साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तविंशोऽध्यायः
(मगानां सूर्यपूजा)
बृहद्वल उवाच
अहो सभाग्याः श्लाघ्याश्च कृतपुण्याश्च ते सदा।
पूजायां ये रताः सूर्यो येषां चैव वरप्रदः ॥१॥
बृहद्वल कहते हैं—अहो! जो सूर्यपूजा में रत हैं, वे भाग्यवान हैं, प्रशंसनीय हैं तथा सर्वदा कृतपुण्य हैं। सूर्यदेव उनके लिये वरप्रद हैं॥१॥
पर्याप्तं सर्वमेवैषामिह चामुत्र किं फलम्।
अनित्ये सति मानुष्ये देवपूजारता हि ये॥२॥
अनित्य मनुष्यदेह से जो देवपूजा में सदा रत हैं, उनको इहलोक तथा परलोक में क्या पर्याप्त फल मिलता है॥२॥
किन्तु चिन्तयतः सूर्यं चिन्तयित्वा सुभोजकान्।
ज्ञानं प्रति तथा चैषां हृदये मम संशयः ॥३॥
किन्तु सूर्य चिन्तनकारी को सुखभोग की इच्छा के कारण ज्ञान के प्रति कितनी रुचि (तथा यत्न) है, इस विषय में मुझे सन्देह है॥३॥
कथं पूजाकरा होते किं मगाः किञ्च याजकाः।
ज्ञानं च किं परं तेषां ज्ञेयस्तेषां क एव हि ॥४॥
एतत् सर्वं यथान्यायं तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥५॥
ये लोग किसलिये पूजापरायण होते हैं? मगगण किसके याजक हैं? क्या उनके लिये ज्ञान ही श्रेष्ठ है? उनके लिये ज्ञेय वस्तु क्या है? यह सब यथायथ रूप से मुझसे कहिये॥४-५॥
वशिष्ठ उवाच
मोक्षवादिन एवैते कर्मयोगे समाश्रिताः।
यष्टव्यो भगवान्सूर्यः फलपुष्पैर्मनोरमैः ॥६॥
तथैवान्नौषधीभिश्च ह्याज्यहोमैस्तथैव च।
होमं ये मन्त्रतः कृत्वा परं होमं पिबन्ति ते ॥७॥
परं होमस्य पानाच्च पूतात्मानो ह्यकल्मषाः।
विंशतिं परमां दिव्यां भास्करीं तेजसीं कलाम् ॥८॥