साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 148, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ श्रीसाम्बपुराणम्
तृतीयायां तनौ तस्य संरक्षंस्तत्परं पदम्।
देवयानं च पन्थानं कर्मयोगेन संस्थितम्॥१६॥
आदित्यसिद्धान्तविदः सांख्ययोगविदश्च ये।
तेऽपि गच्छन्ति तत्स्थानं स मोक्षः प्रकीर्त्तितः॥१७॥
उनका तृतीय तनु परमपद में संरक्षित है। कर्मयोग में देवयान पथ संस्थित है। आदित्य सिद्धान्तविद लोग तथा सांख्ययोगज्ञ जिस स्थान में जाते हैं, वह मोक्ष के नाम से कहा गया है।।१६-१७।।
निर्द्वन्द्वो निर्मलश्चैव तत्र गत्वा न शोचति।
वेदेषु च वदन्तीमं त्रयीधर्मस्तु संस्थितः॥१८॥
निर्द्वन्द्व तथा निर्मल होकर वहाँ जाकर कोई शोक नहीं करता। वेद में भी यही कहा गया है। उसमें ऋक्-यजुः-साम वेदत्रयी में वर्णित कर्मकाण्ड संस्थित है।।१८।।
गायत्र्याश्च चतुर्विंशत्यक्षरं परिकीर्त्तितम्।
पञ्चविंशतितत्त्वस्थं ध्यायन्तस्तत्त्ववेदिभिः॥१९॥
ॐकारस्थं ततश्चापि ध्यायन्ति वेदवादिनः।
अक्षरं चैव ओङ्कारं सार्द्धमात्राद्वये स्थितम्॥२०॥
गायत्री २४ अक्षरों की कही गयी हैं। सूर्य का ध्यान तत्त्ववेत्ता २५ तत्त्वस्थ करते हैं। वेदवादीगण उनका ध्यान ओंकार रूप में करते हैं। ओंकार अ + उ + म तथा सार्द्धमात्राद्वय में स्थित है।।१९-२०।।
वदन्ति चार्द्धमात्रस्थमकारं व्यञ्जनात्मकम्।
ध्यायन्ति च मकारं ये ज्ञानं तेषां मदात्मकम्॥२१॥
मकारध्यानयोगाच्च मया ह्येते प्रकीर्त्तिताः॥२२॥
अर्धमात्रस्थ मकार व्यञ्जनात्मक है। जो मकार का ध्यान करता है, उसे आत्मविषयक ज्ञान होता है। मकार ध्यानयोग में मैंने यह सब कहा है।।२१-२२।।
धूपमाल्यैर्जपैश्चापि ह्युपहारैस्तथैव च।
ये यजन्ति सहस्त्रांशुं तेन ते याजकाः स्मृताः॥२३॥
इति श्रीसाम्बपुराणे मगानां सूर्यपूजानाम सप्तविंशोऽध्यायः
जो धूप, माला, जप तथा उपहार (पूजादि द्रव्य) द्वारा सहस्त्रांशु सूर्य का यजन करते हैं, उन्हें याजक कहा गया है।।२३।।
श्रीसाम्बपुराण में मग द्वारा सूर्यपूजा नामक सप्तविंश अध्याय समाप्त