साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तविंशोऽध्यायः १३७
वशिष्ठ देव कहते हैं—ये मोक्षवादी ही हैं और कर्मयोग का आश्रय ग्रहण किये हैं। मनोरम फल-पुष्प से भगवान् सूर्य का ये पूजन करते हैं। इसी प्रकार अन्न, औषधि द्वारा भी पूजन करते हैं और घृत से होम करते हैं। मन्त्रों द्वारा होम करते हैं तथा होमद्रव्य का पान करते हैं। होमपान के फल से ये निष्पाप हो गये हैं। सूर्य में दिव्य तेज की बीस कलायें हैं॥६-८॥
कर्मणः साधने चैका तनुरग्नौ स्थिता तु या।
वायुमार्गे स्थिता व्योम्नि द्वितीया च प्रकाशिका ॥९॥
ततः परं तृतीया तत् स्मृतं सूर्यस्य मण्डलम्।
ऋङ्मयं मण्डलं तच्च दिव्यं ह्याम॑रमव्ययम् ॥१०॥
जो अंश अग्नि में स्थित है, कर्म-साधन में वह एक तनु है। आकाश में वायुमार्गस्थ द्वितीय तनु प्रकाशिका है। तदनन्तर तृतीय तनु को सूर्य का मण्डल कहा गया है। वह ऋक्मय मण्डल अथवा दिव्य मण्डल है, जो अमर तथा अव्यय है॥९-१०॥
स तस्य पुरुषो मध्ये योऽसौ सदसदात्मकः।
क्षराक्षरञ्च विज्ञेयो महासूक्ष्मं तथैव च ॥११॥
निष्कलः सकलश्चैव द्वैविध्यं तस्य कल्पितम्।
द्रष्टव्यः सकलश्चैव सर्वभूतव्यवस्थितः ॥१२॥
उस मण्डल में जो पुरुष अवस्थित हैं, वे सत्-असत् स्वरूप हैं, वे क्षर-अक्षररूप से ज्ञेय हैं। उनको महासूक्ष्म स्वरूप भी कहा गया है। निष्कल (कलारहित) तथा सकल (कलायुक्त)—इन दो रूपों से उनकी कल्पना की जाती है। सकलरूप ही दृष्टिगोचर, द्रष्टव्य है। वह समस्त प्राणियों में स्थित है॥११-१२॥
तृण-गुल्म-लता-वृक्ष-मृग-सिंह-गज-द्विजान्।
सुर-द्विज-मनुष्यांश्च स्थलजाञ्जलजांस्तथा ॥१३॥
व्याप्य स्थितं स सर्वत्र सर्वेषामन्तरात्मनि।
यदा कालात्मनश्चैव द्वितीयां तनुमाश्रितः ॥१४॥
तृण-गुल्म-लता-वृक्ष-हिरण-सिंह-हाथी तथा पक्षीगण, देवता, ब्राह्मण तथा मनुष्यगण, स्थलज तथा जलज समस्त प्राणीगण में तथा सबकी अन्तरात्मा में वे ही सदा व्याप्त रहते हैं॥१३-१४॥
निष्कलस्तु तदा ज्ञेयः संस्थितस्तैजसीं कलाम्।
हिमं घर्मं च वर्षं च त्रैलोक्यं कुरुते सदा ॥१५॥
जब वे कलात्मक हैं, तब द्वितीय तनु का आश्रय ग्रहण करते हैं। जब निष्कल हैं, तब तैजसी कला का आश्रय ग्रहण करते हैं। इस प्रकार शीत-ग्रीष्म तथा वर्षारूप त्रिकाल की वे सृष्टि करते हैं॥१५॥