साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 149, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाविंशोऽध्यायः
(मोक्षज्ञानम्)
वशिष्ठ उवाच
इमां ज्ञानोपलब्धिञ्च कथ्यमानां निबोध मे।
अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांस-शोणितलेपनम् ॥१॥
चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्णं मूत्र-पुरीषयोः।
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् ॥२॥
रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत्।
वशिष्ठ देव कहते हैं—मैं तुमसे ज्ञानोपलब्धि की बातें कहता हूँ, सुनो। प्राणियों का निवास स्थल है—यह देह। इस देह की आसक्ति का त्याग करो। यह देह अस्थिस्थूण, स्नायुयुक्त है। मांस तथा रक्त से लिप्त है। चर्म द्वारा आवृत, मूत्र तथा पुरीषरूपी दुर्गन्ध-युक्त, जरा-शोक से युक्त, रोगगृह है। यह आतुर तथा रजयुक्त एवं अनित्य है॥१-२॥
कृपालुत्वं क्षमासत्यार्जवत्वमथ शौचता ॥३॥
क्षमता सर्वभूतेषु एतन्मुक्तस्य लक्षणम्।
तिले तैलं दधि क्षीरे काष्ठे पावकसंहतिः ॥४॥
कृपालुत्व, क्षमा, सत्य, आर्जव, शौच और क्षमता—ये हैं मुक्त के लक्षण। जैसे तिल में तेल है, जैसे दुग्ध में दधि है, जैसे काष्ठ में अग्नि है (वैसे ही समस्त प्राणियों में ये गुण रहते हैं)॥३-४॥
उपायं चिन्तयेदस्य धिया धीरः समाहितः।
प्रमाथिना चलेनापि मनसा संयतेन तु ॥५॥
धीर व्यक्ति समाहित चित्त से बुद्धि द्वारा प्रमाथी, चंचल मन को संयत करने के उपाय का चिन्तन करते हैं॥५॥
बुद्धीन्द्रियाणि संयम्य शकुन्तानिव पञ्जरे।
इन्द्रियैर्नियतैर्देही धारणाभिश्च तृप्यति ॥६॥
प्राणायामैर्दहेद्दोषं धारणाभिश्च दुष्कृतम्।
प्रत्याहारेण विषयान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ॥७॥