भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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१४० श्रीसाम्बपुराणम्

प्राणायाम (पूरक, कुम्भक, रेचक) द्वारा दोषों का धारण (यमादि गुणयुक्त आत्मा में मन-समर्पण, ब्रह्मवस्तु में अन्तःकरण का अभिनिवेश) द्वारा दुष्कृत का एवं प्रत्याहार (इन्द्रिय-निवर्तन) द्वारा विषयों का परित्याग करके, ध्यान द्वारा ईश्वरीय गुणों का लाभ प्राप्त करना चाहिये॥६-७॥

यथा पर्वतधातूनां दोषा दह्यन्ति धाम्यताम्।
तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते चित्तनिग्रहात् ॥८॥

जैसे पर्वतस्थ धातुओं का समस्त दोष अग्नि में दग्ध हो जाता है, उसी प्रकार इन्द्रियकृत दोष चित्तनिग्रह से दग्ध होता है॥८॥

चित्तं चित्तेन संशोध्य मनस्तु मनसैव तु।
भावान् भावेन संशोध्य बुद्ध्या बुद्धिं विशोधयेत् ॥९॥

चित्त द्वारा चित्त का, मन द्वारा मन का, भाव के द्वारा भाव का एवं बुद्धि के द्वारा बुद्धि का शोधन करना चाहिये॥९॥

चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम्।
शुभाशुभविनिर्मुक्ता निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ॥१०॥
निर्ममो निरहङ्कारस्ततो याति परां गतिम्।

चित्त की प्रसन्नता से शुभ और अशुभ कर्म विनष्ट हो जाता है। शुभ तथा अशुभ से विनिर्मुक्त, निर्द्वन्द्व (शीत-ग्रीष्म, लाभ-अलाभ, मान-अपमान प्रभृति विरुद्ध धर्म से निष्कृत लाभ करता है), निष्परिग्रह (कहीं भी लिप्त न होना), निर्मम (ममताशून्य) तथा निरहंकार (मैं-मेरा इत्यादि अहंकार-शून्यता) के होने के उपरान्त परम गति का लाभ प्राप्त करता है॥१०॥

पूर्वाह्ने लोहितं रूपमृङ्मयं प्रथमं स्मृतम् ॥११॥
यजुर्मयं द्वितीयन्तु शुक्लं माध्यह्निकं स्मृतम् ॥१२॥
कृष्णं तृतीयं सायाह्ने साम्नो रूपं ततः स्मृतम्।
प्रथमं राजसं रूपं द्वितीयं सत्त्वसंज्ञितम् ॥१३॥

पूर्वाह्न में सूर्य के लोहितरूप को प्रथम ऋक् मय रूप कहा गया है। द्वितीय रूप मध्याह्नकालीन शुक्लरूप यजुर्मय रूप है। तृतीय सायाह्न कालीन साममय रूप कहा गया है। प्रथम रूप राजस एवं द्वितीय रूप सात्त्विक है॥११-१३॥

तृतीयं तामसं रूपं त्रैगुण्यं तच्च संज्ञितम्।
त्रयाणां व्यतिरेकेण चतुर्थं सूर्यमण्डलम् ॥१४॥

तृतीय रूप तामसिक है। इस प्रकार से यह त्रिगुण विशिष्ट कहा जाता है। इन तीनों के संस्पर्श से रहित चतुर्थ है—सूर्यमण्डल॥१४॥