भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

११८ श्रीसाम्बपुराणम्

त्रयस्त्रिंशत्त्रयश्चैव त्रयस्त्रिंशत्तथैव च।
त्रयस्त्रिंशत् सहस्राश्च देवाः सोमं पिबन्ति ते ॥१५॥
तैंतीस हजार देवगण उस सोम का पान करते हैं।।१५।।

राहोर्यदामृताद्भागः पुरा सृष्टः स्वयम्भुवा।
तस्मात्तं राहुरभ्येत्य पातुमिच्छति पर्वसु ॥१६॥
ब्रह्मा ने पूर्व में राहु के लिये अमृत भाग की सृष्टि की थी; इसीलिये राहु पर्वकाल में उसे पीना चाहता है।।१६।।

उद्धृत्य पार्थिवीं छायामल्लाकारस्तमोमयः।
पातुमिच्छंस्ततश्चन्द्रमाच्छादयति छायया ॥१७॥
अमृत-पान की इच्छा करके अन्धकारमय वाष्पाकार राहु पार्थिव छाया उद्धृत करते हैं और उस छाया से चन्द्र को आच्छन्न कर लेते हैं।।१७।।

शुक्ले स चन्द्रमभ्येति कृष्णे पर्वणि भास्करम्।
सूर्यमण्डलसंस्थं तु चन्द्रमेव जिघांसति ॥१८॥
शुक्ल पक्ष में वह चन्द्र की ओर जाता है तथा कृष्ण पक्ष के पर्वकाल में (ग्रहण काल में) सूर्य की ओर जाता है। किन्तु राहु सूर्यमण्डल-स्थित चन्द्र का ही विनाश करना चाहता है।।१८।।

तस्मात् पिबति तं राहुस्तनुमस्य विनाशयन्।
अविहिंसन् यथा पद्मं पिबते भ्रमरो मधु ॥१९॥
चन्द्रस्य वामृतं तद्वद्भैदाद्राहुरश्नुते।
जैसे भ्रमर पद्म का विनाश न करके केवल उसका मधुपान करता है, उसी प्रकार राहु भी चन्द्र का विनाश नहीं करता; अपितु चन्द्रस्थ मधु का पान करता है।।१९।।

चन्द्रकान्तो मणिर्यद्वद्धीनं क्षरति तत्क्षणात् ॥२०॥
तुषारोऽपि न हीयेत तेजसा नैव मुच्यते।
यथा सूर्यमणिश्चापि सूर्यादुत्पाद्य पावकम् ॥२१॥
न भवत्यङ्गहीनो वै तेजसा नैव मुच्यते।
एवं चन्द्रश्च सूर्यश्च छादितावपि राहुणा ॥२२॥
तेजसा न विमुच्येते नाङ्गहीनौ बभूवतुः।
पर्वण्यस्य तु चन्द्रस्य माणिक्यफलसात्कृतिः ॥२३॥
चन्द्रकान्तमणि चन्द्र के तेज को प्राप्त कर लेता है, परन्तु इससे चन्द्र का कोई क्षय नहीं होता, तुषार भी समाप्त नहीं होता तथा चन्द्र अपने तेज से च्युत नहीं होता। जैसे