भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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त्रयोविंशोऽध्यायः ११९

सूर्यकान्त मणि सूर्य से अग्नि उत्पन्न कर लेती है, परन्तु सूर्य अंगहीन नहीं होते, तेज से विच्युत नहीं होते। ऐसे ही सूर्य तथा चन्द्र राहु द्वारा आच्छन्न होने पर भी तेज से च्युत तथा अंगहीन नहीं होते। परन्तु प्रति पर्व में चन्द्र को माणिक्य फल की प्राप्ति होती है॥२०-२३॥

सोमो दैवत्संयोगाच्छायायोगाच्च पार्थिवात्।
राहोश्च वरदानाद्वै प्रस्त्रवत्यमृतं शशी॥२४॥
स्वदोहकाले सम्प्राप्ते वत्सं दृष्ट्वा यथा च गौः।
स्वाङ्गादिव क्षरेत् क्षीरं तथेन्दुः क्षरतेऽमृतम्॥२५॥

दैववशात् पृथ्वी की छाया के योग से एवं राहु को मिले वरदान के कारण चन्द्र अमृत का क्षरण करता है। दोहनकाल में गाय जैसे अपने बछड़े को देखकर अपने अंग से दुग्ध उत्पन्न करती है, वैसे ही चन्द्र भी अमृत क्षरण करता है। सूर्य देवताओं के लिये पिता तथा चन्द्र माता के समान परिगणित होते हैं॥२४-२५॥

मातृस्तनं यथा पीत्वा तृप्यन्ते सर्वजन्तवः।
पीत्वामृतं तथा सोमो तृप्यन्ते पितृदेवताः॥२६॥

जैसे माँ के स्तनपान से सभी प्राणी तृप्त हो जाते हैं, वैसे ही पितृदेवगण चन्द्र का अमृत पीकर तृप्त हो जाते हैं॥२६॥

सम्भृतं पर्वयोगेषु तथायं क्षरते शशी।
तं क्षरन्तं यथाभागमुपयुञ्जन्ति देवताः॥२७॥

चन्द्र पर्वों पर अमृत का क्षरण करते हैं और उसका देवगण अपने भाग के अनुसार भोग करते हैं॥२७॥

तस्मिन् काले समभ्येत्य राहुरप्यपकर्षति।
सर्वमर्द्धं त्रिभागं वा पादं पादार्धमेव वा॥२८॥
आक्रम्य पार्थिवीं छायां यावतीं चन्द्रमण्डलम्।
स्मृतः स भागो राहोस्तु देवभागश्च शेषकः॥२९॥

उस समय राहु आकर (अमृत का) आकर्षण करता है। पूर्ण, आधा, तीन भाग, पाद अथवा पादार्ध पृथ्वी की छाया के अनुसार जितने चन्द्रमण्डल पर आक्रमण करता है, वह भाग राहु का तथा शेष देवगण का हो जाता है॥२८-२९॥

तृप्तिं विधाय देवानां राहोः पर्वगतस्य च।
चन्द्रो न क्षीणतां याति तेजसा नैव मुच्यते॥३०॥

देवताओं की तथा पर्वगत राहु की तृप्ति का विधान करके चन्द्रमा क्षीण नहीं होता, किंवा तेज से विच्युत भी नहीं होता॥३०॥