाच्छादितावापि दृष्ट्वा चन्द्रदिवाकरौ। विप्राः शान्तिपरा भूत्वा पुनराप्याययन्ति वै ॥३५॥
अथवा चन्द्र-सूर्य को राहु द्वारा आच्छादित देखकर ब्राह्मणगण उसकी शान्ति करने लगते हैं और पुनः उन्हें मुक्त देखकर आनन्दित होते हैं॥३५॥
एवञ्च गृह्यते सूर्य्यश्चन्द्रमास्तत्र गृह्यते ॥३६॥ अबुधास्तत्र पश्यन्ति मनुष्या मांसचक्षुषः। जगत् सम्मोहनं चैव ग्रहणं चन्द्रसूर्ययोः ॥३७॥
इस प्रकार राहु चन्द्र तथा सूर्य को जब ग्रहण करता है तब चर्मचक्षु वाले अबोध मानव उसे चन्द्र-सूर्य का ग्रहण मानते हैं तथा समस्त जगत् उस ग्रहण से सम्मोहित हो जाता है॥३६-३७॥
त्रयोविंशोऽध्यायः १२१
पुण्यं महापवित्रं तु स्नाने दाने तथा जपे।
विदित्वा चास्य माहात्म्यं सर्वदेवसमागमम्।
ध्यात्वा श्रुत्वा पठित्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३८॥
इति श्रीसाम्बपुराणे राहुग्रहणविचारो नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः
स्नान, दान तथा जपविशेष के लिये ग्रहणकाल अत्यन्त महापुण्यमय तथा पवित्र समय होता है। सभी देवता इस समय एकत्र होते हैं और इसका माहात्म्य जानकर ध्यान करते हैं, श्रवण करते हैं तथा पाठ करते हैं और समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।।३८।।
श्रीसाम्बपुराण में राहुग्रहणविचार नामक त्रयोविंश अध्याय समाप्त
चतुर्विंशोऽध्यायः
वशिष्ठ उवाच
एवं सूर्यस्य माहात्म्यं वर्णितं हर्षवर्द्धनम्।
प्रीतित्वमाप्तवानेव ततः संश्रुत्य नारदात् ॥१॥
विनयादुपसङ्गम्य देवस्य पुरतस्तदा।
निपत्य दीनया वाचा साम्बः पितरमब्रवीत् ॥२॥
वशिष्ठ कहते हैं—देवर्षि नारद से सूर्य के हर्षवर्द्धक माहात्म्य को सुनकर साम्ब ने प्रीतिलाभ किया। तदनन्तर सविनय पूर्वक पिता श्रीकृष्ण के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके दीन वाणी से इस प्रकार कहने लगे॥१-२॥
साम्ब उवाच
कश्मलेनाभिभूतोऽस्मि मलेनाङ्गावसेविना।
वैद्यैर्नौषधिभिर्वापि न शान्तिर्विद्यते मम ॥३॥
वनं यास्यामि गोविन्द अनुज्ञां दातुमर्हसि।
शिवेन पुण्डरीकाक्ष ध्यायस्व पुरुषोत्तम ॥४॥
साम्ब कहते हैं—मैं मालिन्य से अभिभूत हो गया हूँ। स्वेदादि मल (कुष्ठरोग-जनित) से मेरी देह अवसन्न है। किसी वैद्य अथवा औषधि से शान्ति नहीं मिल रही है। हे गोविन्द! हे पुण्डरीकाक्ष! आपकी अनुमति लेकर वन में जाना चाहता हूँ॥३-४॥
अनुज्ञातः स कृष्णेन सिन्धोरुत्तरकूलतः।
ज्ञात्वा संतारयामास चन्द्रभागां महानदीम् ॥५॥
कृष्ण द्वारा सुख से ध्यान करने की अनुज्ञा प्राप्त करके साम्ब सिन्धु के उत्तरी किनारे पर स्थित महानदी चन्द्रभागा को पार कर गये॥५॥
तत्र मित्रवनं गत्वा तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
उपवासकृशः साम्ब शुद्धो धमनितस्ततः ॥६॥
आराधनार्थं सूर्यस्य गुह्यं स्तोत्रमिदं जगौ।
चतुर्भिः सम्मितं वेदैः पुराणाशयबृंहितम् ॥७॥
तदनन्तर त्रिभुवन-विख्यात महातीर्थ मित्रवन में जाकर उपवास द्वारा कृश, शुद्ध धमनी वाले साम्ब ने आराधनार्थ चतुर्वेद-तुल्य पुराण के आशय से युक्त सूर्य के परम रहस्यमय स्तोत्र का पाठ करना प्रारम्भ किया॥६-७॥
| चतुर्विंशोऽध्यायः | १२३ |
|---|
यदेतन्मण्डलं शुक्लं दिव्यं ह्यजरमव्ययम्।
युक्तं मनोजवैरश्वैर्हरितैर्ब्रह्मवादिभिः ॥१८॥
आदिरेव हि भूतानामादित्य इति संज्ञितः।
त्रैलोक्यश्चक्षुरेषोऽत्र परमात्मा प्रजापतिः ॥१९॥
सूर्यभण्डल शुक्ल, दिव्य, अजर तथा अव्यय है। यह ब्रह्मवादी मन से भी द्रुतगामी हरितवर्ण अश्वों से युक्त है। सभी प्राणियों के आदि होने के कारण इसे आदित्य कहा जाता है। ये त्रैलोक्य के नेत्र (चक्षुस्वरूप) परमात्मा तथा प्रजापति हैं ॥१८-१९॥
य एष मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान्।
एष विष्णुरचिन्त्यात्मा ब्रह्मा चैव प्रजापतिः ॥२०॥
रुद्रो महेन्द्रो वरुणः आकाशः पृथिवी जलम्।
वायुः शशाङ्कः पर्जन्यो धनाध्यक्षस्तथैव च ॥२१॥
इस मण्डल में जो महान् पुरुष दीप्त हो रहे हैं, वे अचिन्त्य आत्मस्वरूप विष्णु, ब्रह्मा तथा प्रजापति हैं। यहीं रुद्र, वरुण, आकाश, पृथिवी, जल, वायु, चन्द्र, मेघ तथा धनाध्यक्ष के रूप में कुबेर विराजित हैं ॥२०-२१॥
स एष मण्डले ह्यस्मिन्नग्निवर्चाः प्रकाशते।
सहस्ररश्मिरेषोऽत्र द्वादशात्मा दिवाकरः ॥२२॥
स एष मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान्।
एष साक्षान्महादेवो वृत्तकुम्भनिभः शुभः ॥२३॥
इस मण्डल में अग्नितेज से जो प्रकाशित हैं, वे ही हैं—सहस्ररश्मि द्वादशात्मा दिवाकर। इस मण्डल में जो महान् पुरुष दीप्त हैं, वे गोलाकार कुम्भ के समान मंगलदायक साक्षात् महादेव हैं ॥२२-२३॥
कालो ह्येष महायोगी संहारोत्पत्तिलक्षणः।
य एष मण्डले ह्यस्मिंस्तेजोभिः पूरयन्महीम् ॥२४॥
भ्रमते ह्यव्यवच्छिन्नो धातैषोऽमृतलक्षणः।
नातः परतरो देवस्तेजसा विद्यते क्वचित् ॥२५॥
ये कालस्वरूप महायोगी तथा संहार एवं उत्पत्ति के कारण हैं। वे इस मण्डल के तेज द्वारा पृथ्वी को पूर्ण करके निरन्तार भ्रमण करते रहते हैं। ये अमृतस्वरूप धाता हैं। इनकी अपेक्षा कोई भी तेजस्वी देवता कहीं भी नहीं है ॥२४-२५॥
पुष्णाति सर्वभूतानि ह्येष एव स्वधामृतैः।
अन्तःस्थो म्लेच्छजातीयांस्तिर्यग्योनिगतानपि ॥२६॥
| १२४ | श्रीसाम्बपुराणम् |
|---|
ये स्वधारूप अमृत से सभी प्राणियों का पोषण करते हैं। ये सबके अन्तः में, यहाँ तक कि म्लेच्छ जाति तथा तिर्यक् योनिगत प्राणियों के अन्तः में भी स्थित रहते हैं॥१६॥
कारुण्यात् सर्वभूतानि पासि देव विभावसो।
आपत्सु च विमोक्षार्थं त्वं भक्तानभिरक्षसि॥१७॥
चित्रकुष्ठान्धबधिरान् खञ्जान्पङ्गूञ्जडांस्तथा।
प्रपन्नवत्सलो देव नीरुजः कुरुषे नरान्॥१८॥
हे देव विभावसु! आप कल्पनावशात् सभी प्राणियों का पालन करते हैं। विपत्-समूह में उनके मोचनार्थ आप भक्तों की रक्षा करते हैं। हे प्रपन्नवत्सल देव! चित्रकुष्ठ, अन्ध, वधिर, खञ्ज, पङ्गु तथा जड लोगों को आप ही रोगमुक्त करते हैं॥१७-१८॥
दद्रुगण्डनिमग्नांश्च निर्ब्रणान्यूरुषांस्तथा।
प्रत्यक्षदर्शी त्वं देव समुद्धरसि लीलया॥१९॥
दद्रु, गण्ड (विस्फोटकादि) प्रभृति रोग में निमग्न पुरुषों को आप नीरोग कर देते हैं। हे देव! आप प्रत्यक्षदर्शी देवता हैं और अपनी लीला से (अनायास ही) सबका उद्धार कर देते हैं॥१९॥
का मे शक्तिस्तव स्तोतुमार्त्तोऽहं रोगपीड़ितः।
स्तूयसे त्वं सदा देव ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः॥२०॥
मैं आर्त्त तथा रोगपीड़ित हूँ। आपकी स्तुति करने की शक्ति मुझमें कहाँ है? हे देव! आप सर्वदा ब्रह्मा-विष्णु-शिवादि से स्तुत होते हैं॥२०॥
महेन्द्रसिद्धगन्धर्वैरप्सरोभिः सगुह्यकैः।
स्तुतिभिः किं पवित्रैर्वा तव देव समीरिताः॥२१॥
हे देव! इन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व, गुह्यगण के साथ अप्सरागण पवित्र स्तुति द्वारा आपका स्तवन करते हैं॥२१॥
यस्य ते ऋग्यजुःसाम्नां त्रितयं मण्डले स्थितम्।
ध्यायिनां तु परं धाम मोक्षद्वारं च मोक्षिणाम्॥२२॥
आपके मण्डल में ऋक्-यजुः तथा साम (यह त्रयी) मूर्त्तिमान होकर अवस्थान करते हैं। आप योगीगण के परम धाम तथा मोक्षाभिलाषियों के लिये मोक्षद्वार हैं॥२२॥
अनन्तं तेजसां तेजो ह्यचिन्त्याव्यक्तनिर्मलम्।
यदप्यपाहतं किञ्चिद् स्तोत्रेऽस्मिन् जगतःपते।
आर्त्तभक्तिं च विज्ञाय तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि॥२३॥
चतुर्विंशोऽध्यायः १२५
तेजों में आपका तेज अनन्त, अचिन्त्य, अव्यक्त तथा निर्मल है। हे जगत्पति! यदि मेरे इस स्तव में कुछ वैगुण्य हुआ है, तो उसे आप आर्त्तजनों की भक्ति समझकर क्षमा करने में समर्थ हैं॥२३॥
तमुवाच नरः प्रीतः सूर्यो जाम्बवतीसुतम्।
प्रीतोऽस्मि तपसा वत्स वरं ब्रूहि यमिच्छसि॥२४॥
परमात्मस्वरूप सूर्य प्रसन्न होकर जाम्बवती-नन्दन साम्ब से बोले—हे साम्ब! वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हो गया। जो इच्छा हो, उस वर की प्रार्थना करो॥२४॥
साम्ब उवाच
यदि प्रसन्नो भगवानेष एव वरो मम।
भक्तिर्भवतु मे नित्यं त्वयि देवे सनातने॥२५॥
साम्ब कहते हैं—हे भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं तब हमें यही वर दीजिये कि आप सनातन देव के प्रति मेरी नित्य भक्ति बनी रहे॥२५॥
सूर्य उवाच
भूयस्तुष्टोऽस्मि भद्रं ते वरं वरय सुव्रत।
स द्वितीयं वरं वव्रे तं देवं वरदं शुभम्॥२६॥
मलं शरीरस्थमिदं त्वत्प्रसादात् प्रणश्यतु।
तथास्त्वित्युक्तमात्रोऽसौ भास्करेण महात्मना॥२७॥
तन्मुमोच मलं साम्बो देहात्त्वचमिवोरगः।
ततो लब्धवरः साम्बो रूपवांश्चाभवत् पुनः॥२८॥
सूर्यदेव कहते हैं—इससे मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ हूँ। तुम्हारा मंगल हो। हे सुव्रत! वर माँगो। साम्ब ने कल्याणप्रद वरद सूर्यदेव से द्वितीय वर इस प्रकार माँगा—मेरे शरीर का यह मल (कुष्ठरोग) आपकी कृपा से नष्ट हो जाय। महात्मा भास्कर के 'तथास्तु' कहते ही साम्ब के देह से वह कुष्ठरोग उसी प्रकार समाप्त हो गया, जैसे कि सर्प अपनी केंचुल त्याग देता है। यह वर पा जाने से साम्ब पुनः रूपवान हो गये॥२६-२८॥
सूर्य उवाच
भूयश्च शृणु मे साम्ब तुष्टोऽहं यद् ब्रवीमि ते।
अद्य प्रभृति त्वन्नाम्ना मम स्थानानि सुव्रत!॥२९॥
क्षितौ ये स्थापयिष्यन्ति तेषां लोकः सनातनः॥३०॥
स्थापयस्व च मामस्मिंश्चन्द्रभागातटे शुभे।
त्वत्समानमिदं चापि पुरं साम्ब भविष्यति॥३१॥
१२६ श्रीसाम्बपुराणम्
सूर्यदेव कहते हैं—हे साम्ब! तुमसे सन्तुष्ट होकर जो कहता हूँ, उसे सुनो! हे सुव्रत! आज से तुम्हारे नाम से पृथ्वी पर जो मेरा स्थान स्थापित करेगा, उसे सनातन लोक की प्राप्ति होगी। हे साम्ब! शुभ चन्द्रभागा के तट पर मुझे स्थापित करो। तुम्हारे नाम से ही यह नगर प्रसिद्ध होगा।।२९-३१।।
कीर्त्तिस्तवाक्षया लोके यावद् भूमिर्भविष्यति।
भूयश्च ते प्रदास्यामि प्रत्यहं स्वप्नदर्शनम्॥३२॥
जब तक पृथ्वी रहेगी, जगत् में तुम्हारी अक्षय कीर्ति बनी रहेगी और प्रतिदिन तुम्हें स्वप्न में मेरा दर्शन प्राप्त होगा।।३२।।
एवं दत्त्वा वरं तस्मै वृष्णिसिंहाय भास्करः।
प्रत्यक्षदर्शनं दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत॥३३॥
सूर्यदेव वृष्णिसिंह साम्ब को इस प्रकार का वर तथा प्रत्यक्ष दर्शन देकर वहाँ से अन्तर्हित हो गये।।३३।।
पठेद् द्विज इदं स्तोत्रं त्रिकालं भक्तिमान्नरः।
नारी वा दुःखशोकार्त्ता मुच्यते शोकसागरात्॥३४॥
हे ब्राह्मण! जो भक्तिमान व्यक्ति अथवा दुःख-शोक से कातर नारी त्रिकाल में इस स्तोत्र का पाठ करेंगे, वे शोकसागर से मुक्त हो जायेंगे।।३४।।
चक्षुःपीडा मनःपीडा ग्रहपीडाभ्य एव च।
बन्धने निगडे घोरे काष्ठागारगृहेषु या॥३५॥
नेत्र की पीड़ा, मन की पीड़ा, ग्रहपीड़ा, घोर शृङ्खला-बन्धन तथा काष्ठागार गृह के बन्धन से वे मुक्त हो जायेंगे।।३५।।
अधस्तादन्तरिक्षे वा क्षमते भक्तिवत्सलः।
त्रिसप्तशतमावर्त्तैर्होमैस्त्वां सप्तरात्रिकम्॥३६॥
राज्यकामो लभेद्राज्यं धनकामो लभेद्धनम्।
रोगार्त्तो मुच्यते रोगाद् यथा साम्बस्तथैव सः॥३७॥
इति श्रीसाम्बपुराणे रोगोपनयनो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः
अधोलोक में अथवा अन्तरिक्ष में भक्तवत्सल सूर्यदेव सभी को क्षमा करते हैं। सात रात्रि २१०० आवर्त्त होम करने से राज्याभिलाषी राज्य प्राप्त करते हैं, धनकामी धनलाभ करते हैं एवं जैसे साम्ब रोग से मुक्त हो गये थे, वैसे ही रोगार्त्त व्यक्ति रोगमुक्त हो जाते हैं।।३६-३७।।
श्रीसाम्ब पुराण का रोगोपनयन नामक चतुर्विंश अध्याय समाप्त
पञ्चविंशोऽध्यायः
(श्रीसूर्यस्तवराजवर्णनम्)
वशिष्ठ उवाच
स्तुवंस्तत्र ततः साम्बः कृशो धमनिसन्ततः।
राजन्नामसहस्रेण सहस्रांशुं दिवाकरम् ॥१॥
खिद्यमानं तु तं दृष्ट्वा सूर्यः कृष्णात्मजं तदा।
स्वप्ने तु दर्शनं दत्त्वा पुनर्वचनमब्रवीत् ॥२॥
वशिष्ठ कहते हैं—महाराज साम्ब सहस्रांशु दिवाकर के सहस्र नाम के द्वारा स्तव करते-करते जब कृश एवं धमनीशिरा-मात्र हो गये तब खिद्यमान कृष्णपुत्र साम्ब को देखकर सूर्य ने उनको स्वप्न में दर्शन देकर इस प्रकार कहा।।१-२।।
सूर्य उवाच
साम्ब साम्ब महाबाहो शृणु जाम्बवतीसुत।
अलं नामसहस्रेण पठस्वेमं स्तवं शुभम् ॥३॥
यानि नामानि गुह्यानि पवित्राणि शुभानि च।
तानि ते कीर्त्तयिष्यामि श्रुत्वा त्वमवधारय ॥४॥
सूर्य कहते हैं—साम्ब-साम्ब! महाबाहो! जाम्बवतीनन्दन! सहस्र नामों का प्रयोजन नहीं है। तुम इस शुभ स्तव का पाठ करो। ये नाम अत्यन्त गुप्त हैं, पवित्र तथा शुभप्रद हैं। उन्हें मैं कहता हूँ। तुम स्थिर होकर धारण करो।।३-४।।
ॐ विकर्त्तनो विवस्वांश्च मार्त्तण्डो भास्करो रविः।
लोकप्रकाशकः श्रीमाँल्लोकचक्षुर्गृहेश्वरः ॥५॥
लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्त्ता हर्त्ता तमिस्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ॥६॥
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।
एकविंशतिरित्थेष स्तव इष्टः सदा मम ॥७॥
ॐ, विकर्तन, विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान्, लोकचक्षु, ग्रहेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, कर्त्ता, हर्त्ता, तमिस्रहा, तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा एवं सर्वदेवनमस्कृत—इन इक्कीस नामों से स्तुति मुझे सदा प्रिय है।।५-७।।
१२८ श्रीसाम्बपुराणम्
शरीरारोग्यदश्चैव धनवृद्धियशस्करः।
स्तवराज इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ १८॥
यह शरीर के लिये आरोग्यप्रद, धनवर्धक तथा यशप्रद स्तवराज तीनों लोकों में प्रसिद्ध है॥१८॥
य एतेन महाबाहो द्वे सन्ध्येऽस्तमनोदये।
स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१९॥
कायिकं वाचिकं चापि मानसं यच्च दुष्कृतम्।
तत् सर्वमेकजाप्येन प्रणश्यति ममाग्रतः ॥२०॥
एष जाप्यश्च होमश्च सन्ध्योपासनमेव च।
बलिमन्त्रोऽर्घ्यमन्त्रश्च धूपमन्त्रस्तथैव च॥२१॥
हे महाबाहो! जो व्यक्ति दोनों सन्ध्या के समय (सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय) इस स्तव के द्वारा प्रणत होकर मेरी स्तुति करेगा, वह समस्त पापों से मुक्त हो जायेगा। समस्त कायिक, वाचिक तथा मानसिक दुष्कृत मेरे समक्ष इस स्तुति के मात्र एक जप से ही समाप्त हो जाते हैं। यह मन्त्र जाप्य (जपयोग्य) है। इससे होम, सन्ध्या, उपासना, बलि (उपहार प्रदान) किया जा सकता है। यही अर्घ्य का तथा धूप-प्रदान का भी मन्त्र है॥१९-२१॥
अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाते प्रदक्षिणे।
पूजितोऽयं महामन्त्रः सर्वव्याधिहरः शुभः॥२२॥
इस मन्त्र से अन्नदान, स्नान, प्रणाम तथा प्रदक्षिणा भी की जा सकती है। यह महामन्त्र पूजित होने पर व्याधिविनाशक तथा शुभप्रद होता है॥२२॥
एवमुक्त्वा तु भगवान् भास्करो जगदीश्वरः।
आमन्त्र्य कृष्णतनयं तत्रैवान्तरधीयत ॥२३॥
साम्बोऽपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनम्।
पूतात्मा नीरुजः श्रीमाँस्तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान्॥२४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे रोगापनयने श्रीसूर्यवक्त्रविनिःसृतस्तवराजवर्णनं नाम पञ्चविंशतितमोऽध्यायः
यह कहकर जगत् के नियामक भगवान् भास्कर कृष्णपुत्र साम्ब से विदा लेकर वहाँ से अन्तर्हित हो गये। साम्ब भी इस स्तवराज से सप्त अश्ववाहन सूर्य की स्तुति करके पवित्रात्मा होकर, नीरोग, शोभायुक्त (श्रीमान्) हो कुष्ठ रोग से मुक्त हो गये॥२३-२४॥
श्री साम्बपुराण में सूर्यकृत स्तवराजवर्णन नामक पञ्चविंश अध्याय समाप्त
षड्विंशोऽध्यायः
(मगानयनम्)
अथ लब्ध्वरः साम्बः प्राप्तं रूपं पुरातनम्।
मन्यमानस्तदाश्चर्यं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥१॥
पूर्वाभ्यासेन तेनैव सार्धमन्यैस्तपस्विभिः।
स्नानार्थं नातिदूरस्थां चन्द्रभागां नदीं ययौ ॥२॥
तदनन्तर वर-लाभ करके साम्ब ने पुरातन रूप प्राप्त किया। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे मन ही मन आनन्दित हो गये। पुरानी आदत के कारण वे अन्य तपस्वीगण के साथ स्नान के लिये पास की चन्द्रभागा नदी में गये।।१-२।।
स स्नात्वा सहसैवाथ पश्यतिस्म प्रभावतीम्।
ऊह्यमानां जलौघेन प्रतिमामुन्मुखीं रवेः ॥३॥
उन्होंने स्नान करके हठात् देखा कि जल के स्रोत में सूर्य की प्रभा से युक्त एक उज्ज्वल प्रतिमा प्रतिच्छवित हो रही है।।३।।
स तामुत्तीर्य सलिलादानयित्वा स्वमाश्रमम्।
तस्मिन्मित्रवनोद्देशे स्थापयित्वा विधानतः ॥४॥
वे उस प्रतिमा को जल से निकाल कर अपने आश्रम में लाये और मित्रवन के एक स्थान पर उसे विधानपूर्वक स्थापित किया।।४।।
ततस्तामेव पप्रच्छ प्रणम्य प्रतिमां रवेः।
केनेयं निर्मिता नाथ भवतो ह्याकृतिः शुभा ॥५॥
तदनन्तर उस सूर्यप्रतिमा को प्रणाम करके साम्ब ने पूछा—हे नाथ! आपकी इस शुभ आकृति का निर्माण किसने किया है?।।५।।
प्रतिमा तमुवाचाथ शृणु साम्ब यतस्त्वियम्।
निर्मिता येन चाप्येषा पुरुषेण ममाकृतिः ॥६॥
प्रतिमा ने उत्तर किया—साम्ब! सुनो, जैसे उस प्रतिमा का निर्माण हुआ है और जिस पुरुष ने उसका निर्माण किया है।।६।।
ममातितेजसाविष्टं रूपमासीत् पुरातनम्।
असह्यं सर्वभूतानां ततोऽहं प्रार्थितः सुरैः ॥७॥
१३० | श्रीसाम्बपुराणम्
सह्यं भवतु ते रूपं सर्वप्राणभृतामिह।
ततो मया समादिष्टो विश्वकर्मा महातपाः ॥८॥
पहले मेरा रूप अत्यन्त तेजयुक्त था, जो समस्त प्राणिगण के लिये असह्य था। इसलिये देवताओं ने मुझसे प्रार्थना किया कि सभी प्राणियों के लिये आपका रूप सह्य हो जाय। इसलिये मैंने महातेजस्वी देवशिल्पी विश्वकर्मा को आदेश दिया॥७-८॥
तेजसः शातनं कुर्वन् रूपं निर्वर्त्तयस्व मे।
ततस्तु मत्समादेशात्तेनैव निपुणं तदा ॥९॥
शाकद्वीपे भ्रमिं कृत्वा रूपं निर्वर्त्तितं मम।
प्रीत्या ते साम्प्रतं चैव समयाकारितं पुनः ॥१०॥
(मैंने आदेश दिया कि) ‘मेरे तेज का खण्डन करके मेरा रूप तैयार करो’। तदनन्तर मेरे आदेश के अनुसार उन्होंने शाकद्वीप में भ्रमि (घूर्णिचक्र यन्त्र) पर (काट-छाँट कर) मेरे रूप का निर्माण किया। यहाँ मैंने तुम्हारी प्रसन्नता के लिये उनको बुलाया है॥९-१०॥
तेनेयं कल्पवृक्षात्तु निर्मिता प्रतिमा मम।
कृत्वा हिमवतः पृष्ठे पुण्यसिद्धनिषेविते ॥११॥
त्वदर्थं चन्द्रभागायां ततस्तेनावतारिता।
भवतस्तारणार्थं हि जातं स्थानमिदं मम ॥१२॥
विश्वकर्मा ने पुण्यशाली सिद्धों की आवासभूमि हिमालय के पृष्ठ पर कल्पवृक्ष से मेरी प्रतिमा का निर्माण किया था और तुम्हारे लिये उसे इस चन्द्रभागा नदी पर रख दिया था। तुम्हारी मुक्ति के लिये ही मेरा यह स्थान प्रकट हुआ है॥११-१२॥
रुचिरं सर्वदा चात्र सान्निध्यं मे भविष्यति ॥१३॥
सान्निध्यं मम पूर्वाह्ने उदिते रञ्जयते जनः।
कालात्यये च मध्याह्ने सायाह्ने चात्र नित्यशः ॥१४॥
इस स्थान पर सर्वदा मेरा मनोहर सान्निध्य रहेगा। पूर्वाह्न में उदित होने पर लोग मेरा सान्निध्य पाकर आनन्दित होंगे। तदनन्तर मध्याह्न तथा सायाह्न में भी नित्य मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे॥१३-१४॥
वशिष्ठ उवाच
श्रुत्वा देवस्य तद्वाक्यं दृष्ट्वा प्रत्यक्षदर्शिनम्।
कृत्वा देवगृहं साम्बस्ततः प्रोवाच नारदम् ॥१५॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—सूर्यदेव की बात सुनकर और प्रत्यक्ष उनका दर्शन पाकर साम्ब ने देवगृह का निर्माण करके नारद से इस प्रकार कहा॥१५॥
षड्विंशोऽध्यायः १३१
साम्ब उवाच त्वत्प्रसादान्मया प्राप्तं रूपमेतत् सनातनम्। प्रत्यक्षदर्शनं चापि भास्करस्य महात्मनः ॥१६॥ सर्वमेतच्च सम्प्राप्य पुनश्चिन्ताकुलं मनः। देवस्य परिचर्यायाः पालनं कः करिष्यति ॥१७॥ गुणयुक्तो द्विजो यो हि समर्थः परिपालने। ममैवानुग्रहाद् ब्रह्मन् विचिन्त्याख्यातुमर्हसि ॥१८॥ एवमुक्तस्तु साम्बेन नारदः प्रत्युवाच तम् ॥१९॥
साम्ब कहते हैं—आपकी कृपा से मैंने यह सनातन दिव्य रूप प्राप्त कर लिया एवं महात्मा भास्कर का प्रत्यक्ष दर्शन भी प्राप्त किया। यह सब पाकर भी मेरा मन चिन्तायुक्त ही है कि सूर्यदेव की (प्रतिमा की) पूजा—परिचर्या कौन करेगा? हे ब्रह्मन्! गुणयुक्त कौन ब्राह्मण है, जो इस कार्य में समर्थ है? मुझ पर अनुग्रह करके यह बतायें। साम्ब से यह सुनकर नारद उनसे कहने लगे॥१६-१९॥
नारद उवाच न द्विजः परिगृह्णन्ति देवस्यात्मीकृतं धनम्। विद्यते च धनं ह्यत्र गुरुश्चायं प्रतिग्रहः ॥२०॥ देवचर्यागतैर्द्रव्यैः क्रिया ब्राह्मी न विद्यते। अविज्ञाय च कुर्वन्ति ये क्रिया लोभमोहिताः ॥२१॥ अपांक्तेया भवन्तीह ते वै देवलका द्विजाः। अविज्ञाय विधानं ये ब्राह्मणा लोभमोहिताः ॥२२॥ देवस्वमुपभोक्ष्यन्ति पतितास्ते भवन्ति हि। गर्हितं मानवं शास्त्रं न प्रशंसन्ति ते द्विजाः ॥२३॥
नारद कहते हैं कि देवता का धन ब्राह्मण नहीं लेते। यह धन तो है; लेकिन उसका प्रतिग्रह अत्यन्त कठिन है। देवता की परिचर्या में प्राप्त द्रव्य द्वारा ब्राह्मण का कोई काम नहीं होता। यह तत्त्व जाने बिना जो लोभ से मुग्ध होकर इसे प्रतिगृहीत करते हैं, ऐसे पुरोहित गण सद् ब्राह्मणों के साथ एक पंक्ति में भोजन ग्रहण करने योग्य नहीं होते। अज्ञानवशात् लोभ से विमुग्ध जो ब्राह्मण देवस्व (देवमूर्त्ति-पूजन से प्राप्त धन) का भोग करते हैं, वे पतित हो जाते हैं। ऐसे निन्दित ब्राह्मणगण की मानवशास्त्र में प्रशंसा नहीं की गई है॥२०-२३॥
देवस्वं ब्राह्मणस्वं च यो लोभादुपजीवति। स पापात्मा परे लोके गृध्रोच्छिष्टेन जीवति ॥२४॥
१३२ | श्रीसाम्बपुराणम्
देवता तथा ब्राह्मण के उद्देश्य से उत्सर्गीकृत वस्तु तथा द्रव्य से जो व्यक्ति लोभवशात् जीविका का निर्वाह करता है, वह पापात्मा परलोक में गृद्धों द्वारा छोड़ी गई जूठन से जीवन धारण करता है॥२४॥
विधिज्ञो ज्ञानवन्तश्च परिचर्याक्षमं तथा।
समाख्यास्यति ते देवस्तस्मात्तं शरणं व्रज॥२५॥
अतएव अन्य कोई ब्राह्मण परिचर्या करे, जो अधिक ज्ञानी तथा सेवा के उपयुक्त हों। इसे देव (सूर्य) तुमसे बतलायेंगे; अतः उनकी शरण में जाओ॥२५॥
नारदेनैवमुक्तस्तु प्रणम्य शिरसा रविम्।
संशयं परिपप्रच्छ कस्ते पूजां करिष्यति॥२६॥
नारद से यह जानकर साम्ब ने रविदेव को मस्तक से प्रणाम करके अपने संशय को व्यक्त किया कि आपकी पूजा कौन करेगा?॥२६॥
विज्ञप्ते त्वथ साम्बेन प्रतिमा तमुवाच ह।
न योग्यः परिचर्यायां जम्बूद्वीपे ममानघ॥२७॥
मम पूजापरा कृत्वा शाकद्वीपादिहानय।
लवणोदात् परे पारे क्षीरोदेन समावृतम्॥२८॥
जम्बूद्वीपात् परं तस्माच्छाकद्वीप इति श्रुतः।
तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमाश्रिताः॥२९॥
साम्ब के ऐसा पूछने पर प्रतिमा (सूर्यप्रतिमा) ने कहा—हे निःष्पाप! जम्बू द्वीप में मेरी परिचर्या करने वाला कोई नहीं है। शाकद्वीप से मेरी पूजा में परायण ब्राह्मण को ले आओ। वह शाकद्वीप लवण समुद्र के पार क्षीरोदक से घिरा है। जम्बूद्वीप के पार शाकद्वीप है, यह सर्वविदित है। वह पवित्र जनपद चातुर्वण्य मनुष्यों द्वारा समावृत है॥२७-२९॥
मगाश्च मामगाश्चैव मानसा मन्दगास्तथा।
मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा मामगाः क्षत्रियास्तथा॥३०॥
वैश्यास्तु मानसा ज्ञेयाः शूद्रास्तेषां तु मन्दगाः।
न तेषां संकरः कश्चित् वर्णाश्रमकृतः क्वचित्॥३१॥
वहाँ चार प्रकार के लोग हैं—मग, मामग, मानस तथा मन्दग। मगगण प्रायः ब्राह्मण हैं। मानग क्षत्रिय होते हैं। मानस वैश्य हैं तथा शूद्रगण मन्दग हैं। उनमें वर्णाश्रम-कृत कोई साङ्कर्य नहीं है॥३०-३१॥
धर्मस्याव्यभिचारित्वादेकान्ते सुखिताः प्रजाः।
तेजसश्चास्मदीयस्य निर्मिता वै पुरा मया॥३२॥
षड्विंशोऽध्यायः १३३
धर्म से अविचलित होने के कारण वहाँ समस्त प्रजाजन सुखी रहते हैं। अपने तेज से मैंने वहाँ पुरी का निर्माण किया है।।३२।।
तेभ्यां वेदाश्च चत्वारः सरहस्या मयेरिताः।
वेदोक्तैर्विविधैः स्तोत्रैः परैर्गुह्यैर्मया कृतैः ।।३३।।
मामेव ते च ध्यायन्ति मां जपन्ते च नित्यशः ।
मद्भावना मम परा मद्भक्ता मत्परायणाः ।।३४।।
उनको मैंने सरहस्य चारो वेदों को बतलाया है। मेरे द्वारा कथित वेदोक्त परम गुह्य विविध स्तोत्रों द्वारा वे मेरा ही ध्यान करते हैं और नित्य मेरा ही जप करते हैं। वे मेरी भावना करते हैं, मेरा पूजन करते हैं। वे सभी मेरे भक्त तथा मुझमें परायण (आश्रित) हैं।।३३-३४।।
मम शुश्रूषकाश्चैव ममैव व्रतचारिणः ।
अव्यङ्गधारिणः सर्वे विधिदृष्टेन कर्मणा ।।३५।।
कुर्वन्ति ते सदा तत्र मम पूजां मनोऽनुगाम्।
तत्र देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः ।।३६।।
वे वहाँ मन की अभिलाषा के अनुसार मेरा पूजन करते हैं। वहाँ गन्धर्वों के साथ देवता एवं चारणों के साथ सिद्धगण विहार करते हैं, रमण करते हैं।।३५-३६।।
विहरन्ते रमन्ते च दृश्यमानाश्च तैः सह।
श्वेतद्वीपे त्वहं विष्णुः कुशद्वीपे महेश्वरः ।।३७।।
वहाँ विहार करते तथा रमण करते उनके साथ मैं दृश्यमान होता हूँ। मैं श्वेत द्वीप में विष्णुरूपेण तथा कुशद्वीप में महेश्वररूपेण रहता हूँ।।३७।।
पुष्करे च स्मृतो ब्रह्मा शाकद्वीपे च भास्करः ।
तन्मगान मम पूजार्थं शाकद्वीपादिहानय ।।३८।।
आरूढ़ो गरुड़ं साम्ब शीघ्रं गच्छ विचारय ।।३९।।
पुष्कर में मैं ब्रह्मारूप से तथा शाकद्वीप में भास्कररूप से ख्यात हूँ। अतएव मेरी पूजा-हेतु शाकद्वीप से मग ब्राह्मण को यहाँ लाओ। हे साम्ब! विचार करके गरुड़ पर आरूढ़ होकर शीघ्र वहाँ जाओ।।३८-३९।।
वशिष्ठ उवाच
तथेति प्रतिगृह्णाज्ञां रवेर्जाम्बवतीसुतः ।
पुनर्द्वारवतीं गत्वा कान्त्यातीव समावृतः ।।४०।।
आख्यातवान् पितुः सर्वं स्वकीयं देवदर्शनम् ।
तस्माच्च गरुड़ं लब्ध्वा ययौ साम्बोऽधिरुह्य तम् ।।४१।।
१३४ श्रीसाम्बपुराणम्
'ऐसा ही हो' कहकर सूर्य का आदेश ग्रहण करके साम्ब रमणीय कान्तियुक्त होकर द्वारका जाकर कृष्ण से अपनी सूर्यदर्शन की बातें बताई और उनसे गरुड़ को प्राप्त करके उसपर आरोहण कर साम्ब चल दिये॥४०-४१॥
शाकद्वीपमनुप्राप्य सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।
तत्रापश्यद् यथोद्दिष्टान् साम्बस्तेजस्विनो मगान् ॥४२॥
शाकद्वीप में पहुँचकर प्रहृष्ट एवं रोमाञ्चित कलेवर वाले साम्ब ने यथाकथित मग (ब्राह्मणों) को देखा॥४२॥
विवस्वन्तं पूजयतो धूपगन्धादिभिः शुभैः ।
अभिवाद्य तु तान् सर्वान् कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम् ॥४३॥
पृष्ट्वा ह्यनामयं तेषां श्लाघयामास तांस्ततः ।
यूयं हि पुण्यकर्माणो द्रष्टव्याश्च शुभार्थिभिः ॥४४॥
वे मंगलमय धूप तथा गन्धादि से सूर्य का पूजन कर रहे थे। उन सबका अभिवादन तथा प्रदक्षिणा करके साम्ब ने उनकी कुशलता पूछकर उनकी प्रशंसा करते हुये कहा कि आप पुण्यकर्मा एवं शुभाकांक्षी प्रतीत हो रहे हैं॥४३-४४॥
यो रतोऽर्कस्य पूजायां तस्य चैव वरप्रदः ।
तनयं विद्धि मां विष्णोर्नाम्ना साम्ब इति श्रुतः ॥४५॥
जो सूर्य को पूजा करते हैं, उनके लिये आप वर देने वाले हैं। आप लोग मुझे विष्णु (कृष्ण)-पुत्र साम्ब जानें॥४५॥
चन्द्रभागातटे चापि मया सूर्यो निवेशितः ।
तेनाहं प्रेषितश्चात्र उत्तिष्ठध्वं व्रजामहे ॥४६॥
मैंने चन्द्रभागा के तट पर सूर्य की प्रतिमा स्थापित की है। उन्होंने ही मुझे यहाँ भेजा है। आप उठिये, हम वहाँ जायँ॥४६॥
ते तमूचुस्ततः साम्बमेवमेतन्न संशयः ।
अस्माकमपि देवेन व्याख्यातं पूर्वमेव हि ॥४७॥
तब उन्होंने साम्ब से कहा कि ऐसा ही सूर्यदेव ने हमसे भी पहले कहा था, इसमें कोई संशय नहीं है॥४७॥
अष्टादशकुलानीह मगानां वेदवादिनाम् ।
यास्यन्ति च त्वया सार्धं यत्र सन्निहितो रविः ॥४८॥
यहाँ से वेदज्ञ मग ब्राह्मणों के अट्ठारह परिवार आपके साथ वहाँ जायेंगे, जहाँ सूर्यदेव की प्रतिमा सन्निहित है॥४८॥
षड्विंशोऽध्यायः १३५
स तु गृह्य ततस्तानि दश चाष्टौ कुलानि च।
आरोप्य गरुड़े साम्बस्त्वरितं पुनरभ्यगात् ॥४९॥
तदनन्तर साम्ब ने उनके अट्ठारह वंश ब्राह्मणाकुल को गरुड़ पर बैठाया और शीघ्र लौट आये।।४९।।
सपुत्रदारसंयुक्तो पूजा यज्ञाय चागतः ।
सोल्पेऽनैव तु कालेन प्राप्तो मित्रवनं पुनः ॥५०॥
वे स्त्री-पुत्रादि के साथ पूजा तथा यज्ञार्थ आये। उनके साथ साम्ब अत्यल्प काल में ही मित्रवन लौट आये।।५०।।
कृत्वाज्ञां तां रवेः साम्बो यत्कृतं तन्न्यवेदयत् ।
रविः शोभनमित्युक्त्वा प्रसन्नः साम्बमब्रवीत् ॥५१॥
मम पूजाकरा ह्येते प्रजानां शान्तिकारकाः ।
मम पूजां विधानोक्तां करिष्यन्ति मनोऽनुगाम् ।
मत्कृते च पुनश्चिन्ता न ते काचिद्भविष्यति ॥५२॥
इति श्रीसाम्बपुराणे मगानयनं नाम षड्विंशोध्यायः
साम्ब ने सूर्य की आज्ञा का पालन कर लिया—यह उन्होंने सूर्य को बताया। सूर्यदेव ने कहा—‘ठीक है’ और प्रसन्नता-पूर्वक साम्ब से कहा—ये मेरे पूजक हैं। प्रजा के लिये शान्तिकारक हैं। ये यथाविधान साभिलाष होकर मेरा पूजन करेंगे। मेरे पूजनार्थ तुमको कोई चिन्तन नहीं करना होगा।।५१-५२।।
श्री साम्बपुराण में मगानयन नामक षड्विंश अध्याय समाप्त
सप्तविंशोऽध्यायः
(मगानां सूर्यपूजा)
बृहद्वल उवाच
अहो सभाग्याः श्लाघ्याश्च कृतपुण्याश्च ते सदा।
पूजायां ये रताः सूर्यो येषां चैव वरप्रदः ॥१॥
बृहद्वल कहते हैं—अहो! जो सूर्यपूजा में रत हैं, वे भाग्यवान हैं, प्रशंसनीय हैं तथा सर्वदा कृतपुण्य हैं। सूर्यदेव उनके लिये वरप्रद हैं॥१॥
पर्याप्तं सर्वमेवैषामिह चामुत्र किं फलम्।
अनित्ये सति मानुष्ये देवपूजारता हि ये॥२॥
अनित्य मनुष्यदेह से जो देवपूजा में सदा रत हैं, उनको इहलोक तथा परलोक में क्या पर्याप्त फल मिलता है॥२॥
किन्तु चिन्तयतः सूर्यं चिन्तयित्वा सुभोजकान्।
ज्ञानं प्रति तथा चैषां हृदये मम संशयः ॥३॥
किन्तु सूर्य चिन्तनकारी को सुखभोग की इच्छा के कारण ज्ञान के प्रति कितनी रुचि (तथा यत्न) है, इस विषय में मुझे सन्देह है॥३॥
कथं पूजाकरा होते किं मगाः किञ्च याजकाः।
ज्ञानं च किं परं तेषां ज्ञेयस्तेषां क एव हि ॥४॥
एतत् सर्वं यथान्यायं तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥५॥
ये लोग किसलिये पूजापरायण होते हैं? मगगण किसके याजक हैं? क्या उनके लिये ज्ञान ही श्रेष्ठ है? उनके लिये ज्ञेय वस्तु क्या है? यह सब यथायथ रूप से मुझसे कहिये॥४-५॥
वशिष्ठ उवाच
मोक्षवादिन एवैते कर्मयोगे समाश्रिताः।
यष्टव्यो भगवान्सूर्यः फलपुष्पैर्मनोरमैः ॥६॥
तथैवान्नौषधीभिश्च ह्याज्यहोमैस्तथैव च।
होमं ये मन्त्रतः कृत्वा परं होमं पिबन्ति ते ॥७॥
परं होमस्य पानाच्च पूतात्मानो ह्यकल्मषाः।
विंशतिं परमां दिव्यां भास्करीं तेजसीं कलाम् ॥८॥