भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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अष्टाविंशोऽध्यायः १४१

ज्योतिःप्रकाशकं सूक्ष्मं प्रोक्तं तच्च निरञ्जनम्।
त्रैविद्यसिद्धान्तरताः सूर्यसिद्धान्तवेदिनः ॥१५॥
ॐकारप्रणवैर्युक्ता ध्याननिर्धूतकल्मषाः।
स्थिताः पद्मासने धीरा नाभिसंन्यस्तपाणयः ॥१६॥

उस सूर्यमण्डल को ज्योतिःप्रकाशक, सूक्ष्म एवं निरञ्जन कहते हैं। जो त्रैविद्य सिद्धान्त (वेदार्थज्ञ) में रत हैं, जो सूर्य-सिद्धान्त को जानने वाले हैं, निरन्तर प्रणव मन्त्र के ध्यान से जिनकी पापराशि धुल गई है, वे धीरगण नाभि पर हाथ रखकर पद्मासनस्थ होते हैं॥१५-१६॥

सुषुम्नानाभिमार्गं च कुम्भरेचकपूरकैः।
त्रिभिः संशोध्य तान् पञ्च मरुतो देहमध्यगान् ॥१७॥
पादाङ्गुष्ठेन सञ्चिन्त्यमूर्ध्वमुन्नमयक्रमात्।
नाभिप्रदेशे दृष्ट्वा च देवमग्निमनिन्धनम् ॥१८॥

जो सुषुम्ना पथ में कुम्भक, रेचक तथा पूरक द्वारा नाभिमार्ग एवं पादांगुष्ठद्वय द्वारा देहमध्यस्थ पञ्चवायु का संशोधन करके क्रमशः मस्तक में उसे उठाकर नाभिदेश में काष्ठरहित अग्निरूप देवता सूर्य को देखते हैं॥१७-१८॥

सोमं च हृदये दृष्ट्वा मूर्ध्नि चाग्निशिखां पुनः।
वातराशिमिवासह्यं तं भित्त्वादित्यमण्डलम् ॥१९॥
ततः परं तु गच्छेत योगस्थः सूर्यमण्डलम्।
तत्र गत्वा न शोचन्ति तत् सौरं परमं पदम् ॥२०॥

तदनन्तर हृदय में चन्द्र तथा मस्तक में पुनः अग्निशिखा का दर्शन करके वायु तथा रश्मि के समान असह्य आदित्यमण्डल का भेद करता है, तत्पश्चात् योगस्थ होकर परम सूर्यमण्डल में गमन करता है। वह वहाँ जाकर शोकरहित हो जाता है॥१९-२०॥

प्रथमं हृदयं स्थानं द्वितीयं चाग्निसंस्थितम्।
तृतीयं तापनं स्वस्थं चतुर्थं सूर्यमण्डलम् ॥२१॥

प्रथम स्थान हृदय, द्वितीय अग्नि, तृतीय सूर्य तथा चतुर्थ है—सूर्यमण्डल॥२१॥

स्थानं चतुर्थं परमात्मनस्तनोर्भानोः सुरेशस्य वदन्ति तज्ज्ञाः।
स्थानं द्वितीयं परमात्मनस्तनोर्भानोः सुरेशस्य वदन्ति तज्ज्ञाः ॥२२॥
ज्ञेयश्च मोक्षश्च नृणां स एव संसारविच्छिन्नकरं पदं तत्।
इदं तृषीणां चरितं मया ते प्रख्यापितं याजकशास्त्रसंगात् ॥२३॥

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